हाथरस गैंगरेप पीड़िता का चुपके से अंतिम संस्कार..

Desk

-विजय शंकर सिंह।।

सुबह जब फेसबुक खोला तो पहली खबर मिली की हाथरस की, गैंगरेप पीड़िता का अंतिम संस्कार रात में ही कर दिया गया। चुपके से किये गये इस अंतिम संस्कार के निर्णय में घर और परिवार के लोग सम्मिलित नहीं थे। रात में ही शव अस्पताल से निकाल कर बिना घर परिवार की अनुमति और सहमति के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया ।

रात के अंधेरे में समस्त मानवीय और वैधानिक मूल्यों को दरकिनार कर के किया गया यह अंतिम संस्कार, मानवीयता का ही अंतिम संस्कार जैसा लगता है। यह अन्याय,अत्याचार और अमानवीयता की पराकाष्ठा है। पीड़िता के माँ बाप, घर परिवार के लोग, रोते कलपते रहे, लेकिन पुलिस ने खुद ही अंतिम संस्कार कर दिया। पीड़िता को न्याय मिलेगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है, पर उसे अंतिम संस्कार भी सम्मानजनक और न्यायपूर्ण तरह से नहीं मिल सका।

यह कृत्य बेहद निर्मम और समस्त विधि विधानों के प्रतिकूल है। अगर शव लावारिस या लादावा है तो उस शव का उसके धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार करने का प्राविधान है। पुलिस ऐसे लावारिस और लादावा शवों का अंतिम संस्कार करती भी है। लेकिन यहां तो शव घरवाले मांग रहे थे और फिर भी बिना उनकी सहमति और मर्ज़ी के उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। जबकि पीड़िता का शव न तो लावारिस था और न ही लादावा।

कभी कभी किसी घटना जिसका व्यापक प्रभाव शांति व्यवस्था पर पड़ सकता है और कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है तो ऐसे शव के अंतिम संस्कार चुपके से, पुलिस द्वारा कर दिए जाते हैं। लेकिन ऐसे समय मे भी अगर शव लावारिस और लादावा नहीं हैं तो घर परिवार को विश्वास में लेकर ही उनका अंतिम संस्कार होता है।

गैंगरेप की इस हृदयविदारक घटना से लोगो मे बहुत आक्रोश है और इसकी व्यापक प्रतिक्रिया हों भी रही है। अब जब इस प्रकार रात के अंधेरे में चुपके से अंतिम संस्कार कर दिया गया है तो इससे यह आक्रोश और भड़केगा। यह नहीं पता सरकार ने क्या सोच कर इस प्रकार चुपके से रात 2 बजे अंतिम संस्कार करने की अनुमति दी।

यह निर्णय निश्चित रूप से हाथरस के डीएम एसपी का ही नहीं रहा होगा। बल्कि इस पर शासन में बैठे उच्चाधिकारियों की भी सहमति होगी। ऐसे मामले जो मीडिया में बहुप्रचारित हो जाते हैं, अमूमन डीएम एसपी के निर्णय लेने की अधिकार सीमा से बाहर हो जाते हैं। मुझे लगता है, इस मामले में भी ऐसा ही हुआ होगा।

सवाल उठेंगे कि आखिर पुलिस ने ऐसा क्यों किया और किस घातक संभावना के कारण ऐसा किया गया ? सरकार कहेगी कि, इससे कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। पर यह घटना और अपराध खुद ही इस बात का प्रमाण है कि कानून और व्यवस्था तो बिगड़ ही चुकी है। आधी रात का यह अंतिम संस्कार, व्यवस्था के ही अंतिम संस्कार की तरह लगता है और यह सब बेहद विचलित करने वाला तो है ही।

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