हम कैसे समाज में रह रहे हैं

-संजय कुमार सिंह||

एक बुजुर्ग या सीनियर आईपीएस अफसर एक युवा महिला एंकर के घर पहुंच जाते हैं। उनकी खतरनाक या सतर्क पत्नी पीछा करती हुई एंकर के घर पहुंचती है। दोनों लड़ते हैं। आईपीएस जो करना है करो, कहकर पत्नी को एंकर के साथ छोड़कर चले जाते हैं। महिला बेडरूम की तलाशी लेती है और पति को रंगे हाथों पकड़ने का दावा करती है। बेटा वीडियो बनाकर जारी करता है। बेटी कहती है मां मेंटल है।

अब इसमें कौन कितना सच है – इसमें गए बिना यह तथ्य है कि पति को पता है कि पत्नी मेन्टल है। वह अपने निजी मामले में एंकर को क्यों लपेटते हैं। एंकर का कहना है कि कोई चक्कर या संबंध नहीं है और हो तो भी। बेटी को पता है कि मां मेन्टल है, चिट्ठी लिख सकती है तो इलाज करवाने पर जोर क्यों नहीं दिया और बेटा वीडियो क्यों बना रहा है – पूरा मामला एक जासूस का कैरियर बना दे पर किसे परवाह है।

ऐसे लोग उसी समाज में रह रहे हैं जहां एक ही आईपीएस की तैनाती के दौरान बलात्कार के तीन गंभीर मामले अलग शहरों में होते हैं। आईपीएस मुख्यमंत्री की जाति का है और उस राज्य में नहीं है जहां का वह रहने वाला है। बलात्कार पीड़िता पिछड़ी जाति की हैं। नेता काम करने के लिए 20 विधायकों के साथ दल बदल कर लेते हैं। सरकार गिर जाती है। सब होने के बावजूद ऐसी ही दूसरी कोशिश भी होती है। और आरोप एक दो या दस लोगों पर कि कुछ कर नहीं रहे हैं। इस सड़े हुए समाज में कोई क्या कर सकते है जब सरकार ऐसी प्रतिशोधी है कि एमेनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्था काम नहीं कर पा रही है और देश में कोई इमरजेंसी नहीं लगी हुई है। आपदा की स्थिति है, और सबसे अवसर खोजने की अपील है। सरकार किसी को धन नहीं बांट रही है। लुटे-पिटे-मजबूर लोगों की संख्या ज्यादा है।

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