दिल्ली से लेकर हाथरस तक किस्सा एक है

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दिल्ली में सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई निर्भया के दोषियों को आखिरकार फांसी मिली तो समाज ने खुशी जतलाई कि निर्भया को इंसाफ मिल गया। हैदराबाद के बलात्कार कांड में चारों आरोपियों को पुलिस एनकाउंटर में मारा गया तो उस जगह पर पुलिस वालों पर लोगों ने फूल बरसाए। जनता का एक बड़ा वर्ग मानने लगा है कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में अगर मृत्युदंड मिलने लगे या आरोपियों को घेर कर मार कर, तुरंत इंसाफ किया जाए तो समाज से ऐसे अपराधों को मिटने में डर नहीं लगेगा। तब अपराधियों में खौफ रहेगा कि अगर वे किसी लड़की पर बुरी नजर डालेंगे तो उन्हें सख्त परिणाम भुगतने पड़ेंगे। काश भारत की हकीकत भी इन लोगों की सोच की तरह ही मासूम होती कि कानून के डर से अपराध रुक जाएंगे। लेकिन अगर आंकड़ों पर भरोसा करें तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबि$क 2018 में 33,977 बलात्कार के मामले पुलिस ने दर्ज किए, यानी हर 15 मिनट में एक बलात्कार हो रहा था। वैसे महिला अधिकारों और सुरक्षा के लिए काम करने वाली संस्थाओं के मुताबिक असल संख्या इससे कहीं ज़्यादा है क्योंकि ज़्यादातर केस तो रिपोर्ट ही नहीं किए जाते।

बलात्कार की सभी खबरें भी सुर्खियों में नहीं आती। वे तभी चर्चा का विषय बनती हैं जब कोई जघन्य वारदात हुई हो या किसी बड़े व्यक्ति का नाम इससे जुड़ा हो। अभी कोरोना काल में जब लोगों की आवाजाही काफी हद तक कम हुई है, तब भी बलात्कार की घटनाएं कम नहीं हुईं।  कुछ समय पहले दिल्ली में एक 86 बरस की महिला से बलात्कार किया गया। एक कोरोना मरीज को ले जाते हुए एंबुलेंस ड्राइवर ने बलात्कार किया। पिछले महीने उत्तरप्रदेश में एक 13 साल की बच्ची के साथ बलात्कार कर उसकी आंखें निकाल दी गईं और जीभ काट दी गई।

हापुड़ में छह साल की बच्ची के साथ ऐसी ही हैवानियत हुई और अब हाथरस का मामला रोंगटे खड़े कर रहा है। यहां एक दलित युवती को खेत से खींचकर चार लोगों ने बलात्कार किया, उसकी जीभ काट दी, ताकि वो कुछ बता न सके और उसकी रीढ़ की हड्डी भी तोड़ दी गई। वो लड़की 9-10 दिन बाद होश में आ पाई और उसने इशारों से अपनी आपबीती बयां की। उसके परिजन पुलिस से मामला दर्ज करने के लिए कहते रहे, लेकिन उत्तरप्रदेश पुलिस ने भरपूर आनाकानी दिखाई। इसे फेक न्यूज बताने की कोशिशें भी हुईं। आखिरकार 10 दिन बाद इस मामले की पहली गिरफ्तारी हुई और बाद में चारों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के असंवेदनशील रवैये के कारण पीड़िता को अच्छे इलाज के लिए भी देर हुई। और अब उसने दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दिया। इस मामले में उत्तरप्रदेश सरकार और पुलिस दोनों की खूब आलोचना हो रही है। लेकिन अपराधों पर निर्विकार बनी सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

अधिक से अधिक फिर एनकाउंटर जैसी कोई चाल चल दी जाएगी और लोग दो-चार दिन बात कर फिर सब भूल जाएंगे। वैसे भी इस देश के अधिकतर लोग अब मीडिया के हाथों अपनी समझदारी को गिरवी रख चुके हैं और केवल वही देखते-समझते हैं, जो उन्हें दिखाया-समझाया जाता है।  

जैसे निर्भया कांड के वक्त कांग्रेस सरकार को निशाने पर लेकर उसे सत्ता से हटाने का टारगेट गोदी मीडिया को उनके आकाओं ने दे दिया था, तो उस पर दिन-रात कवरेज हुई, लेकिन वही रवैया कठुआ, उन्नाव में देखने नहीं मिला। इस वक्त उत्तरप्रदेश में अपराध का जो स्तर है, उसे देखकर लगता है मानो ओटीटी प्लेटफार्म पर कोई क्राइम सीरिज का एपिसोड-दर-एपिसोड प्रसारण हो रहा है। कहीं शूट आउट, कहीं एनकाउंटर, कहीं सड़क पर दौड़ा कर व्यापारी की हत्या, कहीं लूटपाट, तो कहीं बलात्कार, एक दिन ऐसा नहीं बीतता जब इन अपराधों में से किसी एक की खबर न आती हो। लेकिन ये केवल फटाफट सौ खबरों वाले बुलेटिन का हिस्सा बन कर रह जाती हैं। अगर यहां चुनाव होते तो हाथरस जैसे मामले पर सरकार की त्वरित सख्ती देखने मिलती, लेकिन अभी सरकार की प्राथमिकता लवजिहाद रोकने, मंदिर बनवाने की नजर आ रही है।

हाथरस में पीड़िता दलित लड़की है, तो इसे सवर्ण और दलित के नजरिए से भी देखा जा रहा है। ये सही है कि उस लड़की पर हुए अपराध में उसका दलित होना भी एक कारण रहा होगा, लेकिन स्त्री की पीड़ा तो जाति-धर्म के बंधन से ऊपर है। इसे उस नजरिए से भी समझने की कोशिश करनी चाहिए। एक महीने की बच्ची से लेकर 86 साल की वृद्धा के साथ हो रही बलात्कार की घटनाएं ये बताती हैं कि हमारे समाज में स्त्रियों के लिए गैरबराबरी किस हद तक घुसी हुई है। 

सुनील गावस्कर मजाक-मजाक में ही सही लेकिन विराट कोहली के खराब प्रदर्शन को उनकी पत्नी अनुष्का से जोड़ते हैं। मानो पति की असफलता का ठीकरा भी पत्नी के सिर फोड़ने की परंपरा बन गई है। उनके इस मजाक पर कुछ नारीवादी न्यूज एंकर बायकॉट गावस्कर की मुहिम चलाने लगीं, लेकिन इन्हीं चैनलों पर बॉलीवुड के ड्रग्स कनेक्शन पर इस तरह की खबरें परोसी जा रही हैं, जिससे इस इंडस्ट्री में काम करने वाली लड़कियों के चरित्र पर सवाल उठते हैं। उनकी कम कपड़ों वाली तस्वीरें लगातार दिखाकर तथाकथित भारतीय संस्कारों से उनकी दूरी दिखाई जाती है। अब इन चैनलों पर अगर हाथरस मामला टीआरपी बढ़ाने का काम नहीं करेगा, तो इसे वे बड़ी आसानी से दबा भी देंगी।

टीवी चैनलों के जैसा ही दोहरा चरित्र भारत के समाज का भी हो गया है। अभी दिल्ली में कृषि बिल के विरोध में ट्रैक्टर जलाने की घटना पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जिसकी पूजा किसान करता है, उसे ही आग लगा दी। क्या यही हाल लड़कियों का भी नहीं है। अभी कुछ दिनों में नवरात्रि का पर्व आएगा और नौ दिनों देवी की पूजा होगी। सदियों से हो रही इस पूजा के बावजूद महिलाओं की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। निर्भया कहें या गुड़िया सबका अंजाम एक जैसा ही है और समाज का रवैया भी।

(देशबन्धु)

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