उपवास की राजनीति

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कृषि विधेयकों पर शुरु हुई विरोध की राजनीति चाय पर चर्चा से होते हुए उपवास तक पहुंच गई है। इस राजनीति का दिलचस्प पहलू ये है कि अब इन विधेयकों के बहाने बिहार चुनाव को साधने की कोशिश भाजपा ने शुरु कर दी है। रविवार को राज्यसभा में जिस तरह से इन विधेयकों को ध्वनिमत से पारित कराया गया, उसके बाद उपसभापति हरिवंश के रवैये पर विपक्षी सांसदों ने ऐतराज किया।

विपक्षी दल लगातार मतविभाजन की मांग कर रहे थे। कायदे से अगर एक भी सांसद मतविभाजन की मांग करे तो उपसभापति को उसकी बात सुननी चाहिए, लेकिन हरिवंश जी ने किसी की नहीं सुनी। बीते कुछ समय से संसद में जिस तरह के हंगामेदार दृश्य होते आए हैं, रविवार को भी वैसा ही दृश्य बना, जब उपसभापति के फैसले से नाराज सांसदों ने उनकी कुर्सी के करीब पहुंचने की कोशिश की, विधेयक की प्रति हवा में लहराई और खूब नारेबाजी हुई।  हंगामे के लिए जिम्मेदार 8 सांसदों को सोमवार को सभापति ने सदन से निलंबित कर दिया।

लेकिन सांसदों ने इस फैसले के विरोध में संसद परिसर में ही धरना दिया और वहीं खुले आकाश के नीचे रात गुजारी। इस घटना में एक दिलचस्प दृश्य तब बना जब मंगलवार सुबह हरिवंशजी अपने घर से चाय लेकर आए और धरने पर बैठे सांसदों को चाय परोसी। निलंबित सांसदों ने चाय पीने से इन्कार कर दिया और एक बार फिर किसानों के लिए इंसाफ मांगा। 2014 में चायवाला से लेकर चाय पर चर्चा करवाने के लिए चर्चित हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस चाय की प्याली को फिर राजनीति का सबब बना दिया।

किसानों के हक की बात दरकिनार हो गई और हरिवंशजी ने किस भलमनसाहत से विपक्षी सांसदों को चाय परोसी, यह बात मोदीजी को इतनी पसंद आ गई कि इस पर उन्होंने ट्वीट कर दिया। चाय की प्याली से उठी राजनीति की ये लहरें तब थोड़ा और ऊंचा उठने लगीं, जब हरिवंशजी ने एक मार्मिक चिठ्ठी के साथ एक दिन के उपवास पर रहने का फैसला लिया, ताकि विपक्ष के सांसदों ने उनके मुताबिक जो अमर्यादित आचरण सदन में किया, उस पर आत्मशुद्धि का भाव उन सांसदों के मन में जागृत हो। इस चिठ्ठी में गांधी से लेकर सिताबदियारा के जेपी और रामधारी सिंह दिनकर सबका जिक्र है। दिनकर की कविता के जरिए वैशाली और उसके गणतंत्र को भी याद किया गया है।

चिठ्ठी की भाषा और विचारों को प्रस्तुत करने की शैली से समझ आता है कि हरिवंशजी वाकई बड़े पत्रकार और संपादक रहे हैं। लेकिन इससे एक और बात समझ आती है कि राजनीति में तपते लोहे पर वार कब करना चाहिए, इसका अनुभव भी उन्हें खूब है। ये भी हो सकता है कि हथौड़ा भले हरिवंश जी के हाथ में दिखाई दे रहा हो, लेकिन वार कोई और कर रहा है।  

बिहार चुनाव की घोषणा तो अब तक नहीं हुई है, लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए जदयू और भाजपा की लालसा अभी से बलवती दिख रही है। ये गठबंधन वैसे तो कांग्रेस, राजद के महागठबंधन को अपने से कमजोर मानता है, लेकिन भीतर कहीं न कहीं ये डर भी है कि जदयू-भाजपा के शासन से जनता खुश नहीं है। लॉकडाउन में मजदूरों की वापसी से लेकर क्वांरटीन केंद्रों में बदइंतजामी जैसी सरकार की कई नाकामियों पर जनता नाराज है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य में राज्य पिछड़ा हुआ है, जिसका खामियाजा जनता भुगतती है, अपने बंगलों में बंद रहने वाले मंत्री नहीं। बिहार की गठबंधन सरकार अपनी इन कमजोरियों से जरूर वाकिफ होगी। लेकिन उन्हें दूर करने की जगह अब बिहार के भावनात्मक शोषण की राजनीति की जा रही है।

राज्यसभा के घटनाक्रम को बिहार की अस्मिता से जोड़ा जा रहा है, क्योंकि हरिवंश जी सिताबदियारा की पैदाइश हैं और जदयू ने उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया। उनके खत में पद की मर्यादा को ठेस जैसी बातें हैं, तो मोदीजी इस खत के जरिए लोकतंत्र की नयी इबारत जनता को समझा रहे हैं। सबसे उसे पढ़ने का आग्रह कर रहे हैं। लेकिन भारत का लोकतंत्र क्या है, यह समझने के लिए क्या प्रधानमंत्री से लेकर देश के हरेक नागरिक को संविधान का पाठ नहीं करना चाहिए। जब हम संविधान को समझेंगे, उसे आत्मसात करेंगे तो अपने आप लोकतंत्र की मर्यादा बनाए रखने के लिए काम करेंगे। तब कोई विधेयक केवल इसलिए पारित नहीं होगा, क्योंकि सरकार की जिद यही थी। तब संसद के भीतर औऱ संसद के बाहर विरोध की जो आवाज़ उठ रही है, उसे सुनने का माद्दा सरकार के पास होगा।

मोदीजी को लोकंतत्र की इतनी फिक्र है तो संसद में छह साल में उनके समेत उनके सांसदों ने जब-जब विपक्षी सांसदों का मर्यादा की सीमा के बाहर जाकर मखौल उड़ाया, उस पर उन्हें खेद व्यक्त करना चाहिए। रेनकोट पहनकर बाथरूम में नहाने जैसी टिप्पणियों से लेकर फारुख अब्दुल्ला नजरबंद नहीं हैं, जैसी गलतबयानी सब पर उन्हें और उनके सांसदों को अफसोस होना चाहिए। रहा सवाल हरिवंशजी का, जिन्हें सोमवार रात नींद नहीं आई, क्योंकि वे व्यथित थे। उन्हें यही वेदना इस बात पर भी होनी चाहिए कि उन्होंने मतविभाजन का फैसला क्यों नहीं लिया, ताकि विपक्षी सांसदों को शिकायत का मौका नहीं मिलता।

उन्होंने खुद को गांव का आदमी इस खत में बताया, हालांकि मुंबई, कोलकाता, रांची, दिल्ली इन तमाम जगहों पर उन्होंने बरसोंबरस काम किया है, और ये सब गांव नहीं है। अच्छा है कि वे अपने भीतर गांव लेकर चलते हैं, फिर तो उन्हें ग्रामीणों और किसानों की जमीनी हकीकत का भी खूब पता होगा। इसलिए उन्हें इस बात का भी अफसोस होना चाहिए कि इन विधेयकों पर जिन किसानों से चर्चा होनी चाहिए थी, उससे सरकार ने मुंह मोड़ लिया। इस देश का नागरिक होने के नाते उनकी वेदना भारत के हरेक पीड़ित, शोषित नागरिक के साथ होनी चाहिए, लेकिन फिलहाल यह व्यथा राज्यसभा तक ही सीमित दिखाई दे रही है। वैसे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार ने भी एक दिन का उपवास रखा है।

उन्होंने कहा कि कभी भी कोई बिल ऐसे पास होते हुए नहीं देखा है। सदस्यों को अपने विचार सामने रखने के लिए निलंबित किया गया है, मैं उनके समर्थन में एक दिन का उपवास रख रहा हूं। इस उपवास के साथ कोई भावुक चिठ्ठी नहीं थी, इसलिए उस पर खास चर्चा नहीं हुई। उपवास की इस राजनीति में बाजी कोई भी मारे, लेकिन जब तक उन किसानों की जीत नहीं होगी, जो इस देश का पेट भरते हैं, तब तक लोकतंत्र पर सारी बयानबाजी बेकार है।

(देशबंधु)

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