बाबरी पर आए फैसले से देश को बड़ी निराशा..

बाबरी पर आए फैसले से देश को बड़ी निराशा..

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-सुनील कुमार।।

बाबरी मस्जिद गिराने के मामले में 28 बरस से चले आ रहा मुकदमा अब निपटा है, और दो लाईनों में निपट गया। अदालत ने सभी 32 अभियुक्तों को बरी कर दिया है कि उनके खिलाफ कोई ठोस सुबूत नहीं है। ये 32 अभियुक्त मामला शुरू होने के समय 49 थे, और फैसले के इंतजार में 17 अभियुक्तों को कुदरत की तरफ से ही सजा मिल चुकी है। अब आज से लालकृष्ण अडवानी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती जैसे बाकी तमाम अभियुक्त-नेता भी इस मुकदमे से आजाद हो चुके हैं। पता नहीं कैसे कल से ही यह आने लग गया था कि यह फैसला दो हजार पेज का रहने वाला है। अगर पूरे फैसले को सुनकर नतीजा सुनाया जाता तो वह शायद दो-तीन दिन बाद सामने आता, लेकिन जाहिर है कि फैसले से काम की बात को सीबीआई विशेष अदालत के जज ने आनन-फानन सुना दिया, और लोगों की दिलचस्पी अदालत पर से खत्म हो गई। जज का कार्यकाल पहले ही पूरा हो चुका था, लेकिन नए जज को यह मामला देने से यह और 10-20 बरस चलता, इसलिए इस फैसले तक जज का कार्यकाल सुप्रीम कोर्ट ने संविधान का एक विशेष प्रावधान इस्तेमाल करके बढ़ा दिया था, और आज इस फैसले के साथ ही जज का काम भी खत्म हो गया।

इस फैसले से देश को बड़ी निराशा हुई है। इतना बड़ा बाबरी-ढांचा गिराया गया, जिसे इन तमाम अभियुक्त-नेताओं ने खास बनाए गए एक मंच पर बैठकर देखा था। इसके पहले लालकृष्ण अडवानी ने एक बड़ी रथयात्रा निकाली थी जो कि बाबरी मस्जिद को गिराने की जमीन बनाते चल रही थी, और इस ढांचे को गिराने के बाद देश में हुए दंगों की जमीन भी। इस स्टेज पर विराजमान होकर जब ये नेता ढांचा गिरना देख रहे थे, खुशी में एक-दूसरे से लिपट रहे थे, उमा भारती मुरली मनोहर जोशी की पीठ पर खुशी के मारे लटक गई थीं, तब देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई इस मामले में कुछ भी साबित न कर सकी, यह देश को और निराश करने वाली बात है। यह जाहिर है कि इस मामले के तकरीबन सभी अभियुक्त अगली किसी ऊपरी अदालत का कोई फैसला आने के पहले सबसे ऊपर की अदालत तक पहुंच जाने की उम्र या सेहत में हैं। और हिन्दुस्तान की अदालतों की रफ्तार देखते हुए यह समझा जा सकता है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से बाबरी-ढांचे पर आखिरी फैसला आने के पहले तक ये सारे ही अभियुक्त बाकी 17 गुजर चुके अभियुक्तों से मिलने रवाना हो चुके होंगे।

आज जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं, देश भर में हिन्दूवादी ताकतें जश्न मना रही हैं। उनके लिए यह राम मंदिर बनाने के फैसले के बाद एक और बड़ा फैसला है, और अब मंदिर मार्ग से तमाम कांटे दूर मान लिए गए हैं। एक फैसले ने यह माना कि बाबरी मस्जिद तो गिराई गई थी, लेकिन वहां पर अब मंदिर बनाने का हक दिया जाता है। आज इस अदालत ने यह माना है कि बाबरी-ढांचे को गिराना सुनियोजित साबित करने के लिए ठोस सुबूत नहीं हैं। अब पूरी दुनिया जिस नजारे को टीवी पर देख रही थी, और ये सारे अभियुक्त वहीं सामने बैठकर मंच से रूबरू देख रहे थे, एक-दूसरे को मिठाईयां खिला रहे थे, और एक किस्म से आने वाले दिनों में देश भर में दंगों में हजारों मौतों की जमीन भी तैयार कर रहे थे, उस नजारे को साबित करने का काम सीबीआई नहीं कर पाई। यह वक्त प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव की सरकार का था जिनके कुछ न करने की वजह से, जिनके बंद कमरे में बैठ जाने की वजह से लोगों को मस्जिद गिराने का यह मौका मिला था, उनके वक्त सीबीआई को जब इसके पुख्ता सुबूत जुटाने का मौका था, तो लगता है कि वह काम हो नहीं पाया। जो सुबूत पूरी दुनिया में बंटते लड्डुओं की शक्ल में अयोध्या की मस्जिद के सामने मंच पर देखे थे, वे भी सीबीआई को नहीं दिखे।

ऐसे में मुस्लिम राजनीति करने वाले एक प्रमुख नेता, एआईएमआईएम के अध्यक्ष और सांसद असदउद्दीन ओवैसी ने कहा है कि इस मामले की चार्जशीट में लिखा था कि उमा भारती ने कहा था- एक धक्का और दो, कल्याण सिंह ने कहा था- निर्माण पर रोक है, तोडऩे पर नहीं, ऐसे सुबूतों के बाद भी मस्जिद को गिराया गया, और अब इन सबको बरी करके यह संदेश दिया जा रहा है कि मथुरा और काशी में भी यही करते चलो।

जज ने दो हजार पेज के फैसले में कहा है कि मस्जिद की विध्वंस की कोई पूर्व योजना नहीं थी, इसके पीछे कोई आपराधिक साजिश नहीं थी। फैसले में यह भी कहा है कि इन आरोपियों ने भीड़ को रोकने और उन्हें उकसाने की कोशिश नहीं की थी। फैसले में कहा कि सीबीआई द्वारा प्रस्तुत ऑडियो और वीडियो क्लिप की प्रमाणिकता साबित नहीं हुई है।

जाहिर है कि कई सरकारों के मातहत काम करते हुए सीबीआई ने अभी जो सुबूत पेश किए थे, वे काफी नहीं थे, और भरोसेमंद नहीं थे। इससे परे देश की जनता को कोई और उम्मीद भी नहीं थी।

सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने इस फैसले को एक मजाक बताया। उन्होंने लिखा- यह न्याय का मजाक है। मस्जिद क्या खुद गिर गई? उस समय की सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने इसे कानून का भयावह उल्लंघन बताया था। उसके बाद अब ये फैसला! शर्मनाक है।

देश के एक वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा- इस फैसले से यही माना जाएगा कि न्यायपालिका में न्याय नहीं होता है, बस एक भ्रम रहता है कि न्याय किया जाएगा। यही होना संभावित था क्योंकि विध्वंस के केस में फैसला आने के पहले ही जमीन के मालिकाना हक पर फैसला सुना दिया गया, वो भी उस पक्ष के हक में जो मस्जिद ढहाए जाने का आरोपी था। इससे मुस्लिम समुदाय में द्वेष बढ़ेगा क्योंकि कोई भी फैसला उन्हें अपने हक में नहीं लगेगा। मुसलमान समुदाय को दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है, उनके सामने इस वक्त और बड़ी चुनौतियां हैं, जैसे-जैसे हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की कोशिशें हो रही हैं।

आने वाले दिनों में कानून के हमसे अधिक बड़े जानकार इस फैसले की खूबियों और खामियों को गिनाने का काम करेंगे, हम भी तब तक दो हजार पेज को पढक़र उस विश्लेषण को समझने लायक बन चुके रहेंगे।

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