विदेश नीति पर विचार की जरूरत..

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‘लोकतंत्र के लिए सबसे जरूरी स्वतंत्र चुनाव नहीं है। इसमें केवल यह पता चलता है कि किसे सबसे अधिक वोट मिला है। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण उन लोगों का अधिकार है जिन्होंने विजेता के लिए वोट नहीं दिया। भारत 7 दशकों से अधिक समय से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र रहा है। भारत की 1.3 अरब की आबादी में ईसाई, मुस्लिम, सिख, बौद्ध, जैन और अन्य धर्मों के लोग शामिल हैं। यह सब भारत में है जिसे अपने जीवन का ज्यादातर समय शरणार्थी के रूप में गुजारने वाले दलाई लामा ने सद्भाव और स्थिरता का उदाहरण बताया है।

नरेंद्र मोदी ने इन सभी को संदेह में ला दिया है। भारत के ज्यादातर प्रधानमंत्री करीब 80 फीसदी आबादी वाले हिंदू समुदाय से आए हैं लेकिन केवल मोदी ही ऐसे हैं जिन्होंने ऐसे शासन किया जैसे उनके लिए कोई और मायने नहीं रखता है।Ó
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर यह तल्ख टिप्पणी टाइम पत्रिका के संपादक कार्ल विक ने की है। अमेरिका से निकलने वाली दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने इस बार दुनिया के सौ प्रभावशाली लोगों की जो सूची जारी की है, उनमें भारतीय प्रधानमंत्री का नाम भी शामिल है। इसके अलावा अभिनेता आयुष्मान खुराना, शाहीन बाग आंदोलन में शामिल 80 बरस की बिल्किस, एचआईवी पर शोध करने वाले रविंदर गुप्ता और गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई का नाम भी इस सूची में है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री होने से आप निश्चित ही दुनिया की प्रभावशाली हस्तियों में शामिल होते हैं, लेकिन उस प्रभाव को आप कितना सकारात्मक और कितना प्रेरक बना पाते हैं, असली कसौटी यही है। मोदीजी पर टाइम ने जिस तरह की टिप्पणी की, वह उनके प्रभाव के नकारात्मक पहलू को दर्शा रही है, जो अच्छी बात नहीं है। भाजपा की ट्रोल आर्मी अब तक इसकी चीर-फाड़ कर चुकी होगी कि ऐसा लिखवाने के पीछे किसकी साजिश थी, कौन सी बुद्धिजीवी ताकतें मोदीजी की छवि बिगाड़ने में लगी हैं। लेकिन इससे उनकी छवि में कितना सुधार आएगा, यह कहा नहीं जा सकता। गौरतलब बात ये है कि प्रधानमंत्री का कार्यभार संभालने के बाद मोदीजी ने धुआंधार विदेश यात्राएं की। मजाक में उन्हें विदेश मंत्री भी कहा जाने लगा। मई 2014 में पद संभालने के बाद सितम्बर तक यानी चार महीनों में उन्होंने अमेरिका समेत 5 देशों की यात्रा कर ली थी। इसके बाद नवंबर 2014 से सितम्बर 2015 तक और 24 देशों की यात्रा की। अभी संसद में विदेश राज्यमंत्री वी. मुरलीधरन ने एक सवाल के जवाब में बताया कि मोदीजी ने मार्च 2015 से नवंबर 2019 के बीच कुल 58 देशों की यात्रा की और इन यात्राओं पर कुल 517.82 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। वी. मुरलीधरन ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री के इन दौरों से द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भारत के दृष्टिकोण के बारे में अन्य देशों की समझ बढ़ी तथा संबंधों में मजबूती आई है। सरकार प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के जरिए संबंधों में मजबूती की बात कर रही है, लेकिन उसे ये भी स्पष्ट करना चाहिए कि ये संबंध व्यक्तिगत स्तर पर मजबूत हुए या इससे देश को भी कोई लाभ पहुंचा है। जैसे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मोदीजी ने दोस्ताना अंदाज में झूला झूला, नौकायान किया। लेकिन आज चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा किया है, उसके कारण हमारे 20 से अधिक जवान शहीद हुए हैं और अब भी दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं। तो इसे मजबूत संबंध कैसे कह सकते हैं। इसी तरह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मोदीजी को अपना अच्छा दोस्त बताते हैं, लेकिन दवा न भेजने पर परिणाम भुगतने की धमकी देते हैं, क्या दोस्ती ऐसे होती है। पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते शुरु से तनाव भरे थे, लेकिन मोदीजी के सत्ता में आने के बाद कश्मीर में सीमा पर मुठभेड़ों या आतंकी हमलों में हमारे सैनिक युद्धकाल से भी ज्यादा शहीद हुए हैं। और अब जम्मू-कश्मीर की नयी राजनैतिक, भौगोलिक दशा के बाद यह तनाव और बढ़ गया है। नेपाल भारत को हमेशा अपना बड़ा भाई या अच्छा दोस्त मानता था। दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी जैसे करीबी संबंध थे, आज उन पर संदेह के बादल छाए हुए हैं। इससे पहले किसी अन्य प्रधानमंत्री के शासन में नेपाल से संबंध इस कदर नहीं बिगड़े थे। कुछ यही हाल बांग्लादेश के साथ है। बांग्लादेश के अस्तित्व में आने से लेकर उसे अपने पैरों पर खड़ा होने की विकास यात्रा में भारत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया और वहां की सरकारें भी इस बात को मानती थीं। लेकिन अब बांग्लादेश भी भारत से दूर होता जा रहा है। सीएए जैसे फैसलों के कारण भारत की मुस्लिम विरोधी छवि बांग्लादेश में बनी। वहां के एक वरिष्ठ पत्रकार ने द इकानामिस्ट पत्रिका को बताया कि भारत हमें वास्तव में स्वतंत्र नहीं समझता है। वे हमारे हर फैसले में दखलंदाजी करते हैं। और ये मानते हैं कि हमारे अधिकारी उनके लिए काम करते हैं। द इकानामिस्ट ने एक लेख में लिखा है कि बीते कुछ समय में बांग्लादेश भारत से दूर हो रहा है और चीन के करीब आ रहा है। हाल ही में सिलहट शहर में नया हवाईअड्डा बनाने का ठेका भारतीय कंपनी ने चीनी कंपनी के हाथों गंवा दिया। इसी महीने तीस्ता नदी पर जलप्रबंधन की एक परियोजना के लिए लगभग एक बिलियन डालर राशि की सहायता चीन ने बांग्लादेश को दी है। पड़ोसी देशों के साथ तो रिश्ते भारत संभाल ही नहीं पा रहा, दूसरे देश भी इसी तरह भारत से छिटक रहे हैं। टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने संरा में जम्मू-कश्मीर का मसला उठा दिया। सऊदी अरब के साथ रिश्ते कूटनीतिक तौर पर तो मजबूत दिखते हैं, लेकिन जिस तरह वहां हजारों भारतीयों की नौकरी जा रही है, उससे कब तक ये संबंध मजबूत रहेंगे, ये देखना होगा। रूस भी अब भारत का वो पुराना मित्र नहीं रहा, जिस पर हर हाल में भारत भरोसा करता था। रूस भी अब अपने नफे-नुकसान के हिसाब से भारत के साथ संबंध निभा रहा है।
दरअसल मोदीजी ने पास और दूर की विदेश यात्राएं तो खूब कीं, लेकिन उनकी विदेशनीति में नेहरूयुगीन दूरदृष्टि नहीं है, बल्कि तात्कालिक लाभ-हानि देखकर रिश्ते निभाए जा रहे हैं। इससे उद्योगपतियों, हथियारों के सौदागरों, बिचौलियों और धर्म के ठेकेदारों को खूब फायदा पहुंच रहा है, लेकिन विश्वपटल पर भारत की साख और धाक दोनों दांव पर लग रही है। आजादी के बाद जब हम आर्थिक रूप से कमजोर थे, तब भी नेहरूजी की दूरगामी सोच के कारण गुटनिरपेक्षता और विश्वशांति की राह पर भारत आगे बढ़ा, जिसने दुनिया को भी एक दिशा दी। भारत को विश्वगुरु बनाने का दावा नेहरू जी ने नहीं किया था, लेकिन इस दावे के बगैर ही भारत की आवा•ा दुनिया में गौर से सुनी जाती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। क्यों नहीं है, इस बारे में मोदी सरकार को सोचना चाहिए।

(देशबंधु)

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