ताकि संसद दरबार न बने

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क्या देश में लोकतंत्र जल्द ही गुजरे जमाने की बात हो जाएगा। क्या अब संसद में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए जनप्रतिनिधियों की जगह दरबारी दिखाई देंगे, जो जी हुजूर कहते रहें वर्ना दंड भुगतने के लिए तैयार हो जाएं। वैसे तो भारत की कल्पना बिना लोकतंत्र के करने से ही भय लग रहा है, लेकिन इन दिनों हम सब उसी भय का साक्षात्कार कर रहे हैं। रविवार को राज्यसभा में जिस तरह की घटनाएं हुईं और सोमवार को उसके आगे का ताना-बाना बुना गया, वह इसी बात का परिणाम है।

लोकसभा में कृषि विधेयकों को आसानी से पारित कराने के बाद भाजपा यह जानती थी कि राज्यसभा में मतदान होने की सूरत में संख्याबल उसके पक्ष में नहीं होगा। इन विधेयकों पर देश भर में विरोध हो रहा है, इसलिए कायदे से सरकार को इस पर चर्चा करवानी चाहिए थी। लेकिन अपनी हार पहले से निश्चित जान सरकार ने वो तरीका अपनाया जो सत्ता के पक्ष में था, लोकतंत्र के नहीं। विपक्षी सांसद सदन में मांग करते रहे कि मतविभाजन हो और उपसभापति हरिवंश ने ध्वनिमत से फैसले का रास्ता चुना, जो सरकार की जीत में सहायक हुआ।

12 राजनैतिक दलों के कम से कम 100 विपक्षी सांसदों ने हरिवंश के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया, जो खारिज हो गया। अब राज्यसभा में हंगामा करने वाले अलग-अलग दलों के आठ सांसदों को निलंबित ही कर दिया गया है। तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ‘ब्रायन और डोला सेन, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, कांग्रेस के राजीव साटव, सैयद नासिर हुसैन और रिपुन बोरा, सीपीआई-एम के केके रागेश, और एलमाराम करीम इन आठ सांसदों का व्यवहार सदन की मर्यादा के अनुरूप नहीं रहा, ऐसा भाजपा का मानना है।

भाजपा के सहयोग से बिहार में सरकार चला रहे नीतीश कुमार को भी रविवार की घटना पर दुख हुआ, उन्होंने ट्वीट किया कि संसद के गौरव को हानि पहुंची है। हमें संसद की गरिमा को ध्यान में रखना चाहिए और लोकतंत्र में आसन का सम्मान करना चाहिए। अच्छी बात है कि भाजपा और सहयोगियों को लोकतंत्र की, संसद की मर्यादा की इतनी फिक्र है। लेकिन अगर उनकी इस फिक्र में सच्चाई है, तो रविवार को राज्यसभा में यह फिक्र क्यों नहीं नजर आई। संविधान का तकाजा यही है कि सरकार जो भी विधेयक लाए, उसे पारित करने से पहले उससे जुड़े सभी लोगों से चर्चा करे, संसद में उस पर बहस करवाए, जरूरत हो तो बदलाव करे और फिर जाकर उसे कानून बनाने के लिए आगे बढ़ाए। लेकिन कृषि विधेयकों को पारित करवाने में सरकार इस तकाजे को भूल गई।

कृषि विधेयकों पर किसानों से तो चर्चा करना दूर, सरकार ने सांसदों से भी इस पर विमर्श जरूरी नहीं समझा। राज्यसभा में विपक्ष ने विधेयक पर बहस के लिए सदन की कार्यवाही को आगे बढ़ाने का निवेदन किया तो उसे खारिज कर दिया गया। सांसदों ने विधेयक पर मतविभाजन की मांग की,  तो मार्शल को बुलाकर सांसदों को रोक दिया गया। उपसभापति महोदय को मतविभाजन की मांग मानने से तकलीफ क्या थी, ये तो वे ही बेहतर जानते होंगे। लेकिन अगर वे विपक्षी सांसदों की इस मांग को मानते तो इससे उनके पद और लोकतंत्र की गरिमा दोनों रह जाती। अफसोस कि सदन में लोकतंत्र की धज्जियां उड़ गईं, जब एकतरफा तरीके से ध्वनिमत पर फैसला ले लिया गया। और अब उन सांसदों को निलंबित कर भाजपा ने मानो लोकतंत्र को ही निलंबित करवा दिया हो। 

सदन और पद की गरिमा तो केवल बहाने लग रहे हैं, दरअसल भाजपा राज्यसभा में अपना दबदबा बढ़ाने में लगी है। राज्यसभा के कुल 245 सदस्य हैं, 8 सदस्यों के निलंबन के बाद अब आंकड़ा 237 हो गया है और अब बहुमत का आंकड़ा 119 हो गया है।

भाजपा के 87 सदस्यों को मिलाकर एनडीए के पास सौ से ज्यादा सदस्य हैं। इसके अलावा छोटे-छोटे दलों के सांसद, निर्दलीय सांसद, बीजद, वायआरएस कांग्रेस, अन्नाद्रमुक आदि दलों के सांसदों को मिलाकर यह आंकड़ा 115 तक पहुंच जाता है। जबकि कांग्रेस के पास केवल 40 सांसद हैं और शेष विपक्ष भी हमेशा एकजुट नहीं होता। इस तरह कम से कम इस सत्र में एनडीए की राह राज्यसभा में आसान हो गई है। नवंबर में उत्तरप्रदेश से 10 राज्यसभा सांसद फिर चुने जाएंगे, जिनमें फिर भाजपा का ही दबदबा होगा और इस तरह राज्यसभा में एनडीए बहुमत हासिल करने में सफल हो जाएगा।

लोकतंत्र में किसी दल का बहुमत में आना और किसी का अल्पमत में आना, स्वाभाविक है। लेकिन बहुमत को स्थायी बनाए रखने के लिए लोकतंत्र को ही ताक पर रखा जाए, यह सही नहीं होगा। यही वजह है कि इस वक्त विपक्षी दल लगातार सदन में भाजपा की मनमानी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। सोमवार को निलंबित हुए सांसदों ने संसद परिसर में ही धरना दिया। सोशल मीडिया पर भी सरकार के इस रवैये की आलोचना हो रही है।  किसानों ने भी 25 सितम्बर को आंदोलन की चेतावनी दी है।

लेकिन इस तमाम कवायद का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा, अगर ये विरोध अंजाम तक न पहुंचे।  इस सरकार को यह अहसास कराना जरूरी है कि वह अपने फैसले, अपनी सोच पूरे देश पर एकतरफा तरीके से नहीं थोप सकती। यह काम कठिन है, लेकिन विपक्षी दलों को इसके लिए आगे आना ही होगा। अन्यथा न विपक्ष रहेगा, न लोकतंत्र।

(देशबंधु)

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