जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई..

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-सुरेंद्र कुमार।।
यह कहावत एकदम सही है। अगर नेता लोगों की आम आदमी के बराबर ही आमदनी हो तब उनको महंगाई के भाव का पता चले। तब उनको आटे दाल की कीमत का पता चले। उन्हें भी राशन की दुकान से राशन मिले। उन्हें भी municipality का पानी मिले तब उनको पता चलेगा कि आम आदमी को कैसा पानी पीना पड़ता है। उसका घर बरसात में चुचाए झोंपड़ी में घुसते पानी के कारण मां को बच्चे को गोद में लेकर बैठना पड़े। तब नेताजी को पता चलेगा कि आम आदमी की क्या ज़रूरतें हैं। तब नेता जी को पता चलेगा बरसात कितनी रंगीन होती है। जब नेता जी को मज़दूरों की लाइन में खड़ा होकर खुद को एक दिन की दिहाड़ी के लिए गिरवी रखना पड़े तब नेता जी को पता चलेगा कि पैसा कैसे कमाता है मज़दूर और उसमें भी कुछ हिस्सा नोंचकर ले जाता है ठेकेदार। 45 से 50 डिग्री गर्मी में ईंटे सिर पर ढोकर भट्टे से निकाली जाएं तब पता पड़ेगा क्या होता है झूठ और सच का अंतर और प्रजातंत्र का सफेद झूंठ और धोखा।

जिन देशों के संविधान पढ़कर हमने अपने संविधान की रचना की उन देशों में तो थोड़ी बहुत बेरोज़गारी के अलावा ऐसा हाल नहीं है। मुझे पता है और देश को भी पता है। प्रेजिडेंट ओबामा ने अमेरिका से यहां तक की यात्रा सिर्फ इसलिए की थी कि उनके देश मे पचास हज़ार लोगो को नौंकरी मिल जाए। जबकि उस देश मे हर उस बेरोज़गार आदमी को बेरोज़गारी का भी भत्ता सरकार देती है। और वह भत्ता भी हमारे देश मे मिलने वाले आम आदमी के वेतन से कहीं ज़्यादा होता है।

पश्चिम के प्रजातांत्रिक देशों जैसे अमेरिका इंग्लैंड फ्रांस वगैरा देशों में किसी भी नेता ने कभी भी किसी भी हालत में यह नहीं कहा होगा कि अब वह 50 साल तक सत्ता से नहीं जाएगा। कोई और चुनकर नहीं आ ही नहीं सकता। यह किस मानसिकता का द्योतक है। यह किस पंडित से पूछकर भविष्यवाणी की गई थी। क्या प्रजातंत्र में ऐसे व्यक्ति, पार्टी या संस्था की आवश्यकता है। उस पर विशेष रूप से उस पार्टी का अध्यक्ष कहे जिस पार्टी के बीजस्वरूप संस्था का इतिहास ही देश की आज़ादी की लड़ाई में ग़द्दारी का रहा हो। जो अंग्रेज़परस्त रहे हों। क्या यह एक भयानक बात नहीं है। और यह बात किस आधार पर कही गयी थी। ऐसा इस पार्टी ने आज़ादी के बाद भी क्या कर दिखाया था जो इसका अध्यक्ष यह कह सके कि अगले पचास वर्ष उन्हें ही सत्ता में रहना है। वह भी तब जब उस पार्टी के सत्ता में आते ही समाज मे आपसी धार्मिक विद्वेष बढाया गया था।

नोटबन्दी के माध्यम से हज़ारों छोटे कारखाने और छोटे धंधे इसलिए बन्द हो गए थे कि जिन हज़ार और पांच सौ के नोटों से छोटा कारोबार चलता था वह नोटों के अभाव में बन्द हो गया था। ग़रीब घरों में खाने लिए पैसे नहीं बचे थे। छोटी दुकानों के ग्राहक ही बन्द हो गए थे। नोट बदलवाने के लिए लोग लाइनों में ही मर गए थे। इसके अतिरिक्त दादरी मे गौमांस के फर्जी आरोप में हुई moblynching जैसे घृणित कांड से समाज को धर्म के नाम पर विखंडित करने वाले ऐसे सैंकड़ों कांडों का शुरुआती कांड भी किया गया था। उस पार्टी का एक ज़िम्मेदार नेता अगर ऐसा कहे तो उसका परिणाम देश को किस तरह भुगतना पड़ता है यह पिछले लगभग साढ़े छह वर्षों में हर स्तर पर हुए विनाश से समझा जा सकता है।

विकास दर ऐतिहासिक रूप से गिरी है। नौकरियां गईं हैं। बेरोज़गारी बढ़ी है। भुखमरी बढ़ी है अशिक्षा बढ़ी है। स्वास्थ्य में हम सौवें नम्बर पर भी नहीं आते।धार्मिक विद्वेष योजना के तहत बढ़ाया जा रहा है ताकि लोगों का ध्यान देश के जीवन से संबधित मुद्दों पर न चला जाए। देश की सारी संपत्ति सारे उद्यम सभी नवरत्न बेचे जा रहे है। यह काम वह पार्टी कर रही है जो सोते जागते खाते पीते राष्ट्रवादी बनते हैं। लेकिन वे खुद इस सम्पदा को चंद कॉरपोरेट्स को सौंप रहे हैं। यानी के आम आदमी को गुलामी फिर से भेंट में दे रहे है। जबकि यह भी जग जाहिर तथ्य है कि हज़ारो पूंजीपति देश के पब्लिक बैंकों का लाखों करोड़ रुपया लेकर विदेश भाग गए हैं लेकिन इस सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है और न उन्हें वापस लाने का कोई प्रयत्न ही किया जा रहा है। इन कांडों को बरसों हो गए इनका कोई जिक्र न तो सरकार में है न मीडिया में। फिर लोग बिचारे कैसे जांनेंगे। जितना इस सरकार ने एक व्यक्ति के विज्ञापन पर खर्च किया है या जितना पैसा दो चुनावों में खर्च हो गया हैऔर अगर सरकार ईमानदारी से बतादें कितना रुपया यहां के पूंजीपति विदेश लेकर भाग गए है, इतना पैसा ही अगर बर्बाद न होता तो देश की GDP minus 24% न होती। लेकिन ऐसा तो तब होता जब सत्ताधारी पार्टी को देश के प्रति प्यार होता। जिससे प्यार होता है उसकी रक्षा की जाती है उसे बेचा नही जाता। जिसे देश से प्यार होता है सबसे पहले उसे यह सिद्ध करना पड़ता है कि देश का हर आदमी अपने मन के दर्द को व्यक्त कर सके, अपनी जरूरतों को बता सके। और उसकी ज़रूरतें पूरी की जांज चाहियें। न कि उसकी ज़रूरतों को सुनने से पहले ही उसकी ज़ुबाँ सिलदी जाए तो यह काम देश से प्यार करने वाले नेता का या उसकी सरकार का नहीं होता।

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