बिना विरोध के कैसा लोकतंत्र

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विपक्ष के भारी विरोध और सहयोगी दल की नाराजगी के बावजूद केंद्र सरकार कृषि विधेयकों को संसद में पारित करवाने में सफल हो गई। कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सरलीकरण) विधेयक-2020 तथा कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 इन तीनों को लोकसभा में भाजपा ने अपने बहुमत के बूते आसानी से पारित करा लिया था, लेकिन राज्यसभा में यह काम इतना आसान नहीं लग रहा था। फिर भी रविवार को राज्यसभा में भी ध्वनिमत से मोदी सरकार ने इन्हें पारित करवा ही लिया। उपसभापति हरिवंश ने विधेयकों पर ध्वनिमत से वोटिंग के लिए कहा तो इस पर विपक्षी सांसद अपना विरोध जतलाने लगे। उनकी मांग थी कि इन विधेयकों को प्रवर समिति (सिलेक्ट कमिटी) में भेजे जाने के प्रस्ताव पर मतविभाजन हो। विपक्षी सांसदों ने सदन में खूब हंगामा भी किया। उन्होंने विधेयकों की प्रतियां फाड़ीं, उपसभापति का माइक भी हंगामे में टूट गया, मार्शलों को बीच-बचाव करना पड़ा। लेकिन ये सारा विरोध नाकाम रहा और एक बार फिर मोदी सरकार अपनी मनमानी में सफल हो गई।

तृणमूल कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र की हत्या बताया तो कांग्रेस ने कहा कि बाहुबली मोदी सरकार ने जबरन किसान बिल को पास कराया है। इससे ज्यादा काला दिन कुछ हो नहीं सकता। विपक्ष की ऐसी प्रतिक्रियाएं सीएए के वक्त भी सुनने मिलीं थीं और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने पर भी। पिछले छह सालों में संसद में कई मौके ऐसे आए, जब सरकार ने इसी तरह एकतरफा फैसला लिया है और विपक्ष के विरोध का सम्मान तो दूर, उसका संज्ञान लेना भी जरूरी नहीं समझा गया। वास्तव में लोकतंत्र की हत्या तो तभी हो गई थी, जब भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देती थी और बाकी दल चुपचाप उसे सुनते थे। इन दलों ने अपने स्वार्थ में और कांग्रेस के विरोध में यह भी नहीं देखा कि भाजपा आज कांग्रेस को खत्म करने की बात कह रही है तो अगली बारी उनकी भी हो सकती है। 

लोकतंत्र में विपक्ष जरूरी होता है, इसके बिना लोकतंत्र पूरा ही नहीं होता। लेकिन जब भाजपा विपक्ष को समूल उखाड़ने की बात करती है तो उसकी लोकतंत्र में कितनी आस्था है, यह समझना कठिन नहीं है। जम्मू-कश्मीर में जिस पीडीपी के साथ मिलकर भाजपा ने सरकार बनाई, उसी दल को प्रदेश के लिए इतना बड़ा फैसला लेते हुए विश्वास में नहीं लिया गया, बल्कि उसके नेताओं को नजरबंद किया गया। महाराष्ट्र में शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद की मांग की, तो उसके खिलाफ जाकर सरकार बनाने में भाजपा ने देर नहीं की। और अब विपक्ष में बैठकर भी भाजपा की कोशिश अपने पुराने सहयोगी की सरकार गिराने में है।

अकाली दल 1997 से भाजपा के साथ है। लेकिन अभी उसकी सांसद हरसिमरत कौर बादल ने कृषि विधेयकों के विरोध में केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया तो भी भाजपा ने उनकी नाराजगी दूर करने या उन्हें मनाने की कोई कोशिश नहीं की। बल्कि राष्ट्रपति ने इस्तीफा मंजूर कर लिया। अब अकाली दल के विरोध के बावजूद राज्यसभा में इन बिलों को पारित करवा लिया गया है। भाजपा का यह रवैया बतलाता है कि उसे कार्पोरेट घरानों और अपनी सत्ता के अलावा किसी की फिक्र नहीं है। कृषि विधेयकों को भाजपा किसानों के हित में बता रही है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने किसानों को पिछले 70 सालों के अन्याय से मुक्त करा दिया है।  

उन्होंने राज्यसभा में हंगामे पर विपक्षी दलों को किसान-विरोधी बता दिया और कहा कि प्रक्रिया का हिस्सा बनने के बजाय,  उन्होंने किसानों की मुक्ति को रोकने की कोशिश की। भाजपा उनकी हरकतों की निंदा करती है। यानी विपक्ष अब अपना कर्तव्य भी भूल जाए और सरकार जिस तरह चाहे, उस तरह सदन की कार्रवाई का हिस्सा बने। सरकार तो पहले ही अपने कर्तव्य से विमुख हो चुकी है। इसलिए न केवल विपक्ष बल्कि किसानों का विरोध, उनकी नाराजगी भी वह अनदेखा कर रही है। अभी कुछ दिनों पहले हरियाणा में किसान बड़ी संख्या में इन विधेयकों के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे, तब उन पर बलप्रयोग किया गया था। लेकिन आज फिर किसान अपने गुस्से के साथ सड़कों पर हैं। हरियाणा में जगह-जगह सड़कें जाम कर दी गई हैं। क्या इन किसानों का विरोध भी किसान-विरोधी है, क्या भाजपा उनकी हरकतों की भी निंदा करेगी। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है, जब मोदी सरकार में किसान सड़कों पर उतरे हों।

पहले भी जंतर-मंतर पर आधे कपड़ों में, मानव खोपड़ी के साथ अपनी पीड़ा दर्शाते हुए प्रदर्शन किए गए, सैकड़ों किमी का मार्च किसानों ने निकाला, लेकिन उनके पैरों से रिसते खून देखकर भी मोदी सरकार नहीं पसीजी। सरकार का वादा था कि किसानों की आय दोगुनी कर देंगे, ऐसा तो नहीं हुआ, बल्कि कभी बुलेट ट्रेन के नाम पर, कभी मूर्ति लगवाने के नाम पर तो कभी विकास कार्यों के बहाने किसानों की जमीन ले ली गई। छह सालों में हजारों किसानों ने कर्ज के बोझ या फसल बर्बाद होने के कारण आत्महत्या कर ली। मोदी सरकार को रहम तब भी नहीं आया, जब मंदसौर पर किसानों पर गोलियां चलीं। तो अब उससे किसानों की भलाई की उम्मीद करना बेमानी है। 

नए विधेयकों के कानून बन जाने के बाद इस देश के किसान पूरी तरह उद्योगपतियों के गुलाम हो जाएंगे। अब कुछ फसलों का उत्पादन, सप्लाई, वितरण, कारोबार और व्यापार पर नियमन पूरी तरह हट जाएगा। यानी बड़े व्यापारियों कंपनियों को पूरी छूट होगी कि वे मनमाने ढंग से किसानों से उनकी फसल खरीद सकेंगे, इसे जमा कर सकेंगे, खुलकर जमाखोरी कर सकेंगे और जितनी मर्जी हो उतनी कीमत पर बेच सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो जरूरी खाद्यान्नों की खरीद पर सरकार का जो नियंत्रण अभी है, वो खत्म हो जाएगा और खेती की कमान भी उद्योगपतियों के हाथ में आ जाएगी। आगे जा कर सरकार की ओर से मिलने वाला समर्थन मूल्य और सब्सिडी की सुविधा भी किसानों के लिए नहीं होगी। आम जनता के लिए सस्ते अनाज की सप्लाई के लिए किसानों को जो समर्थन मूल्य सरकार देती थी वह गुजरे जमाने की बात हो जाएगी। कृषि सेक्टर पूरी तरह से मुनाफे से संचालित कार्पोरेट सेक्टर के नियंत्रण में आ जाएगा। आखिर कार्पोरेट के अच्छे दिनों के लिए तो मोदीजी सत्ता में आए हैं।

(देशबंधु)

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