क्या फ़र्ज़ी खबरों को अदालत में सबूत बनाएगी दिल्ली पुलिस.?

Desk

-पंकज चतुर्वेदी।।

17 हज़ार पेज की चार्ज शीट , 11 लाख पेज के सबूत के दावों के बावजूद दिल्ली पुलिस , जिसने ईडी सहित केंद्र की कई एजेंसियों को काम पर लगा रखा है, एक पुख्ता सबूत नहीं गढ़ पायी – जिससे साबित हो कि दिल्ली में दंगा और सी ए ए विरोधी आन्दोलन में कुछ सम्बन्ध था , अब वह फर्जी ख़बरों में लिप्त हो गयी है। आज के दैनिक जागरण में खबर है कि दंगों में एक सौ बीस करोड़ रूपये का इस्तेमाल हुआ , जबकि पुलिस की जांच अभी तक महज एक करोड़ बीस लाख की बात कर रही है , खबर को पढ़ें एक बार नहीं तीन तीन बार एक सौ बीस करोड़ लिखा है — जाहिर है कि इसे टायपो- एरर नहीं कहा जा सकता . ताहिर हुसैन एक माध्यम स्तर का व्यापारी है, उसके चार कारखाने थे जिसमें कोई चालीस लोग कम करते थे — इतने बड़े व्यापारी के खाते में एक करोड़ के लेन- देन पर ई डी उसे अपनी हिरासत में 10 दिन रख चुकी , उसके सभी घर पर छापा मार लिया — फिर भी कुछ हाथ लगा नहीं — अब लफ्फाजी पर भरोसा रह गया .

आज के अमर उजाला और नवोदय टाईम्स में लगभग एक जैसी खबर– शब्द भी एक जैसे — दोनों संवाददाता की लाईन से– जाहिर है कि किस एजेंसी की नहीं है कि सामग्री व् शब्द एक जैसे हों .
दोनों में दिल्ली दंगों में पाकिस्तान, खालिस्तान का प्रवेश करवा दिया – शाहीन बाग़ में पंजाब से लंगर लगाने आये सैंकड़ों सिखों को एक झटके में पाकिस्तानी -समर्थक घोषित कर दिया गया .
जिस लव प्रीत का इस रिपोर्ट में उल्लेख है , उसे पंजाब पुलिस ने फेसबुक पर उसके प्रोफाईल पर खालिस्तानी लिखने पर पकड़ा था, फिर उससे एक अटते की जब्ती दिखाई थी . यह लव प्रीत बामुश्किल 22 साल का लड़का है जो कैथल के पास एक गाँव में सी सी इवी लगाने वाले के यहाँ नोकरी करता था, इसके घर के लोग खेतों में मजदूरी करते हैं – मंडोली जेल में बंद लवप्रीत के पास दो जोड़ी कपडे तक नहीं हैं और उसके घर वाले अभी तक उससे मिलना तो दूर, बात भी नहीं कर पाए हैं —

दिल्ली पुलिस पांच दिन से जो सनसनी फैला रही है , बड़े नामों के दंगे में शामिल होने पर, उसका आधार पहले से झूठे मामलों में गिरफ्तार खालिद सैफी जैसे लोगों के बयान को बनाया गया है – खालिद को पुलिस अभिरक्षा में बुरी तरह मारा गया था – उसका सर फाड़ दिया था, दोनों टांगें तोड़ दी थीं, — उनके नाम पर पुलिस ने खुद एक बयान लिखा और जबरिया अंगूठे लगवाये– कई खाली कागजों पर पुलिस दस्तखत लेती ही है,
न कोई प्रमाण , न कोई दस्तावेज- बस अभियुक्तों के बयान, एक काल्पनिक कहानी और पहले से तय की गयी कहानी को रचने के उकर्म में शामिल दिल्ली पुलिस देश के साथ धोखा कर रही है — एक तो असली मिज्रिम आज़ाद हैं, दूसरा आज़ादी के बाद के पहले मुस्लिम महिलाओं के नव जाग्रान को बदनाम कर जन आन्दोलन को कुचल कर लोकतंत्र की मूल आत्मा को मार रही है — तीसरा निरोश लोगों को जेल में डाल कर मानवाधिकारों को कुचल रही है — सबसे बड़ी बात आबादी के बड़े वर्ग के दिल में संविधान, पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति अविश्वास का भाव भर कर देश को कमजोर कर रही है दिल्ली पुलिस .

आज के अखबारों में जे ऍफ़ रिबेरो का लेख फिर से दिल्ली पुलिस कई कार्य प्रणाली पर सवाल खडा करता है, सरकार के इरादों पर शक जाहिर करता है .

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