गावस्कर का आत्मघाती मजाक खासा महंगा पड़ा

गावस्कर का आत्मघाती मजाक खासा महंगा पड़ा

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-सुनील कुमार।।
हिन्दुस्तानी क्रिकेट के एक बड़े नामी-गिरामी और इज्जतदार भूतपूर्व खिलाड़ी, वर्तमान कमेंटेटर सुनील गावस्कर अपनी एक लापरवाह एक टिप्पणी को लेकर ऐसे बुरे फंसे हैं कि उन्होंने कभी ऐसा सोचा भी नहीं होगा। गावस्कर का नाम तमाम विवादों से परे रहते आया है, और उनके बारे में यह कल्पना भी मुश्किल है कि वे किसी महिला पर ओछी बात कहेंगे या लिखेंगे, लेकिन उन्होंने ठीक यही किया है। अभी कमेंट्री करते हुए गावस्कर ने विराट कोहली के कमजोर खेल पर उन्होंने कहा- उन्होंने लॉकडाऊन में तो बस अनुष्का की गेंदों की प्रैक्टिस की है।

इस ओछी बात पर अनुष्का शर्मा ने गावस्कर की जमकर खबर ली है। सोशल मीडिया पर अपने अकाऊंट में अनुष्का ने लिखा- मिस्टर गावस्कर आपकी बात बड़ी विचलित करने वाली है, और बहुत बुरे टेस्ट की है, लेकिन मैं चाहूंगी कि आप मुझे यह बताएं कि आपने किसी के खेल के लिए उसकी पत्नी को जिम्मेदार ठहराने वाला ऐसा बयान क्यों दिया? मुझे भरोसा है कि बीते बरसों में आपने हर खिलाड़ी के खेल पर टिप्पणी करते हुए उसकी निजी जिंदगी का सम्मान किया होगा। आपको यह नहीं लगता कि मेरे लिए, और हमारे लिए आपको वैसा ही सम्मान दिखाना चाहिए था? मुझे पूरा भरोसा है कि मेरे पति के खेल-प्रदर्शन पर टिप्पणी करने के लिए आपके पास बहुत से दूसरे शब्द और वाक्य हो सकते थे, यह 2020 का साल चल रहा है, और मेरे लिए चीजें अभी तक बदली नहीं हैं। कब तक ऐसी टिप्पणियां करने के लिए मेरे नाम को क्रिकेट में घसीटा जाता रहेगा? सम्माननीय मिस्टर गावस्कर, आप एक महान व्यक्तित्व हैं जिनका नाम जेंटलमैन लोगों के इस खेल में बड़ा ऊंचा माना जाता है। मैं आपको महज यह बतलाना चाहती थी कि जब मैंने आपको यह कहते सुना, मैंने क्या महसूस किया।

यह मामला हालांकि गिने-चुने शब्दों का है, लेकिन इस पर लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि गिने-चुने शब्द कितने घातक हो सकते हैं, कितने आत्मघाती हो सकते हैं, इसकी यह एक शानदार मिसाल है। गावस्कर को लेकर आमतौर पर इज्जत से ही बात होती है, और यह भी हो सकता है कि वे जिस अंग्रेजी जुबान में कमेंट्री करते हैं, उस जुबान में बोलचाल में इस तरह की छूट लेने का रिवाज रहा हो। यह भी हो सकता है कि खिलाड़ी भावना की उम्मीद के साथ उन्होंने यह मजाक किया हो, लेकिन मजाक तभी तक मजाक रहता है जब तक वह जिसके साथ किया गया हो वह भी उसे मजाक की तरह ले। अगर उसने उसे अपमान की तरह ले लिया, तो फिर वह मजाक नहीं रह जाता, वह अपमान ही हो जाता है।
हमारा ख्याल है कि गावस्कर इसमें बहुत बुरे फंसे हैं। क्रिकेट कमेंटेटर खेल के अलावा और भी बहुत सी मजाकिया बातें करते रहते हैं क्योंकि यह खेल हॉकी या फुटबॉल की तरह तेज रफ्तार नहीं होता जिसमें बोलते चले जाने पर भी वक्त कम पड़ता हो। क्रिकेट तो ऐसी मुर्दा रफ्तार का खेल है कि जिसमें आसमान के इन्द्रधनुष से लेकर दर्शकदीर्घा की सुंदरी की कान की बालियों तक कैमरे से दिखानी पड़ती है, और उसके बारे में बोला भी जाता है। ऐसे खेल में लगातार बोलते हुए इस एक चूक ने गावस्कर के लिए यह बड़ी शर्मिंदगी पैदा कर दी है।

लेकिन हम इसके साथ-साथ एक दूसरी बात की वजह से भी इस मुद्दे पर आज यहां लिख रहे हैं। वैसे तो अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की जितनी उम्र होगी, उतने बरस गावस्कर को क्रिकेट खेले, और छोड़े हो चुके होंगे। लेकिन अनुष्का ने इस मुद्दे को उठाकर महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक बड़ा बयान खड़ा किया है, जिसके बारे में सोचने की जरूरत है। हिन्दुस्तान का सोशल मीडिया, यहां का साहित्य, यहां के कार्टून, यहां के व्यंग्य, ये सब औरत और पत्नी को मजाक का सामान बनाकर चलते हैं। हम महिलाओं के साथ भाषा और समाज की सोच की ज्यादती पर अक्सर लिखते हैं। आज एक महिला ने जिस तरह गावस्कर की खबर ली है, उससे बहुत से और लापरवाह बड़बोले कुछ तो समझेंगे कि उनकी बेसमझी की बातें जरूरी नहीं हैं कि केवल लोगों को गुदगुदाकर शांत हो जाएं। वे बातें हो सकता है कि बूमरैंग की तरह घूमकर लौटें, और उसे चलाने वाले को ही जख्मी कर जाएं। गावस्कर की बात मजाक रहते हुए भी एक घटिया मजाक की तरह दोहरे मतलब वाली बात थी। उन्हें सुनने वाले तमाम लोगों ने उनके शब्दों से अनुष्का के बारे में क्या कल्पना की होगी, यह सोचना कोई मुश्किल काम नहीं है। इसलिए एक महिला ने, गावस्कर के मुकाबले बड़ी कमउम्र की महिला ने जिस तरह से उन्हें जवाब दिया है, वह भी बड़ा शानदार कदम है। लोगों को अपने अधिकार और अपने सम्मान के लिए ऐसे ही चौकन्ना रहना चाहिए। यह बात सिर्फ व्यक्ति और निजी स्तर की बात नहीं है, यह सार्वजनिक रूप से कही गई बात है, और महिलाओं के सारे तबके को अपमानित करने वाली बात है।

कुछ शब्दों से खड़े हुए इस विवाद को लेकर यह समझने की जरूरत है कि जब माईक पर लगातार बोलने के लिए ही दसियों लाख रूपए मिलते हों, तब भी चटपटी और गुदगुदी बात कहते हुए यह तौल लेना चाहिए कि वह कितनी घातक हो सकती है। दूसरी बात यह कि अगर आपके खिलाफ किसी बड़े ने भी ओछी बात कही है, तो उसका विरोध करना चाहिए, न कि बुजुर्गियत का सम्मान करते हुए मन मारकर चुप बैठ जाना चाहिए। आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से समर्थन या विरोध करने के लिए लोग तुरंत जुट जाते हैं, और विराट कोहली और अनुष्का शर्मा के प्रशंसकों ने तुरंत ही गावस्कर को कमेंटरी से हटाने की मांग उठा दी है। लेकिन अपनी लड़ाई महज दूसरों के कंधों पर नहीं छोडऩी चाहिए, लोगों को खुद भी प्रतिकार करना चाहिए, और इतना हौसला दिखाने के लिए अनुष्का शर्मा बड़ी तारीफ की हकदार है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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