सत्ता की गुंडागर्दी बिना सजा न खप जाए, यह पुख्ता इंतजाम हो..

सत्ता की गुंडागर्दी बिना सजा न खप जाए, यह पुख्ता इंतजाम हो..

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-सुनील कुमार।।
उत्तरप्रदेश में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी से बड़ी संख्या में बच्चे मारे गए थे, तब खबरों में आए एक लोकप्रिय और समर्पित चिकित्सक डॉ. कफील खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभी कुछ दिन पहले रिहा किया। उन्हें महीनों से योगी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में डाल रखा था। हाईकोर्ट ने उन्हें हिरासत में लेने को पूरी तरह गैरकानूनी बताया। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ.कफील खान को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक प्रदर्शन में हिस्सा लेने पर छह महीने पहले योगी सरकार ने गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया था, और अभी फिर उनकी हिरासत को तीन महीने के लिए बढ़ा दिया था जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह गैरकानूनी करार दिया

अब सवाल यह उठता है कि बाढ़ और पानी में घूम-घूमकर लोगों का इलाज करने वाले इस डॉक्टर के जो छह महीने जेल में गुजरे हैं, उनका क्या होगा? खासकर उस हालत में जब इसके पीछे सरकार की बदनीयत की बात पहले दिन से उठाई जा रही थी, और अदालत में एक किस्म से यह साबित भी हुई है। एक पेशेवर डॉक्टर मुसीबत के इन छह महीनों में मरीजों की सेवा करने के बजाय एक फर्जी मामले में जेल में रखा गया, क्या इस पर सरकार को सजा देने का कोई कानून नहीं होना चाहिए? क्योंकि लोकतंत्र में अगर सरकार ही बदनीयत हो जाए, उसकी मशीनरी बेईमानी और धोखे से, दबावपूर्वक या कपट से गवाह और सुबूत जुटाकर, या इसके भी बिना कोई कार्रवाई करे, तो उससे बड़ी अदालत से राहत मिलने के पहले तक तो और कोई बचाव नहीं हो सकता। ऐसा सिर्फ डॉ. कफील के केस में नहीं हुआ है, हमारे बहुत करीब छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दर्जनों मामलों में ऐसा हुआ है जिनमें देश के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं को, राजनीतिक नेताओं को झूठे मामलों में फंसाया गया, और कम से कम ऐसे एक मामले में तो अभी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य की रमन सरकार के वक्त दर्ज किए गए फर्जी मामलों पर देश के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं को नगद मुआवजा भी दिलवाया है। एक तरफ तो कहां इन लोगों को रमन सरकार के बस्तर के आईजी कल्लूरी ने झूठे मामलों में उलझाया था, बरसों तक ये लोग मामला झेलते रहे, और अब उसका मुआवजा मिला है।

हमारा यह भी मानना है कि सरकार में बैठे लोग जब कोई कार्रवाई करते हुए बदनीयत के लिए पकड़े जाते हैं, तो उनके सर्विस रिकॉर्ड में ऐसे मामलों को दर्ज किया जाना चाहिए, उनकी पदोन्नति के वक्त उनकी ऐसी हरकतें आड़े आनी चाहिए, उन पर जुर्माना लगना चाहिए, और इन दिनों मोदी सरकार जिस तरह अफसरों को तीस बरस की नौकरी या पचास बरस की उम्र के बाद रिटायर करने की बात कर रही है, तो उसमें ऐसे अफसरों के बारे में अनिवार्य रूप से सोचने की एक प्रक्रिया लागू की जानी चाहिए। जिन अफसरों के खिलाफ महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, अदालतों ने टिप्पणियां की हैं, उन तमाम अफसरों के सर्विस रिकॉर्ड में, या जिसे सीआर कहा जाता है उसमें, ऐसे कागजात अनिवार्य रूप से लगाए जाने चाहिए, और इस बात की भी गारंटी करनी चाहिए कि जिस तरह के हालात में, जिस तरह के इलाकों में, जिस तरह के लोगों के साथ इन अफसरों ने ऐसा सुलूक किया है, उनके बीच इनकी कभी पोस्टिंग न हो। इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता भी एक काम कर सकते हैं कि वे सरकार और अदालत, या राजभवन जैसी संवैधानिक संस्था के पास लिखित शिकायत दे सकते हैं कि ऐसे अफसरों के रिकॉर्ड में इन बातों कों दर्ज किया जाए। सीआर देखने का काम ऐसे अफसरों के सीनियर ही करते हैं, और वे लोग आमतौर पर अपने साथी अफसर, अपने मातहत अफसर के साथ रहमदिली दिखाने का काम करते हैं। सरकार को इसके खिलाफ भी एक तंत्र बनाना चाहिए, और एक पारदर्शी जनभागीदारी शुरू करनी चाहिए जिसमें किसी कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ शिकायतें, भ्रष्टाचार के मामले, ज्यादती के मामले, गैरकानूनी बर्ताव के मामले लोग दर्ज करवा सकें, और सीआर लिखने वाले सीनियर पर यह बंदिश रहे कि वे उन्होंने देखने के बाद ही सीआर लिखें। आज बंद कमरे में, बंद फाईल में लिखी गई सीआर दो लोगों के बीच का एक आपसी सहमति का दस्तावेज भर रह जाता है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में ऐसे दर्जनों केस हुए हैं जिनमें सुरक्षाबलों ने गरीब और निहत्थे आदिवासियों की बस्तियां जला दीं, ये मामले अदालत या मानवाधिकार आयोग में भी गए, वहां इन ज्यादतियों की शिकायतों को सही भी पाया गया, लेकिन हुआ क्या? कुछ भी नहीं। इसी प्रदेश में कई बड़े-बड़े पुलिस अफसरों पर देह शोषण के आरोप लगे, मातहत के शोषण के आरोप लगे, लेकिन हुआ क्या? कुछ भी नहीं। पिछली रमन सरकार के रहते हुए ऐसे एक भी अफसर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, हर किसी को बचाया गया, और आज भूपेश सरकार आने के बाद भी वही रूख जारी है।

हमारा ख्याल है कि जनता के बीच के लोग अगर राज्यपाल, हाईकोर्ट, और राज्य सरकार से लिखकर कहेंगे कि ऐसे लोगों के रिकॉर्ड में ये मामले दर्ज किए जाएं, और ऐसा न करने पर सरकार में बैठे लोग अपनी संवैधानिक या कानूनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगे, गुनाह में भागीदार रहेंगे, तो इन बातों का कुछ असर हो सकता है। बस्तर के जिस मामले में नंदिनी सुंदर से लेकर संजय पराते तक, बहुत से सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अभी मुआवजा मिला है, उस मामले में झूठी तोहमतों में फंसाए गए ये तमाम लोग ऐसी पहल करने में सक्षम लोग हैं, और उन्हें हर स्तर पर कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है कि इसी से एक ऐसी नजीर बन जाए जो आगे काम आए। लोकतंत्र में हर किस्म के अधिकार किसी न किसी एक मामले से शुरू होकर ही आगे बढ़ते हैं, सूचना का अधिकार भी ऐसे ही बना था, और दूसरे कई लोकतांत्रिक कानून भी। इसलिए सरकार में बैठे लोग जब गुंडागर्दी करते हैं, जब जुर्म करते हैं, तब उनको सजा मिलने का एक पुख्ता ढांचा तैयार करना चाहिए, और उनके मामले इक_ा करने के लिए जनभागीदारी को एक अहमियत की बात मानना चाहिए।
-सुनील कुमार


सत्ता की गुंडागर्दी बिना
सजा न खप जाए,
यह पुख्ता इंतजाम हो
उत्तरप्रदेश में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी से बड़ी संख्या में बच्चे मारे गए थे, तब खबरों में आए एक लोकप्रिय और समर्पित चिकित्सक डॉ. कफील खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभी कुछ दिन पहले रिहा किया। उन्हें महीनों से योगी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में डाल रखा था। हाईकोर्ट ने उन्हें हिरासत में लेने को पूरी तरह गैरकानूनी बताया। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ.कफील खान को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक प्रदर्शन में हिस्सा लेने पर छह महीने पहले योगी सरकार ने गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया था, और अभी फिर उनकी हिरासत को तीन महीने के लिए बढ़ा दिया था जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह गैरकानूनी करार दिया है।

अब सवाल यह उठता है कि बाढ़ और पानी में घूम-घूमकर लोगों का इलाज करने वाले इस डॉक्टर के जो छह महीने जेल में गुजरे हैं, उनका क्या होगा? खासकर उस हालत में जब इसके पीछे सरकार की बदनीयत की बात पहले दिन से उठाई जा रही थी, और अदालत में एक किस्म से यह साबित भी हुई है। एक पेशेवर डॉक्टर मुसीबत के इन छह महीनों में मरीजों की सेवा करने के बजाय एक फर्जी मामले में जेल में रखा गया, क्या इस पर सरकार को सजा देने का कोई कानून नहीं होना चाहिए? क्योंकि लोकतंत्र में अगर सरकार ही बदनीयत हो जाए, उसकी मशीनरी बेईमानी और धोखे से, दबावपूर्वक या कपट से गवाह और सुबूत जुटाकर, या इसके भी बिना कोई कार्रवाई करे, तो उससे बड़ी अदालत से राहत मिलने के पहले तक तो और कोई बचाव नहीं हो सकता। ऐसा सिर्फ डॉ. कफील के केस में नहीं हुआ है, हमारे बहुत करीब छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दर्जनों मामलों में ऐसा हुआ है जिनमें देश के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं को, राजनीतिक नेताओं को झूठे मामलों में फंसाया गया, और कम से कम ऐसे एक मामले में तो अभी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य की रमन सरकार के वक्त दर्ज किए गए फर्जी मामलों पर देश के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं को नगद मुआवजा भी दिलवाया है। एक तरफ तो कहां इन लोगों को रमन सरकार के बस्तर के आईजी कल्लूरी ने झूठे मामलों में उलझाया था, बरसों तक ये लोग मामला झेलते रहे, और अब उसका मुआवजा मिला है।

हमारा यह भी मानना है कि सरकार में बैठे लोग जब कोई कार्रवाई करते हुए बदनीयत के लिए पकड़े जाते हैं, तो उनके सर्विस रिकॉर्ड में ऐसे मामलों को दर्ज किया जाना चाहिए, उनकी पदोन्नति के वक्त उनकी ऐसी हरकतें आड़े आनी चाहिए, उन पर जुर्माना लगना चाहिए, और इन दिनों मोदी सरकार जिस तरह अफसरों को तीस बरस की नौकरी या पचास बरस की उम्र के बाद रिटायर करने की बात कर रही है, तो उसमें ऐसे अफसरों के बारे में अनिवार्य रूप से सोचने की एक प्रक्रिया लागू की जानी चाहिए। जिन अफसरों के खिलाफ महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, अदालतों ने टिप्पणियां की हैं, उन तमाम अफसरों के सर्विस रिकॉर्ड में, या जिसे सीआर कहा जाता है उसमें, ऐसे कागजात अनिवार्य रूप से लगाए जाने चाहिए, और इस बात की भी गारंटी करनी चाहिए कि जिस तरह के हालात में, जिस तरह के इलाकों में, जिस तरह के लोगों के साथ इन अफसरों ने ऐसा सुलूक किया है, उनके बीच इनकी कभी पोस्टिंग न हो। इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता भी एक काम कर सकते हैं कि वे सरकार और अदालत, या राजभवन जैसी संवैधानिक संस्था के पास लिखित शिकायत दे सकते हैं कि ऐसे अफसरों के रिकॉर्ड में इन बातों कों दर्ज किया जाए। सीआर देखने का काम ऐसे अफसरों के सीनियर ही करते हैं, और वे लोग आमतौर पर अपने साथी अफसर, अपने मातहत अफसर के साथ रहमदिली दिखाने का काम करते हैं। सरकार को इसके खिलाफ भी एक तंत्र बनाना चाहिए, और एक पारदर्शी जनभागीदारी शुरू करनी चाहिए जिसमें किसी कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ शिकायतें, भ्रष्टाचार के मामले, ज्यादती के मामले, गैरकानूनी बर्ताव के मामले लोग दर्ज करवा सकें, और सीआर लिखने वाले सीनियर पर यह बंदिश रहे कि वे उन्होंने देखने के बाद ही सीआर लिखें। आज बंद कमरे में, बंद फाईल में लिखी गई सीआर दो लोगों के बीच का एक आपसी सहमति का दस्तावेज भर रह जाता है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में ऐसे दर्जनों केस हुए हैं जिनमें सुरक्षाबलों ने गरीब और निहत्थे आदिवासियों की बस्तियां जला दीं, ये मामले अदालत या मानवाधिकार आयोग में भी गए, वहां इन ज्यादतियों की शिकायतों को सही भी पाया गया, लेकिन हुआ क्या? कुछ भी नहीं। इसी प्रदेश में कई बड़े-बड़े पुलिस अफसरों पर देह शोषण के आरोप लगे, मातहत के शोषण के आरोप लगे, लेकिन हुआ क्या? कुछ भी नहीं। पिछली रमन सरकार के रहते हुए ऐसे एक भी अफसर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, हर किसी को बचाया गया, और आज भूपेश सरकार आने के बाद भी वही रूख जारी है।

हमारा ख्याल है कि जनता के बीच के लोग अगर राज्यपाल, हाईकोर्ट, और राज्य सरकार से लिखकर कहेंगे कि ऐसे लोगों के रिकॉर्ड में ये मामले दर्ज किए जाएं, और ऐसा न करने पर सरकार में बैठे लोग अपनी संवैधानिक या कानूनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगे, गुनाह में भागीदार रहेंगे, तो इन बातों का कुछ असर हो सकता है। बस्तर के जिस मामले में नंदिनी सुंदर से लेकर संजय पराते तक, बहुत से सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अभी मुआवजा मिला है, उस मामले में झूठी तोहमतों में फंसाए गए ये तमाम लोग ऐसी पहल करने में सक्षम लोग हैं, और उन्हें हर स्तर पर कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है कि इसी से एक ऐसी नजीर बन जाए जो आगे काम आए। लोकतंत्र में हर किस्म के अधिकार किसी न किसी एक मामले से शुरू होकर ही आगे बढ़ते हैं, सूचना का अधिकार भी ऐसे ही बना था, और दूसरे कई लोकतांत्रिक कानून भी। इसलिए सरकार में बैठे लोग जब गुंडागर्दी करते हैं, जब जुर्म करते हैं, तब उनको सजा मिलने का एक पुख्ता ढांचा तैयार करना चाहिए, और उनके मामले इक_ा करने के लिए जनभागीदारी को एक अहमियत की बात मानना चाहिए।
-सुनील कुमार


सत्ता की गुंडागर्दी बिना
सजा न खप जाए,
यह पुख्ता इंतजाम हो
उत्तरप्रदेश में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी से बड़ी संख्या में बच्चे मारे गए थे, तब खबरों में आए एक लोकप्रिय और समर्पित चिकित्सक डॉ. कफील खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभी कुछ दिन पहले रिहा किया। उन्हें महीनों से योगी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में डाल रखा था। हाईकोर्ट ने उन्हें हिरासत में लेने को पूरी तरह गैरकानूनी बताया। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ.कफील खान को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक प्रदर्शन में हिस्सा लेने पर छह महीने पहले योगी सरकार ने गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया था, और अभी फिर उनकी हिरासत को तीन महीने के लिए बढ़ा दिया था जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह गैरकानूनी करार दिया है।

अब सवाल यह उठता है कि बाढ़ और पानी में घूम-घूमकर लोगों का इलाज करने वाले इस डॉक्टर के जो छह महीने जेल में गुजरे हैं, उनका क्या होगा? खासकर उस हालत में जब इसके पीछे सरकार की बदनीयत की बात पहले दिन से उठाई जा रही थी, और अदालत में एक किस्म से यह साबित भी हुई है। एक पेशेवर डॉक्टर मुसीबत के इन छह महीनों में मरीजों की सेवा करने के बजाय एक फर्जी मामले में जेल में रखा गया, क्या इस पर सरकार को सजा देने का कोई कानून नहीं होना चाहिए? क्योंकि लोकतंत्र में अगर सरकार ही बदनीयत हो जाए, उसकी मशीनरी बेईमानी और धोखे से, दबावपूर्वक या कपट से गवाह और सुबूत जुटाकर, या इसके भी बिना कोई कार्रवाई करे, तो उससे बड़ी अदालत से राहत मिलने के पहले तक तो और कोई बचाव नहीं हो सकता। ऐसा सिर्फ डॉ. कफील के केस में नहीं हुआ है, हमारे बहुत करीब छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दर्जनों मामलों में ऐसा हुआ है जिनमें देश के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं को, राजनीतिक नेताओं को झूठे मामलों में फंसाया गया, और कम से कम ऐसे एक मामले में तो अभी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य की रमन सरकार के वक्त दर्ज किए गए फर्जी मामलों पर देश के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं को नगद मुआवजा भी दिलवाया है। एक तरफ तो कहां इन लोगों को रमन सरकार के बस्तर के आईजी कल्लूरी ने झूठे मामलों में उलझाया था, बरसों तक ये लोग मामला झेलते रहे, और अब उसका मुआवजा मिला है।

हमारा यह भी मानना है कि सरकार में बैठे लोग जब कोई कार्रवाई करते हुए बदनीयत के लिए पकड़े जाते हैं, तो उनके सर्विस रिकॉर्ड में ऐसे मामलों को दर्ज किया जाना चाहिए, उनकी पदोन्नति के वक्त उनकी ऐसी हरकतें आड़े आनी चाहिए, उन पर जुर्माना लगना चाहिए, और इन दिनों मोदी सरकार जिस तरह अफसरों को तीस बरस की नौकरी या पचास बरस की उम्र के बाद रिटायर करने की बात कर रही है, तो उसमें ऐसे अफसरों के बारे में अनिवार्य रूप से सोचने की एक प्रक्रिया लागू की जानी चाहिए। जिन अफसरों के खिलाफ महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, अदालतों ने टिप्पणियां की हैं, उन तमाम अफसरों के सर्विस रिकॉर्ड में, या जिसे सीआर कहा जाता है उसमें, ऐसे कागजात अनिवार्य रूप से लगाए जाने चाहिए, और इस बात की भी गारंटी करनी चाहिए कि जिस तरह के हालात में, जिस तरह के इलाकों में, जिस तरह के लोगों के साथ इन अफसरों ने ऐसा सुलूक किया है, उनके बीच इनकी कभी पोस्टिंग न हो। इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता भी एक काम कर सकते हैं कि वे सरकार और अदालत, या राजभवन जैसी संवैधानिक संस्था के पास लिखित शिकायत दे सकते हैं कि ऐसे अफसरों के रिकॉर्ड में इन बातों कों दर्ज किया जाए। सीआर देखने का काम ऐसे अफसरों के सीनियर ही करते हैं, और वे लोग आमतौर पर अपने साथी अफसर, अपने मातहत अफसर के साथ रहमदिली दिखाने का काम करते हैं। सरकार को इसके खिलाफ भी एक तंत्र बनाना चाहिए, और एक पारदर्शी जनभागीदारी शुरू करनी चाहिए जिसमें किसी कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ शिकायतें, भ्रष्टाचार के मामले, ज्यादती के मामले, गैरकानूनी बर्ताव के मामले लोग दर्ज करवा सकें, और सीआर लिखने वाले सीनियर पर यह बंदिश रहे कि वे उन्होंने देखने के बाद ही सीआर लिखें। आज बंद कमरे में, बंद फाईल में लिखी गई सीआर दो लोगों के बीच का एक आपसी सहमति का दस्तावेज भर रह जाता है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में ऐसे दर्जनों केस हुए हैं जिनमें सुरक्षाबलों ने गरीब और निहत्थे आदिवासियों की बस्तियां जला दीं, ये मामले अदालत या मानवाधिकार आयोग में भी गए, वहां इन ज्यादतियों की शिकायतों को सही भी पाया गया, लेकिन हुआ क्या? कुछ भी नहीं। इसी प्रदेश में कई बड़े-बड़े पुलिस अफसरों पर देह शोषण के आरोप लगे, मातहत के शोषण के आरोप लगे, लेकिन हुआ क्या? कुछ भी नहीं। पिछली रमन सरकार के रहते हुए ऐसे एक भी अफसर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, हर किसी को बचाया गया, और आज भूपेश सरकार आने के बाद भी वही रूख जारी है।

हमारा ख्याल है कि जनता के बीच के लोग अगर राज्यपाल, हाईकोर्ट, और राज्य सरकार से लिखकर कहेंगे कि ऐसे लोगों के रिकॉर्ड में ये मामले दर्ज किए जाएं, और ऐसा न करने पर सरकार में बैठे लोग अपनी संवैधानिक या कानूनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगे, गुनाह में भागीदार रहेंगे, तो इन बातों का कुछ असर हो सकता है। बस्तर के जिस मामले में नंदिनी सुंदर से लेकर संजय पराते तक, बहुत से सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अभी मुआवजा मिला है, उस मामले में झूठी तोहमतों में फंसाए गए ये तमाम लोग ऐसी पहल करने में सक्षम लोग हैं, और उन्हें हर स्तर पर कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है कि इसी से एक ऐसी नजीर बन जाए जो आगे काम आए। लोकतंत्र में हर किस्म के अधिकार किसी न किसी एक मामले से शुरू होकर ही आगे बढ़ते हैं, सूचना का अधिकार भी ऐसे ही बना था, और दूसरे कई लोकतांत्रिक कानून भी। इसलिए सरकार में बैठे लोग जब गुंडागर्दी करते हैं, जब जुर्म करते हैं, तब उनको सजा मिलने का एक पुख्ता ढांचा तैयार करना चाहिए, और उनके मामले इक_ा करने के लिए जनभागीदारी को एक अहमियत की बात मानना चाहिए।
-सुनील कुमार

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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