भाजपा से शिअद का अलगाव

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मोदी सरकार के कृषि विधेयकों के विरोध में जब शिरोमणि अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने केन्द्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दिया था, तब से ही कयास लग रहे थे कि अब अकाली दल भी एनडीए से अलग हो सकता है। इस बीच शिअद के मुखिया सुखबीर सिंह बादल सरकार के फैसले पर अपनी नाराजगी जताते रहे। उन्होंने दो दिन पहले ही सबको भाजपा के इस फैसले के खिलाफ एक साथ आने का आह्वान किया था और अब आखिरकार शिरोमणि अकाली दल ने एनडीए से नाता तोड़ ही लिया। शिअद ने यह फैसला कुछ देर से लिया है, लेकिन यह कितना दुरुस्त है, यह आने वाला वक्त तय करेगा। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इसे टू लिटिल, टू लेट कहा है। वैसे पंजाब की राजनीति के जानकार जानते हैं कि अकाली दल के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था।

कृषि विधेयकों पर इस वक्त पंजाब के किसान बेहद गुस्से में हैं। तीन दिनों तक वहां रेल रोको आंदोलन चला और अगर अकाली दल इस वक्त किसानों के साथ खड़े नजर नहीं आता, तो उसका अस्तित्व ही दांव पर लग जाता। वैसे भी पिछले चुनावों में कांग्रेस के हाथों उसे बुरी तरह मात मिली है। गौरतलब है कि इस वक्त पंजाब की राजनीति का सबसे ज्वलंत मुद्दा कृषि विधेयक ही बन गए हैं। यहां के किसान इसका विरोध कर रहे हैं। और दिलचस्प बात ये है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस, विपक्षी आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल सभी इन विधेयकों के विरोध में हैं।

नवजोत सिद्धू समेत कई नेता किसानों के साथ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और अब बादल परिवार भी किसानों के साथ विरोध-प्रदर्शन में शामिल हो रहा है। दरअसल, राज्य में फरवरी-मार्च 2022 में चुनाव होने हैं और कोई भी दल किसानों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता, क्योंकि पंजाब की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ राजनीति भी बहुत हद तक किसान केंद्रित है। शिअद मुखिया सुखबीर सिंह बादल ने लोकसभा में कहा था कि- ‘हम इन अध्यादेशों का विरोध करते हैं क्योंकि 20 लाख किसान, 3 लाख मंडी में काम करने वाले मजदूर, 30 लाख खेत में काम करने वाले मजदूर और 30 हजार आढ़तियों के लिए ये खतरे की घंटी है। पंजाब की पिछली 50 साल की बनी बनाई किसान की फसल खरीद व्यवस्था को ये चौपट कर देगी।’ हालांकि जब यह अध्यादेश केबिनेट में लाया गया था, तब शिअद ने इस पर इतना कड़ा रुख नहीं दिखाया था। 
शिअद के राज्यसभा सांसद नरेश गुजराल के मुताबिक कैबिनेट में जिस दिन ये पास किया गया, हमारी पार्टी ने उस वक्त भी

इसका विरोध किया था। केंद्र सरकार कह रही है कि ये बिल किसानों के हित में है, हमने केंद्र सरकार के पक्ष को किसानों को समझाने की कोशिश की, लेकिन किसान सरकार की बात मानने को तैयार ही नहीं है। दोनों के बीच में एक बहुत बड़ा ‘कम्यूनिकेशन गैप’ ‘ट्रस्ट गैप’ है। जब हमें अहसास हो गया कि हमारे किसान इस बिल को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं और हम किसानों की पार्टी हैं, हम उन्हीं का प्रतिनिधित्व करते हैं। तो हमने उनकी बात को समझ लिया, और हमें ये सख़्त कदम उठाना पड़ा। इन बयानों से समझ आता है कि अकाली दल ने भाजपा के साथ बने रहने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब सवाल राजनैतिक भविष्य का आया, तो परिस्थितियों के आगे झुकना पड़ा।

महाराष्ट्र चुनाव के बाद एनडीए के पुराने घटक दलों में से एक शिवसेना ने मुख्यमंत्री की कुर्सी के नाम पर भाजपा का साथ छोड़ा था। महाराष्ट्र में यूं भी दोनों के बीच बड़ा कौन और छोटा कौन का विवाद होता रहा है। अब अकालीदल ने भी साथ छोड़ा तो राजनैतिक विश्लेषक इसे बिछड़े सभी बारी-बारी की तर्ज पर देख रहे हैं। इसमें भाजपा की हठधर्मिता को जिम्मेदार बताया जा रहा है। खुद हरसिमरत कौर ने कहा कि ऐसे कानून को संख्या के दम पर लोगों पर थोपा जा रहा है। मैं ऐसी सरकार का हिस्सा नहीं बन सकती जो ऐसा कानून मेरे अपनों पर थोप दें, जिससे इनका भविष्य खराब हो सकता है।

लेकिन यह कोई पहली बार नहीं है जब भाजपा ने अपने बहुमत के बूते ऐसा फैसला लिया हो, जो बहुतों को नागवार गुजर रहा है या जिससे बहुतों का भविष्य खराब हो सकता है। सीएए, एनआरसी, जम्मू-कश्मीर विभाजन भाजपा के अड़ियल रवैये की चंद मिसालें हैं। लेकिन तब हरसिमरत कौर को इसमें कुछ गलत नहीं लगा। दरअसल उनका मौजूदा विरोध सुविधाजनक राजनीति का नतीजा है। इस वक्त कृषि विधेयकों के अलावा शिअद को इस बात पर भी आपत्ति है कि पंजाबी, खासकर सिखों से जुड़े मुद्दों पर भाजपा लगातार असंवेदनशीलता दिखा रही है, जम्मू-कश्मीर में आधिकारिक भाषा श्रेणी से पंजाबी भाषा को बाहर करना इसका एक उदाहरण है। बीते कुछ समय से शिअद और भाजपा में थोड़ी अनबन दिखाई दे ही रही थी, इसलिए अलग होने का कारण मिलते ही कई दशकों का यह साथ छूट गया।

शिअद और भाजपा वैसे तो 1997 से साथ हैं, जब बाजपेयी-अडवानी काल में एनडीए अस्तित्व में आया था। लेकिन शिरोमणि अकाली दल और जनसंघ पंजाब में 1967 में ही साथ आ गए थे। तब शिअद के जस्टिस गुरनाम सिंह ग्रेवाल के नेतृत्व में जनसंघ के सहयोग से पंजाब में पहली बार गैरकांग्रेसी सरकार बनी थी, जनसंघ के डॉ. बलदेव प्रकाश ने वित्त मंत्री का पद इस सरकार में संभाला था। इस सरकार का कार्यकाल लंबा नहीं रहा।

लेकिन 1969 में फिर जस्टिस ग्रेवाल मुख्यमंत्री बने और इस बार जनसंघ के बलरामजी दास टंडन को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। इस तरह कह सकते हैं कि शिअद और आज की भाजपा जनसंघ के वक्त से साथ हैं। ये साथ दोनों की राजनैतिक सुविधा के मुताबिक बनता या छूटता रहता है। 1997 में पंजाब की सामाजिक परिस्थितियों के कारण अकाली दल और भाजपा साथ आए। प्रकाश सिंह बादल और अटलबिहारी बाजपेयी इस गठबंधन को निभाते रहे। लेकिन मोदी-शाह युग की भाजपा में अकाली दल की खिन्नताएं बढ़ने लगी थीं।

2017 के विधानसभा चुनावों के वक्त पंजाब में नशे के कारोबार पर अकाली दल और भाजपा के बीच अनबन हुई, हालांकि फिर भी गठबंधन की खातिर दोनों ने चुनाव मिलकर लड़ा, जिसमें दोनों को हार मिली। 2019 के चुनाव में अकाली दल ने भाजपा से अधिक सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, और फिर उसे शिकस्त खानी पड़ी। सीएए के मुद्दे पर नाराज अकाली दल ने पहले तो भाजपा का विरोध किया, लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस नाराजगी के बावजूद भाजपा का साथ दिया।  कभी हां, कभी ना कहते-कहते शिअद अब भाजपा से अलग हो गया है। अब ये अलगाव कितना लंबा रहता है, ये देखना होगा। वैसे हरियाणा में जेजेपी भी क्या ऐसा ही कोई कदम उठाकर खट्टर सरकार का साथ छोड़ती है, ये देखना भी दिलचस्प होगा।

(देशबंधु)

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