जय श्रीराम का युद्धोन्मादी या जय सियाराम वाला शांतिप्रिय भारत..

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6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद ढहा दी गई थी। यह दिन भारत के इतिहास में एक और विभाजन का दिन साबित हुआ, क्योंकि उसके बाद देश की राजनीति ही नहीं बदली, सामाजिक परिदृश्य भी पूरी तरह से बदल गया।

बरसों-बरस का सौहार्द्र, सांप्रदायिक सद्भाव, धार्मिक एकता की भावना एक धक्का और के नारे के साथ हाशिए पर धकेल दी गईं और उसकी जगह मजहबी उन्माद राजनीति का केंद्र बिंदु बन गया। एक ऐतिहासिक इमारत के साथ देश में इतना कुछ टूट गया, तो जिन लोगों ने इसे तोड़ा, उन्हें कोई सजा मिलेगी या नहीं, इसका इंतजार देश के संविधान में यकीन रखने वाले, और यहां की गंगा-जमुनी तहजीब को हकीकत में अपनाने वाले लोग कर रहे थे।

1992 से 2020 तक बाबरी मस्जिद का नामो-निशान सही अर्थों में मिट गया, क्योंकि मस्जिद तो टूट ही चुकी थी, धीरे-धीरे उसके नाम की जगह उसे विवादित ढांचा कहा जाने लगा। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।

बाबरी मस्जिद कहने से धर्मांधता का पलड़ा वजनी नहीं होता था, लेकिन विवादित ढांचा कहने पर यह गुंजाइश हमेशा बनी रहती कि कभी इस विवाद का निपटारा होगा। और पिछले साल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या की जमीन के मालिकाना हक पर जो फैसला सुनाया, उसे इस विवाद का फैसला ही समझा गया। क्योंकि अदालत का फैसला हिंदू पक्ष के हक में आया था, जिसके बाद राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाकर मंदिर बनाने की शुरुआत हुई।

इसी फैसले में अदालत ने यह भी माना था कि बाबरी मस्जिद को गिराना कानूनन गलत था। देश के अमनपसंद लोगों में फिर उम्मीद जगी कि जब अदालत कह रही है कि मस्जिद गिराना गलत था, तो इस गलत काम को अंजाम देने वालों को भी कानून सजा देगा।

सीबीआई की स्पेशल कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर ही रही थी, इस मामले की चार्जशीट में भाजपा के एलके आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह समेत कुल 49 लोगों का नाम शामिल था, जिनमें से 17 लोगों का निधन हो चुका है, बाकी 32 आरोपियों पर अदालत को फैसला सुनाना था।

30 सितम्बर को आने वाले इस फैसले में भाजपा के कद्दावर नेताओं समेत अन्य लोगों पर अदालत क्या कहती है, इसे जानने की उत्सुकता देश को थी। उमा भारती ने तो पहले ही ऐलान कर दिया था कि वे जमानत नहीं लेंगी। लेकिन न उमा भारती को न किसी और आरोपी को ऐसा करने की नौबत आई।

सीबीआई की विशेष अदालत ने अपने फैसले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि बाबरी विध्वंस सुनियोजित नहीं था। अराजक तत्वों ने ढांचा गिराया था और आरोपी नेताओं ने इन लोगों को रोकने का प्रयास किया था। आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं और सीबीआई की ओर से जमा किए गए ऑडियो और वीडियो सबूतों की प्रमाणिकता की जांच नहीं की जा सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि भाषण का ऑडियो क्लियर नहीं है।

इस फैसले से आरएसएस प्रसन्न है। एलके आडवाणी कह रहे हैं कि आज साबित हुआ कि जो हुआ वो षड्यंत्र नहीं था। मुरली मनोहर जोशी ने सबको सन्मति दे भगवान कहा और साध्वी ऋतंभरा कह रही हैं कि हम षडंयंत्र नहीं, मंत्र रचते हैं। अदालत का फैसला किसी न किसी के पक्ष में आना ही था।

इस फैसले से एक बार फिर भाजपा को अपने लिए बड़ी जीत महसूस हो रही है। लेकिन कुछ सवाल अब भी उत्तरहीन बने हुए हैं। जैसे बाबरी मस्जिद को गिराना सुनियोजित नहीं था, तो दिसंबर 1992 के शुरुआती हफ्ते में हजारों कारसेवक अयोध्या क्या केवल सांकेतिक पूजा के लिए पहुंचे थे। क्या उनके पास फावड़े, कुदाली जैसे औजार सांकेतिक पूजा के लिए थे।
आपको याद दिला दें कि लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के बाद देश भर में राम मंदिर बनाने के लिए माहौल तैयार किया गया था। इस दौरान देश में सांप्रदायिक तनाव काफी बढ़ गया था। लेकिन फिर भी केंद्र सरकार से लेकर उत्तरप्रदेश सरकार तक सबने इस मामले में पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती।

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में सांकेतिक कारसेवा तय की गई। कारसेवा का मतलब अपने हाथों से सेवा करना है। यह शब्द सिख धर्म ग्रंथों में कई बार आया है। 6 दिसंबर 1992 को राममंदिर के लिए कारसेवा करने से पहले 5 दिसंबर को गीता जयंती के दिन इसका अभ्यास देश भर से आए कारसेवकों ने किया।
यह एक सांकेतिक पूजा थी जिसमें सरयू नदी से रेत और पानी लाकर प्रस्तावित मंदिर की जगह को धोना तय हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ शांतिपूर्ण कारसेवा की अनुमति दी थी, जिसमें लोग एक साथ इकटठा होकर भजन गा सकते थे और सांकेतिक पूजा कर सकते थे। इस कारसेवा के एक दिन पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ में रैली के दौरान कहा था कि कारसेवा पर सुप्रीम कोर्ट की आज्ञा का पूरी तरह पालन किया जाएगा। लेकिन अपने भाषण में उन्होंने यह भी कहा था कि, खुदाई बाद वहां जो नुकीले पत्थर निकले हैं, उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता, तो जमीन को समतल करना पड़ेगा। आगामी वर्षों में जमीन समतल करने की इस बात के सारे अर्थ खुलकर सामने आने लगे। अब न केवल वहां जमीन समतल है, बल्कि नए मंदिर के लिए नींव का पत्थर भी रखा जा चुका है।
अयोध्या में जमीन समतल कर भाजपा ने अपने लिए सत्ता के किले तैयार कर लिए और अब यह किला स्थायित्व पा जाए, इसकी पुरजोर कोशिश हो रही है। वैसे एक सवाल ये भी है कि एक धक्का और के नारे क्या सांकेतिक पूजा के लिए लगाए गए थे। बाबरी मस्जिद के तीनों गुंबदों को ढहाने के साथ ही जय श्रीराम के नारे गूंजने लगे थे, क्या वह भी पूजा का ही हिस्सा था।
और इस मामले में आरोपी बनी उमा भारती, दूसरे आरोपी बने मुरली मनोहर जोशी के कंधों पर चढ़कर किस बात की खुशी मना रही थीं। क्या इसलिए कि जैसी पूजा की ख्वाहिश भाजपा, विहिप, आरएसएस और तमाम हिंदूवादी संगठनों को थी, वो निर्विघ्न संपन्न हो गई थी। अयोध्या में धारा 144 लगाए जाने के बावजूद, केंद्रीय बलों की मौजूदगी के बावजूद और भाजपा की कल्याण सिंह सरकार द्वारा यह हलफनामा दिए जाने के बावजूद कि बाबरी मस्जिद को कोई नुकसान नहीं होगा, मस्जिद गिरा दी गई, क्या यह खुशी ऐसी पूजा के पूर्ण होने की मनाई जा रही थी।
बहरहाल, भाजपा को अब कारसेवा का और सांकेतिक पूजा का पूरा प्रसाद मिल गया है। जो थोड़ी बहुत विध्न बाधाएं थीं, वे भी अब खत्म हो गई हैं। अब राम मंदिर बनाने का काम दोगुने उत्साह से होगा, क्योंकि आरोपियों पर षड्यंत्रकारी होने का ठप्पा हट चुका है। अदालत ने अपना फैसला सुना दिया, अब जनता भी तय कर ले कि उसे जयश्रीराम का युद्धोन्मादी भारत चाहिए या जयसियाराम वाला शांतिप्रिय भारत।

(देशबंधु)

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