कल के अफसर, आज के उम्मीदवार, पूरी तरह गलत

Desk

-सुनील कुमार।।
बिहार में जैसी उम्मीद थी ठीक वैसा ही हुआ। पिछले कुछ महीनों से बिहार की चर्चा बाढ़ को लेकर, कोरोना को लेकर, बिहार में जुर्म को लेकर कम थी, मुम्बई में एक अभिनेता की मौत को लेकर अधिक थी, क्योंकि वह रातों-रात बिहार का गौरव करार दे दिया गया था, और बिहार में भारतीय जनता पार्टी ने इस अभिनेता की तस्वीर और नाम वाले स्टिकर भी छपवा लिए थे कि तुम्हें नहीं भुलाएंगे सुशांत। जब सुशांत की मौत की जांच मुम्बई पुलिस से छीननी थी, और बिहार में दर्ज की गई एफआईआर से यह काम नहीं हो पा रहा था, तो सीबीआई ने इस मामले को ले लिया, और पूरी तरह मुम्बई की एक मौत की जांच महाराष्ट्र सरकार की मर्जी के खिलाफ केन्द्र सरकार ने छीनकर सीबीआई को दे दी। लेकिन इस सिलसिले पर लिखना आज का मकसद नहीं है, आज का मकसद बिहार के कल तक के डीजीपी, और आज के सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्य, और आने वाले कल के विधानसभा चुनाव उम्मीदवार गुप्तेश्वर पांडेय हैं।

लोगों को याद होगा कि जिस तरह और जिस भाषा में गुप्तेश्वर पांडेय बिहार की तरफ से मुम्बई की एक फिल्म अभिनेत्री पर हमला बोल रहे थे, उसे देश के अधिकतर सभ्य लोगों ने एक असभ्य जुबान करार दिया था, और इसकी वजह से जल्द ही इस सबसे सीनियर बिहारी पुलिस अफसर को अपने शब्द वापिस भी लेने पड़े थे। लेकिन वापिस लेने के पहले वे अपना असर डाल चुके थे, वे नीतीश कुमार के प्रति इस डीजीपी की निजी निष्ठा को सीमा से अधिक साबित कर चुके थे, और आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए उन्हें एक दमदार उम्मीदवार साबित कर चुके थे। हुआ वही, नौकरी बाकी रहते हुए भी चुनावी घोषणा के ठीक पहले गुप्तेश्वर पांडेय ने इस्तीफा दिया, घंटों में वह मंजूर हुआ, और एक या दो दिन में वे सत्तारूढ़ पार्टी के मेम्बर बन गए, और विधानसभा सीट सहित उनके नाम की उम्मीदवारी की खबरें शुरू हो गईं।

अब सवाल यह उठता है कि एक या दो दिनों के भीतर सरकारी अफसर अफसरी छोडक़र अपने ही कार्यक्षेत्र के भीतर चुनावी उम्मीदवार बन जाए, तो यह किस पैमाने पर सही कहा जा सकता है? सरकारी नौकरी के पैमाने पर, या चुनाव आयोग के पैमाने पर? अगर चुनाव आयोग के नियम ऐसी कोई रोक नहीं लगाते हैं, तो आयोग के नियम बदलने की जरूरत है। अगर भारत सरकार की इस एक सबसे बड़ी नौकरी के नियम ऐसी कोई रोक नहीं लगाते हैं, तो नौकरी के नियमों को बदलने की जरूरत है। हिन्दुस्तान की किसी अदालत का जज रिटायर होते ही उसी जगह उसी अदालत में वकालत शुरू कर दे, तो बहुत से ऐसे जज रहेंगे जो उसके मातहत रहते आए हैं, और वे उनकी पैरवी से असुविधा महसूस करेंगे। अगर कारोबार से जुड़े हुए किसी विभाग के बड़े अफसर रहे लोग नौकरी छोड़ते ही उस कारोबार में काम करने चले जाएं, तो उससे सरकार में एक गंदगी का माहौल बनना तय है। लोगों को याद होगा कि भिलाई स्टील प्लांट के एमडी रहे विक्रांत गुजराल नौकरी छोड़ते ही आनन-फानन बीएसपी के मुकाबले काम करने वाली जिंदल नाम की कंपनी में छत्तीसगढ़ में ही चले गए थे, और इसे बहुत से लोगों ने नाजायज माना था। सरकार या अदालत में ऐसी कुछ रोक रहती भी है, और रहनी भी चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि यह रोक काफी नहीं रहती है, एक वक्त इंदौर के कलेक्टर रहते हुए अजीत जोगी को भी जब अर्जुन सिंह और राजीव गांधी ने राज्यसभा भेजना तय किया था, तो उनका इस्तीफा इसी तरह आनन-फानन रातों-रात मंजूर करके उन्हें राज्यसभा उम्मीदवार बनाया गया था।

अब चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट को पहल करनी चाहिए, और दलबदल करके दूसरी पार्टी में जाने वाले लोगों पर कम से कम कुछ बरस चुनाव लडऩे पर रोक लगानी चाहिए। जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाले, और बाद में पेंशन भी पाने वाले लोगों पर भी, जजों, अफसरों पर इस्तीफा देने के बाद अगले कुछ बरस तक चुनाव न लडऩे, निजी कारोबारों में नौकरी न करने, कंपनियों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स न बनने की रोक लगनी चाहिए। सरकारी जुबान में इसे कूलिंग-ऑफ पीरियड कहा जाता है, और जहां आज नियमों में ऐसी बंदिशें नहीं हैं, वहां भी इन्हें लागू करना चाहिए। इसके बिना हितों का टकराव होता है। बिहार की ही मिसाल लें तो गुप्तेश्वर पांडेय की राजनीतिक महत्वाकांक्षा कुछ महीनों से उछाल मार रही थी। ऐसी चर्चा है कि उनकी विधानसभा सीट भी पहले से छांटी हुई है, तो ऐसे में पिछले महीनों में वे ऐसी ताकत की जगह पर थे कि उस विधानसभा सीट पर अपने पसंदीदा पुलिस अफसरों को तैनात कर पाते, वहां की खुफिया रिपोर्ट हासिल कर पाते, दूसरे संभावित उम्मीदवारों के खिलाफ जानकारी जुटा पाते, और यह सब कुछ अनैतिक आचरण की आशंकाओं में आता है। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को जनता के पैसों पर तनख्वाह, मेहनताना, भत्ता पाने वाले तमाम लोगों का कूलिंग-ऑफ पीरियड तय करना चाहिए, और उनके चुनाव लडऩे पर, नौकरी करने पर अपात्रता तय करनी चाहिए।

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