कोविड पश्चात दुनिया और बहुजन कार्यकर्ताओं की ज़िम्मेदारी

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-प्रमोद रंजन।।
कहा जा रहा है कि अगर नए कोरोना वायरस के संक्रमण को कड़े लॉकडाउन के सहारे रोका नहीं गया होता तो मानव-आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसकी भेंट चढ़ जाता। लेकिन क्या सच उतना एकांगी है, जितना बताया जा रहा है?

लॉकडाउन के कारण दुनिया भर में लाखों लोग मारे जा चुके हैं और लॉकडाउन खत्म होने के बावजूद, इसके प्रभाव के कारण भारत समेत अनेक मध्यम व निम्न आयवर्ग के देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है। करोड़ों लोग गरीबी और बदहाली में जीने के लिए मजबूर होकर मारे जा रहे हैं।

क्या बदलने वाला है?
कार्यालय और शिक्षण-संस्थानों का जन्म आधुनिक काल की एक उपलब्धि थी। कामकाज और शिक्षा के लिए निर्धारित इन जगहों ने पिछले लगभग 200 सालों में न सिर्फ मानव-मस्तिष्कों को एक साथ लाकर सभ्यता के विकास की नई इबारत लिखी थी, बल्कि एक दूसरे से अलग-थलग पड़े समाजों को एक साथ लाने में भी भूमिका निभाई थी। कोविड-19 के पश्चात दुनिया में कार्यालयों और शिक्षण संस्थानों के मौजूदा स्वरूप के खत्म हो जाना, या बहुत सीमित हो जाना अब तय है। भारत समेत अनेक देशों के उच्च शिक्षण संस्थानों में इस परिवर्तन के लिए नया कानून लागू हो चुका है। भारत में श्रम-कानूनों को लगभग खत्म कर दिया गया है और कंपनियों को कर्मचारियों का शोषण करने की खुली छूट दे दी गई है। शारीरिक श्रम के शोषण और मानसिक तनाव की इस चक्की में  सिर्फ मजदूर ही नहीं, बल्कि सफेद कॉलर कर्मचारी भी पीसे जाएंगे। पत्रकारों-मीडियाकर्मियों के नौकरी और वेतन-भत्ताें से संबंधित अधिकार भी इसी कानून में परिवर्तन के तहत खत्म किए जा चुके हैं। 

सफेद व ब्लू कॉलर कर्मचारियों की छंटनी की सूचनाओं के बाद अब जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि लॉकडाउन खुलने के बाद व्यावसायिक-नगरों में काम पर लौटे मजदूरों को 12 से 15 घंटे काम करने पर मजबूर किया जा रहा है। इन पंक्तियों के लेखक के बिहार स्थित पैतृक गांव से अनेक मज़दूरों को लॉकडाउन के बाद कंपनियों ने एयरकंशीन्ड बसों में भरकर हजारों किलोमीटर दूर स्थित मुंबई, हैदराबाद, सूरत आदि में  काम पर वापस बुलाया था। लेकिन उनमें से अनेक पिछले सप्ताह वहां से भागकर वापस आ गए हैं। उनका कहना है कि जिस तरह से उनके काम लिया जा रहा था, वह हाड़ तोड़ देने वाला था। उन्हें  उम्मीद है कि उनके इस सत्याग्रही किस्म से विरोध से कंपनियां झुक जाएंगी। लेकिन हम जानते हैं कि उनकी यह उम्मीद दिवा-स्वप्न के अतिरिक्त कुछ नहीं है। भूख उन्हें काम पर वापस ले जाएगी, और हाे सकता है कि उस समय तक वहां उनकी जगह उनसे अधिक भूखे ले चुके होंगे।

बात यहीं तक सीमित नहीं रहेगी। जिस प्रकार से अर्थव्यवस्था के विकास की दर गिरी है, उसे उठाने के प्रयास के दौरान ऐसी असाधारण कोशिशें की जाएंगी, जिसमें निम्न और मध्यवर्ग की एक बड़ी आबादी अपने वर्गीय स्थानों से च्यूत होकर नीचे जाएगी। मध्य वर्ग गरीबी की ओर, और गरीब भूखमरी की ओर बढ़ेंगे। इन तबकों की मानवीय-स्वतंत्रता को अर्थ-व्यवस्था को उपर उठाने की अनिवार्यता तथा अगली महामारी के भय के मिले-जुले तर्क से बाधित किया जाएगा।

मसलन, कहा जाएगा कि राष्ट्र  और समुदायाें को आर्थिक विकास के पथ पर अग्रसर करने के लिए आवश्यक है कि आबादी की रफ्तार रोका जाए। विकास के लिए आवश्यक होता है कि जिस दर से आबादी बढ रही है, उसके अनुपात में विकास की दर अधिक हो। पिछले कुछ दशकों में आई समृद्धि और मावाधिकार, श्रमिकों के हितों की सुरक्षा से संबंधी कानून आदि संवेदनशील की अवधारणाओं की स्थापना के पीछे अनुपातिक रूप से तेज आर्थिक विकास दर भी रही है। समृद्धि ने इन उदार अवधारणाओं का पालन पूँजीपतियों के लिए अपेक्षाकृत आसान बना दिया था।

लेकिन चूंकि अब वर्षों तक इस विकास की दर कम रहेगी इसलिए कहा जाएगा कि नीचे वाले तबके अपनी आबादी कम करें, ताकि विकास और आबादी के बीच संतुलन बन सके। आबादी-नियंत्रण को रोजगार, सरकार द्वारा प्रदत्त लाभाें, अधिकारों आदि से अधिकाधिक जोड़ा जाएगा और इस संबंध में नए कानून, प्रोत्साहन व दंड योजनाएं पेश की जाएँगीं।  तर्क दिया जाएगा कि वे ही लोग विकास का लाभ लेने के अधिकारी हैं जो अपने जैसे ग़रीबों की भीड़ नहीं बढ़ाते हैं और विकास की दर को संतुलित बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं।

इसी प्रकार, संभवत: सरकारें व निजी उद्यम  नौकरियों में मिलने वाले वेतन-भत्तों को विकास की दर से जोड़ने के लिए नियम भी बनाएंगे। इस नियम के तहत कंपनी या राष्ट्र की विकास दर तेज होगी तो वेतन और भत्ता बढ़ेगा और अगर कम होगी तो वेतन-भत्ते भी कम हो जाएंगे। जैसे पिछले कुछ वर्षों से भारत में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम कम-बेशी होते हैं, या जैसे अब रेलवे में किराया कम-बेशी हाेगा, कुछ उसी तरह। कुछ देशों में राजनयिकों के वेतन-भत्ते इसी प्रकार देश की विकास-दर के साथ जुड़े हुए हैं। इसके पीछे तर्क यह होगा कि इससे पारिश्रमिक पाने वाले का मन विकास के साथ अटका रहेगा और वह दुनिया को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए काम करेगा। लेकिन मानवधिकारों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इसकी कल्पना बहुत कठिन नहीं है।

ऐसे और भी अनेक परिवर्तन होंगे, जिनमें सबसे जबर सर्वव्यापी डिजीटल सविलांस होगा, जो मनुष्य की आजादी को न्यूनतम स्तर पर पहुंचा देने की क्षमता रखता है।

जब इतने परिवर्तन होंगे तो स्वभाविक रूप से मौजूदा उदार-लोकतंत्र इनके दबाव को नहीं झेल पाएगा। लोकतंत्र की इस प्रणाली का जन्म जिन परिस्थितियों में हुआ था, उनके बदल जाने के बाद राजनीतिक व्यवस्था में भी परिवर्तन अवश्यंभावी होगा। लॉकडाउन के दौरान दुनिया के “सुपर रिच” की संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि हुई है। उनकी रूचि भी ऐसी ही किसी राजनीतिक व्यवस्था में होगी, जिसका उन्हें बार-बार प्रबंधन करने की आवश्यकता न हो।

ऐसे में आशंका है कि निरंकुशता और वंशवाद पर आधारित राजनीतिक प्रणाली भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था का स्थान लेने की कोशिश करेगी।

सामाजिक परितर्वन के लिये प्रतिबद्ध लोगों के लिए कुछ मूल प्रश्नों पर नजर बनाए रखना विशेष तौर पर आवश्यक है, ताकि हम इन परिवर्तनों के दौरान वंचित तबकों के हितों की रक्षा लिए संघर्ष कर सकें।


बीमारियों के महासागर में कोविड-19 की जगह
इस कड़ी में यह देखना सर्वाधिक आवश्यक है कि जिस कोविड-19 के भय से इतने बड़े परिवर्तनों के घटित होने की आशंका है, वह भय कितना वास्तविक है?
क्या सामाजिक और आर्थिक  रूप से कमजोर समूहों को कोरोना वायरस से उतना ही खतरा है, जितना कि अन्य बीमारियों और भुखमरी से; जिसकी अब आहट सुनाई देने लगी है? या, इन वर्गों में इस खतरे को महसूस करने के स्तर में गुणात्मक भिन्नता है? ‘मजदूर समाचार’ नामक पत्रिका के संपादक शेर सिंह कहते हैं कि काेविड-19 “साहबों” की बीमारी है। उनका यह आकलन ठीक है। वंचित तबका भी अपने जीवन अनुभव के कारण ही इस बीमारी को उस गंभीरता से नहीं ले रहा, जिस गंभीरता से उच्च वर्ग ले रहा है।

टी.बी., डायरिया, न्यूमोनिया जैसी घातक बीमारियों से ग्रस्त वंचित तबकों को वह बीमारी कितनी खतरनाक लग सकती है, 80 फीसदी मामलों में जिसके कोई लक्षण ही नहीं दिखते, जिसके 95 प्रतिशत मरीज स्वत: ठीक हो जाते हैं और जिसमें संक्रमित व्यक्ति के मृत्यु का जोखिम (Infection Fatality Rate ) 0·1–1 प्रतिशत के बीच है। वह भी अधिकांश 60 से 85 साल के लोगों के बीच। उनमें भी अधिकांश वे; जो हृदय-रोग, कैंसर, किडनी, हाइपरटेंशन आदि ‘अभिजात’ बीमारियों से बुरी तरह पीड़ित रहे हों।

अव्वल तो भारत के वंचित तबक़ों में इस आयु वर्ग के लोगों की संख्या ही विशेषाधिकार प्राप्त तबकों की तुलना में कम है। वर्ष 2004 से 2014 के बीच के एक अध्ययन के अनुसार, अनुसूचित जनजातियों यानी आदिवासियों की औसत जीवन-प्रत्याशा (mean age) 43 वर्ष, अनुसूचित जातियों यानी दलितों की 43 वर्ष, ओबीसी मुसलमानों यानी पसमांदा मुसलमानों की 50 वर्ष और उच्च जाति मुसलमानों यानी अशराफ मुसलमानों की 49 वर्ष है। जबकि गैर-मुसलमान उच्च जाति के लोगों यानी सवर्ण तबके (हिंदू व अन्य गैर-मुसलमान) की औसत जीवन प्रत्याशा 60 वर्ष है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि उच्च जातियों के सभी लोग 60 वर्ष जीते हैं और वंचित तबकों में 43 से 50 साल। लेकिन फिर भी यह अध्ययन बताता है कि इन तबकों की औसत उम्र में बहुत ज्यादा फर्क है तथा वंचित तबकों की पौष्टिक भोजन, मनुष्योचित जीवन-स्थितियों तथा स्वास्थ सुविधाओं तक पहुंच विशेषाधिकार प्राप्त तबकों की तुलना में बहुत कम है।

उपरोक्त अध्ययन में जाति और धर्म से इतर मजदूर और गैर-मजदूरों की औसत उम्र को भी देखा गया था। एक भारतीय मजदूर की औसत उम्र 45.2 वर्ष है, जबकि समान श्रेणी के गैर-मजदूर की औसत उम्र 48.4 वर्ष है। इसी तरह, एक ‘पिछड़े’ या कम विकसित राज्य में रहने वाले और विकसित राज्य में रहने वाले लोगों की औसत उम्र में बड़ा फर्क है। “पिछड़े राज्यों” ने अपने नागरिकों की उम्र सात साल कम कर दी है। विकसित राज्य में रहने वाले लोगों की औसत उम्र 51.7 वर्ष है, जबकि पिछड़े राज्यों की 44.4 वर्ष।

इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ दलित स्टडीज द्वारा 2013 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार (जिसे बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अपने स्त्रियों संबंधी एक विशेष अंतराष्ट्रीय अध्ययन में उद्धृत किया ) दलित और उच्च जाति की महिलाओं की औसत उम्र में 14.5 साल का अंतर था। दलित महिलाओं की औसत जीवन-प्रत्याशा 2013 में 39.5 वर्ष थी जबकि उंची जाति की महिलाओं की 54.1 वर्ष।

हालांकि हिंदुओं के अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के संबंध में ऐसा कोई अध्ययन उपलब्ध नहीं है लेकिन हम जानते हैं कि पौष्टिक भोजन के अभाव से ग्रस्त, कड़ा शारीरिक श्रम करने वाले इन ग्रामीण कृषक, पशुपालक और शिल्पकार समुदायों की औसत उम्र भी बहुत कम है।

सिर्फ औसत उम्र के कारण ही नहीं, बल्कि अन्य अनेक अवांछनीय कारणों से भी कोविड : 19 वंचित तबकों की स्वभाविक प्राथमिकता सूची जगह नहीं पा सकती है। मसलन, उपरोक्त अध्ययन में यह त्रासद तथ्य भी पाया गया था कि 2004 से 2014 के बीच के 10 सालों में  जहां सभी तबकों की औसत उम्र बढी वहीं आदिवासियों की औसत उम्र कम हो रही थी।

बहुजन तबके कोविड से कहीं बहुत बड़े हमलों से पहले ही घिरे हुए हैं और कोविड के परिणाम-स्वरूप जो होने वाला है, उसकी भयावहता का अधिकांश हिस्सा भी इन्हीं की ओर धकेल दिया जाएगा।

फिलहाल हम बीमारियों की घातकता के अंतर को ही देखें तो पाते हैं कि
टी.बी., डायरिया जैसे रोग अधिकांश गरीब युवा लोगों को मौत के लिए चुनते हैं और न्यूमोनिया गरीब बच्चों को। कमजोर तबकों के लिए ये बीमारियाँ शाश्वत महामारी बनी हुईं हैं और जैसा कि हम आगे देखेंगे; इनसे होने वाली मौतों की संख्या कोविड की तुलना में बहुत ज्यादा है।

कुछ और आंकड़े
विश्व में हर साल लगभग 1 करोड लोगों को टी.बी. के लक्षण उभरते हैं, जिसे हम सामान्य भाषा में “टी.बी. हो जाना” कहते हैं। 2018 के आंकड़ों के अनुसार, इन एक करोड़ लोगों में से लगभग 15 लाख लोगों की हर साल मौत होती है। 

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, नाइजीरिया व दक्षिण अफ्रीका एवं अन्य देशों के ग़रीबों के लिए सबसे घातक टी.बी. का संक्रमण है। यह कोरोना की तुलना में बहुत घातक है। टी.बी. में अगर पूर्ण इलाज न मिले तो मृत्यु की संभावना 60 प्रतिशत तक होती है। जबकि जैसा कि पहले कहा गया, कोविड से मौत की संभावना एक प्रतिशत से भी कम होती है। हां, यह ठीक है कि टीवी का इलाज उपलब्ध है, इसके बावजूद न सिर्फ टीबी से मरने वालों की संख्या कोविड की तुलना में बहुत ज्यादा है, बल्कि इसका प्रसार भी तेजी से हो रहा है। और  ऐसा भी नहीं है कि कोविड दुनिया की एकमात्र ला-इलाज बीमारी है। एचआईवी, डेंगू, इबोला, आदि के अतिरिक्त अनेक जानलेवा संक्रामक बीमारियाँ  अब भी ला-इलाज़ हैं। इनकी न कोई निर्धारित कारगर दवा है, न टीका। यहां तक कि सामान्य फ्लू, जिसे हम वायरल बुखार कहते हैं, उसकी भी कोई दवा या कारगर टीका विकसित नहीं हुआ है। यह वायरल बुखार भी हर साल लाखों लोगों की जान लेता है। इन सभी बीमारियों से हम उसी तरह अपने शरीर की प्रतिरोधक-क्षमता (इम्युन सिस्टम) के सहारे लड़ते और जीतते हैं, जैसे कि कोविड से।

कोविड के भय के अनुपातहीन भय समझने के लिए लेख के साथ प्रकाशित चार्ट में कुछ प्रमुख बीमारियों से संबंधित आंकड़े देखें। चार्ट में दर्शाये गई ‘मृत्यु दर’ का अर्थ है कुल संक्रमित रोगियों (रिपोर्टेड और अनरिपोर्टेड सम्मिलत) में से मरने का वालों का प्रतिशत।

चार्ट में उल्लिखित ‘संक्रमण फैलने की दर’ का अर्थ है कि किसी बीमारी से संक्रमित एक व्यक्ति/जीव कितने अन्य व्यक्तियों को संंक्रमित करता है। कोरोना वायरस से संक्रमित एक व्यक्ति औसतन 1.7 से लेकर 6.6 व्यक्तियों तक को संक्रमित कर देता है। जबकि टी.बी.का एक मरीज 10 अन्य व्यक्तियों को संक्रमित करता है। चार्ट में इन रोगों से हर साल मरने वालों की औसत संख्या भी दी गई है।

संक्रामक बीमारियों का वैश्विक आंकड़ा (आधिकारिक स्रोतों से संकलित)

बीमारीमृत्यु दर(Case Fatality Rate)संक्रमण फैलने की दरBasic Reproductive Ratioप्रतिदिन औसतन मौतेंप्रतिवर्ष औसतन मौतेंसंक्रमण का वाहकPrimary mode of Transmissionरोग-जनकPathogen type 

कोविड-19
0·1–1%

 
1.7- 6.6लगभग 10 लाख


(दिसंबर, 19 से सितंबर, 20 तक। आंकड़ों को अतिरेकी ढ़ंग से संकलितकरने के बावजूद)
थूक की बूंदों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क में आने से। संक्रमण के तरीकों की अभी तक पूरी जानकारी नहीं। वायरस 
टी.बी.7-43% 10410915 लाखहवा में उड़ने वाले सूक्ष्म बूंदों से, जो बहुत समय तक वातावरण में मौजूद रहती हैंबैक्टीरिया
न्यूमोनिया5-30%21918 लाखन्यूमोनिया के वायरस और बैक्टीरिया बच्चों की नाक या गले में पाए जाते हैं। संक्रमण के तरीकों की अभी तक पूरी जानकारी नहीं। बैक्टीरिया और वायरस
एचआईवी/एड्स80–90%2-521097.70 लाखशरीर द्रव सेवायरस
मलेरिया0.50-10%8010954 लाखमच्छर काटने से परजीवी
हेपेटाइटिस-सी3-7%10933.99 लाखरक्त के संपर्क में आने सेवायरस
मौसमी इन्फ्लूएंजा (फ्लू)0.10-0.45%2.5794 – 1784
2.90 लाख से 6.5 लाख हवा में उड़ने वाले सूक्ष्म बूंदों से, जो बहुत समय तक वातावरण में मौजूद रहती हैंवायरस 
टायफ़ायड1-30%2.84411.61 लाखमल-कण सेबैक्टीरिया
डायरिया (इलाज नहीं होने पर)5-10%2.1314385.25 लाखमल-कण सेबैक्टीरिया
रैबीज100%1.615055 हजारकुत्ते के काटने से वायरस 


अकेले भारत में हर साल 25 लाख से अधिक लोगों को टी.बी. होती है, जिनमें से हर साल 05 लाख लोगों की मौत हो जाती है। टी.बी. से मौताें के मामले में भारत विश्व में पहले स्थान पर है।

जिन अन्य संक्रामक बीमारियों से दुनिया के सबसे अधिक गरीब लोग मरते हैं, उनका आधिकारिक आंकड़ा इस प्रकार है : डायरिया से हर साल लगभग 10 लाख, न्यूमोनिया से 8 लाख, मलेरिया से 4 लाख, हेपेटाइटिस-सी से 3.99 लाख और हैजा से लगभग 1.43 लाख लोग मरते हैं।

भारत में न्यूमोनिया से हर साल 1.27 लाख लोग मरते हैं, जिनमें सबसे अधिक बच्चे होते हैं। न्यूमोनियो से मरने वालों में विश्व में भारत का नंबर दूसरा है। पहले नंबर पर नाइजीरिया है। भारत में हर साल मलेरिया से लगभग 2 लाख लोग मरते हैं, जिनमें से ज्यादातर आदिवासी होते हैं। भारत में हर साल एक लाख से अधिक बच्चे डायरिया से मर जाते हैं। इसी तरह हैजा से भी यहां हर साल हजारों लोग मरते हैं।

जैसा कि मैंने पहले कहा, कोविड-19 की कथित भयावहता, वंचित तबकों के बीच मौत का तांडव करती इन बीमारियों के सामने नगण्य है।

इसी महीने (15 सितंबर, 2020 को) टीबी से बचाव के लिए काम कर रही 10 वैश्विक संस्थाओं ने “टीबी महामारी पर कोविड-19 का प्रभाव: एक सामुदायिक परिप्रेक्ष्य” शीर्षक एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इस रिपोर्ट में अनुसंधानकर्ताओं ने पाया है कि लॉकडाउन के प्रभाव और सारे संसाधनों को कोविड के इलाज में झोक दिए जाने के कारण 2021 में टीबी से 5 लाख 25 हजार अतिरिक्त लोग मरेंगे। इसके अलावा, आने वाले कुछ वर्षों में लगभग 30 लाख अतरिक्त लोग टीवी से सिर्फ इसी कारण मारे जाएंगे क्योंकि टीवी से मरने वाला तबका ऐसी भयंकर गरीबी में जाने वाला है, जहां न उसे इलाज की परवाह होगी, न ही उसके लिए इलाज उपलब्ध होगा।

कोविड के लिए उठाए गए अतिरेकपूर्ण कदमों के कारण  सिर्फ टीबी ही नहीं, एचआईवी,  किडनी-रोग, कैंसर आदि से मरने वालों में संख्या में इसी प्रकार बेतहाशा वृद्धि हो रही है।

लॉकडाउन का असर
इन बीमारियों से होने वाली मौतों के अतिरिक्त लॉकडाउन के कारण स्थिति कितनी खौफनाक होती जा रही है, इसकी बानगी देखें। जॉन्स हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं द्वारा विश्वप्रसिद्ध स्वास्थ्य जर्नल ‘द लैंसेट ग्लोबल’ में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, अगर बचाव के लिए बहुत तेजी से कदम नहीं उठाए गए तो लॉकडाउन के कारण बढ़ी बेरोज़गारी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव कारण अगले केवल छह महीने में भारत में लगभग 3 लाख बच्चों को कुपोषण व अन्य बीमारियों से मारे जाने के आशंका है। इस शोध के अनुसार दक्षिण एशिया में लगभग 4 लाख बच्चे इस कारण मारे जा सकते हैं। यानी, दक्षिण एशिया में हर रोज 2400 बच्चों की अतिरिक्त मौतें होंगी। भारत के अतिरिक्त पाकिस्तान में 95,000 बच्चे, बांग्लादेश में 28,000, अफगानिस्तान में 13,000, और नेपाल में 4,000 बच्चे अगले छह महीने में लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान के कारण मर जाएंगे। वैश्विक स्तर पर निम्न और मध्यम आय वाले 118 देशों में तीन परिदृश्यों के आधार पर किए गए इस विश्लेषण का अनुमान है कि इन छह महीनों में 12 लाख  अतिरिक्त बच्चे अपने पांचवा जन्मदिन देखने से पूर्व काल के गाल में समा जाएंगे। यह संख्या आम दिनों में कुपोषण व अन्य बीमारियों से होने वाली मौतों के अतिरिक्त है। यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रेन्स  एमरजेंसी फंड (यूनिसेफ/UNICEF) के दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय निदेशक, जीन गफ ने पिछले दिनों इस संबंध में एक बयान जारी कर कहा कि “हमें हर कीमत पर दक्षिण एशिया में माताओं, गर्भवती महिलाओं और बच्चों की रक्षा करनी चाहिए। महामारी से लड़ना महत्वपूर्ण है, लेकिन हमें मातृ और बाल मृत्यु को कम करने की दिशा में दशकों में हुई प्रगति की गति को कम नहीं करना चाहिए।

हम सब जानते हैं कि कुपोषण और इलाज के अभाव में बच्चों की मौत किस तबके में होती है। यह उन लोगों की समस्या नहीं है, जो सरकार को लॉकडाउन बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, न ही यह उनकी समस्या है, जिनके लिए लॉकडाउन के दौरान टी.वी. सीरियलों के नए एपिसोडों का प्रसारण नहीं होना सबसे बड़ी पीड़ा का सबब रहा है।

लॉकडाउन के कारण दुनिया पर इतिहास के सबसे भयावह अकाल की छाया मंडरा रही है, जिसे अध्येता ‘कोविड-19 अकाल’ का नाम दे रहे हैं।  यह अकाल कितना बड़ा है इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि 2020 के अंत तक ही 13 करोड़ अतिरिक्त लोगों के भुखमरी की स्थितियों में पहुंच जाने तथा 4.9 करोड़ अतिरिक्त लोगों को घनघोर गरीबी में धकेल दिए जाने का अनुमान है। डब्ल्यूएफपी की नई वैश्विक भूख निगरानी प्रणाली ‘हंगर मैप’, जो वास्तविक समय में भूखी आबादी को ट्रैक करती है, के अनुसार, फरवरी से लेकर जून, 2020 के बीच 4.5 करोड़ लोग संभवत: भयानक खाद्य संकट में धकेले जा चुके हैं।

एक प्रमुख स्वयंसेवी संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, कोविड-19 से बचाव के लिए अपनाए गए विवेकहीन उपयों से पैदा हुई सामाजिक और आर्थिक स्थितियों के कारण इस साल के अंत तक हर रोज लगभग 12 हजार लोग ठीक से भोजन नहीं मिलने कारण मौत के मुंह में समा सकते है, अगले तीन महीनों में इनकी संख्या 3 लाख लोग प्रतिदिन तक रह सकती है।  अनेक संस्थाओं का आकलन है कि दक्षिण एशिया के देश, विशेष कर  भारत; भूख की महामारी के एक नए, विशालकाय एपिक सेंटर (उपरि केंद्र) के रूप में उभर रहा है।

बताने की आवश्यकता नहीं कि भारत में “कोविड:19 अकाल” में मरने वाले लोग किस तबके के होंगे।

बहुजन कार्यकर्ता क्या करें?
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और विश्व असमानता डेटाबेस, पेरिस के सह-निदेशक थॉमस पिकेटी का अनुमान है कि 2020 की यह कोविड-19 महामारी दुनिया के अनेक देशों में बड़े परिवर्तनाें का वाहक बनेगी। मुक्त-व्यापार और बाजार की गतिविधियों पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाए जाने संबंधी विमर्श को चुनौती मिलेगी और इनकी गतिविधियों में हस्तक्षेप करने की मांग समाज से उठेगी।

लेकिन सामाजिक रूप वंचित तबकों के संदर्भ में इन मांगों का नतीजा क्या होगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि दुनिया के मजलूम समुदाय, नई समतावादी राजनीतिक संस्कृति के लिए कितनी एकजुटता और प्रतिबद्धता प्रकट करते हैं? यह इस पर भी निर्भर करेगा कि वे संपूर्ण मानव जाति के पक्ष में जाने वाली विश्वदृष्टि का निर्माण कर पाते हैं या नहीं। भारत में इस दौरान लोग अम्बेडकरवादी, समाजवादी और मार्क्सवादी विचारधाराओं की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखेंगे।

जैसा कि मैंने पहले कहा, इतना तय है कि कोविड-19 पश्चात दुनिया वैसी ही नहीं रहेगी, जैसी कि कोविड-19 के पूर्व थी। ऐसे में परिवर्तनकारी समाज-कर्म में जुटे हम सभी कार्यकर्ताओं को अपनी रणनीतियों में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। हमारा संघर्ष अधिक कठिन होने वाला है, लेकिन अगर हम समय रहते ठोस योजनाएं बनाएं और लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल हों, ताे इस संक्रमण काल को अपनी शाश्वत सामुहिक-तबाही में बदलने से हम रोक सकते हैं। हमें तत्काल इन कोशिशों में जुट जाना चाहिए।

(नई दिल्ली से प्रकाशित भारत के सामाजिक रूप से शोषित तबकों के लिए समर्पित हिंदी मासिक ‘दलित-दस्तक’ के जुलाई-अगस्त, 2020 अंक में प्रकाशित लेख का परिवद्धित संस्करण)

[ बहुजन-पत्रकारिता के लिए जाने जाने वाले प्रमोद रंजन की दिलचस्पी  संचार माध्यमों की  कार्यशैली के अध्ययन, साहित्य व संस्कृति के सबाल्टर्न पक्ष के विश्लेषण और आधुनिकता के विकास में रही है। ‘मीडिया में हिस्सेदारी’, ‘साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ई वी रामासामी पेरियार के प्रतिनिधि विचारों पर केन्द्रित पुस्तकाकार तीन खंड और ‘शिमला-डायरी’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। कोविड -19 पर केन्द्रित उनकी पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य है। प्रमोद रंजन इन दिनों असम विश्वविद्यालय के रवीन्द्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज़ में सहायक-प्रोफ़ेसर हैं। संपर्क : +91-9811884495, [email protected]]

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