बिजूका सरकार और पूंजीपति टिड्डी दल

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संसद का इस बार का मानसून सत्र कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। सरकार का निरंकुश रवैया खुलकर देश ने देख लिया। हालांकि गोदी मीडिया ने बहुत कोशिश की कि इस देश की जनता केवल बॉलीवुड में ड्रग्स की समस्या को देखे, और थोपी हुई खबरों की मदहोशी में रहे, लेकिन फिर भी सरकार का सच कहीं न कहीं से बाहर निकल ही आता है।
जैसे नोटबंदी और जीएसटी के फैसलों का खोखलापन देश ने देख लिया, उसी तरह लॉकडाउन की विफलता भी सामने आ गई। और यह भी नजर आ गया कि लॉकडाउन कोरोना से बचाव के लिए कम, सरकार की मनमानी पर पर्दादारी के लिए अधिक था। राहत पैकेज के नाम पर सरकार जिस तरह की घोषणाएं कर रही थीं, उससे कुछ अंदाजा लग रहा था कि सरकार कैसे सब कुछ उद्योगपतियों के हवाले करना चाहती है और उनका अधिक से अधिक मुनाफा हो, इसके लिए नीतियां बना रही है।
यह अनुमान मानसून सत्र में पुष्टि में बदल गया, जब कृषि विधेयकों और श्रम कानून में बदलाव को सरकार ने बिना किसी चर्चा के मंजूरी दे दी। देश की अर्थव्यवस्था इस वक्त औंधे मुंह गिरी हुई है। कृषि और निर्माण कार्यों में तेजी से अर्थव्यवस्था को सुधारने में काफी मदद मिलेगी।
क्योंकि गांवों से पूंजी का बहाव होगा तो बाजार में मांग बढ़ेगी, उससे उत्पादन बढ़ेगा और रुका हुआ अर्थचक्र फिर घूमने लगेगा। गांवों को मजबूत कर, भारत के शहरों को भी मजबूती दी जा सकती है। लेकिन मोदी सरकार ने किसानों और मजदूरों के हक को मारने वाले विधेयक लाकर अर्थचक्र को नयी जंजीरों में बांध लिया है। श्रम कानून में बदलाव की सुगबुगाहट लॉकडाउन के वक्त से हो रही थी।
चीन के आर्थिक बहिष्कार के बीच जापान और अमेरिका की कंपनियों को निवेश के लिए आकर्षित करने के नाम पर कई राज्य श्रम कानूनों को पूंजीपतियों के हक में करवाना चाह रहे थे और अब ऐसा ही हो गया है। अब कंपनी मालिकों को कामगारों को काम पर रखना या निकालना आसान हो जाएगा। किसी भी संगठन में काम करने वाला कोई भी कामगार बिना 60 दिन पहले नोटिस दिए हड़ताल पर नहीं जा सकता। मालिकों की सुविधा के लिए कांट्रैक्ट पर अधिक लोगों को रखने की छूट भी मिल गई है।
देश में बेरोजगारी का जैसा आलम है उसमें कुछ नहीं से कुछ भला, मानकर लोग किसी भी हाल में नौकरी करने पर मजबूर होंगे और उनकी मेहनत का फल पूंजीपति को मिले, ऐसी व्यवस्था सरकार ने कर ही दी है। पहले कहा जाता था उत्तम खेती, मध्यम बान, निषिद चाकरी भीख निदान। यानी खेती को सबसे उत्तम और चाकरी यानी नौकरी करने को खराब बताया गया था। मोदीजी ने अपने राज में नौकरी और खेती दोनों को एक बराबर कर दिया और बान यानी व्यापार अब मध्यम नहीं बल्कि सबसे ऊपर हो गया है, देश की सत्ता से भी ऊपर। इस व्यापार यानी कार्पोरेट पूंजी के आगे सब नतमस्तक हैं।

देश में तेल से लेकर खेल तक सब कुछ बेचने वाले पूंजीपतियों को अब खेती पर भी अपना मालिकाना हक चाहिए। इसलिए किसानों की भलाई के नाम पर सरकार सारे विरोध के बावजूद कृषि पर नए कानून बनाने पर तुली है।
विपक्ष कृषि विधेयकों का विरोध कर रहा है, तो सरकार उसे बिचौलियों का हितैषी बता रही है, लेकिन देश के किसान भी इन विधेयकों के विरोध में हैं, तो क्या वे भी बिचौलियों के हितैषी हैं।
25 सितम्बर को किसानों ने भारत बंद का आह्वान किया है। पंजाब में किसान तीन दिन का रेल रोको आंदोलन चला रहे हैं। कई जिलों में रेल ट्रैकों पर किसान अपने घर के बूढ़े-बच्चों के साथ धरने पर बैठे हैं। क्या इन्हें भी अपने भले-बुरे की समझ नहीं है, जो इस महामारी में पूरे परिवार के साथ धरनारत हैं। क्या समझदारी और देशभक्ति पर मोदी सरकार अपना कॉपीराइट समझती है।
अगर ऐसा है, तो फिर सरकार बताए कि किस आधार पर वह विपक्ष और किसानों को यह समझा रही है कि एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था खत्म नहीं होने वाली है। यह सुनिश्चित करने के लिए क्या उसने नए विधेयकों में ऐसा कोई प्रावधान किया है कि कृषि उपज मंडियों के बाहर जो कृषि उत्पाद बेचे जाएंगे, अगर वे एमएसपी से कम पर बिके तो खरीदने वाले पर कोई कार्रवाई होगी।
2014 के चुनाव में भाजपा ने वादा किया था कि वह एमएसपी तय करने के लिए स्वामीनाथन आयोग की सिफारियों को लागू करेंगे, लेकिन बाद में कोर्ट में हलफनामा देकर मोदी सरकार ने कहा था कि ऐसा करना संभव नहीं होगा। वादाखिलाफी की इस पुरानी परंपरा को सरकार आगे भी कायम रखेगी, ऐसी उम्मीद किसानों को है. इसलिए वे अपने भविष्य को लेकर डरे हुए हैं और सरकार से लगातार मांग कर रहे हैं कि विधेयकों को वापस लिया जाए।
सरकार भले अंग्रेजी अखबारों में अंग्रेजी में विज्ञापन देकर किसानों के हित की बात करे, लेकिन भाषा के बंधन से परे किसान अपना अच्छा-बुरा समझते हैं। वे जानते है कि जैसे कर्ज माफी चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा रह गया, जैसे आय दोगुनी करने की बात जुमला बनकर रह गई, वैसे ही एमएसपी पर भी सरकार खोखली बात ही कर रही है। उसका खोखलापन इस बार जिस तरह से एमएसपी में वृद्धि की गई, उससे जाहिर भी हो गया है।

जैसे शिक्षा का अधिकार होने के बावजूद देश में अच्छी और ऊंची शिक्षा पाना सुविधाभोगी वर्ग का ही अघोषित हक बन गया है, वही हाल नए कृषि विधेयकों के बाद किसानों का होगा। जहां कागजों में उनके हक बंध कर रह जाएंगे, सरकार उन पर बिजूका बन कर खड़ी रहेगी, लेकिन साथ ही ये देखेगी कि उनकी मेहनत की फसल पूंजीपतियों के टिड्डीदल चट कर जाएं।

(देशबंधु)

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