रामसिंह चार्ली कितना  फिट कितना अनफिट.

रामसिंह चार्ली कितना फिट कितना अनफिट.

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-उमाशंकर सिंह।।

आजकल मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री, जिसे बहुत सारे लोग पश्चिमी प्रभाव में बॉलीवुड कहते हैं, मीडिया और आईटीसेल का नया ‘तब्लीगी जमात’ है। उसे बदनाम करने के लिए हजारों कहानियां, किस्से, अफवाह दिन-रात इन फैस्ट्री में उपजता है और 140 करोड़ जनता को जानवर समझते हुए उसके सामने चारे की तरह डाल दिया जाता है, जिनमें से अधिकांश लोग उसे चर के फिल्म इंडस्ट्री के बारे में अपने मुंह से गोबर करने लगते हैं। लेकिन मुंबई फिल्म इंडस्ट्री जुनून की नित नई कहानी का गवाह बनती है और दुनिया के सबसे खूबसूरत और एक्साइटिंग जगहों में एक बनी रहती है।
कुछ दिन पहले अभिनेता कुमुद मिश्रा सर का व्हाटसअप में अचानक एक मैसेज चमका, प्लीज वाच राम सिंह चार्ली ऑन सोनी लिव। ये मेरे लिए चौंकने वाली बात थी। वे हर सार दसियों फिल्मों में ‘की’ रोल निभाते हैं। उनने कभी इस तरह का कोई मैसेज नहीं भेजा। मुझे ही नहीं किसी को नहीं भेजा होगा। फिर उस मैसेज के दसेक दिन बाद दो रोज पहले सोनी लिव पे मैंने रामसिंह चार्ली देखी, तब समझा उन्होंने ये मैसेज क्यों भेजा?? और अगर वे नहीं भेजते तो जितने दिन मैं ये फिल्म नहीं देखता उतने दिन कितना दरिद्र रहता!


राम सिंह आर्टिस्ट है और सर्कस में चार्ली प्ले करता है। पर बदले हुए दौर में सर्कस फायदे का सौदा रह नहीं गया है तो मालिकान की नई जेनरेशन उसे बंद कर देती है। क्योंकि उसके पिछली जेनरेशन के लिए सर्कस एक जीवन था पर इनके लिए बिजनेस है, जहां वही चीज होती है जो प्रॉफिट देती है। जिसमें लाभ नहीं है वो सब बेकार है। वो सब बंद हो जाना चाहिए। जैसे रेलवे में घाटा है बंद कर दो। बेच दो। पिंड छुड़ाओ। अब सर्कस के तंबू से बाहर ये आर्टिस्ट हैं और ये दुनिया है। बिल्कुल आमने सामने। भीतर इनने जितने करतब दिखाए थे उससे कहीं ज्यादा करतब बाहर दुनिया इन्हें दिखाती है। असल में दुनिया अपने आप में एक बहुत बड़ी सर्कस थी उसके सामने तो इनका बंद हो गया जैंगो सर्कस कुछ नहीं नहीं था। पर आर्टिस्ट हैं हार कैसे मान लें?? रोज बदल रही दुनिया इन्हें जोकर समझती है और ये इस दुनिया में आर्टिस्ट वाली गरिमा के साथ जीना चाहते हैं। दोनों चीजें एक साथ कैसे संभव हैं?? ऊपर से कला के अलावा इनके पास कुछ है नहीं। और कुछ वे जानते नहीं, मानते नहीं। अब ये दुनिया है और उसमें मिसफिट ये कलाकार हैं। कोई किसी बार में दरबान बनता है, कोई पुल के नीचे वायलिन बजाता है। सर्कस में लोगों की तालियां थीं, यहां गालियां हैं। भद्दे मजाक हैं। कोई बौना होने के कारण हंसी का पात्र है। कोई जीवन जीने के लिए इतने समझौते कर रहा है कि अपने पुराने साथी के दिखने पर आंख बचाकर निकलना पड़ता है, पर फिर जब मिल ही जाते हैं तो हंसते हुए मिलते हैं। और इन सबके बीच दुनिया के रंगमंच पर नॉर्मल इंसान होने की सोते-जागते, खाते-पीते एक्टिंग करता चार्ली है। बिहार से कलकत्ता आए एक गिरमिटिया परिवार का चार्ली अनवरत एक युद्ध बाहरी दुनिया के साथ और एक अपने मन के भीतर दबाए हुए आर्टिस्ट से लड़ रहा है। और इस तरह फिल्म एक नहीं भूली जाने वाली फिल्म बन जाती है।
इस फिल्म को नितिन कक्कड़ ने ‘फिल्मिस्तिान’ के बाद बनाया था। कहानी दिल के बहुत करीब थी जो उन्होंने शाकिब के साथ मिल कर लिखी थी। वे इसे अपने तरीके से बनाना चाहते थे। कोई क्रिएटिव इंटरफेयरेंस नहीं चाहिए थी। पर प्रोड्यूसरों को लगता था इतने ऑफबीट सब्जेक्ट पर कौन फिल्म देखेगा? इसमें तो बादशाह या हनी सिंह के सांग का स्कोप भी नहीं है। फिल्मिस्तान काफी क्रिटिकली अकलेम्ड फिल्म थी जिसका बॉक्स ऑफिस भी ठीक ठाक था। नितिन कक्कड़ के पास कुछ कॉमर्सियल प्रपोजल्स थे पर उनने राम सिंह चार्ली बनाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने अपना इकलौता घर बेच दिया। फिल्म के को राइटर शाकिब की कहीं दुकान थी उसने वो बेच थी। बचे हुए पैसे फिल्म के तीसरीे प्रोड्यूसर ने लगाया और वे फिल्म बनाने निकल पड़े। जब आए तो उनके पास हाथ में ‘राम सिंह चार्ली’ थी। फिल्म जितने फेस्टीवल्स गई सब जगह उसने धूम मचा दिया, पर थियेटर रिलीज की बात आती तो जवाब आता, ‘ फिल्म मासी नहीं है।’ मुन्ना भाई एमबीबीएस और पान सिंह तोमर के साथ भी ऐसा हुआ था। फिल्म अटक गई। फिल्म के चक्कर में बेघर हुए नितिन व्यावसायिक फिल्में करने लगे। वहां भी उनने अपना सिक्का जमाया। फिर फिल्म के रिलीज की कुछ स्थितियां बनी तो कोरोना आ गया। असल में जैसे जिंदा लोगों की डेस्टनी होती है वैसे ही फिल्म की भी होती है। फाइनली फिल्म सोनी लिव पर आई और लोगों का अपार प्यार पा रही है। बहुत संभव है फिल्म देखने के बाद आप वो ना रह जाएं, जो पहले थे। थोड़े बेहतर बेहतर सिने अनुभव के साथ थोड़े बेहतर ह्यूमन बीइंग भी हो जाएं। सो नहीं देखे हैं तो सोनी लिव पे जाकर तुरंत फिल्म को देखें।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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