किसानों की दुर्गति..

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आत्मनिर्भर भारत अभियान की आड़ में भारत की आत्मा को कैसे मारा जा रहा है, इसका ताजा उदाहरण है आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम का लोकसभा में पारित हो जाना। भाजपा अपने बहुमत के बूते लगातार मनमाने फैसले ले रही है और इसी कड़ी में संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के और कुछ सहयोगी दलों के विरोध के बावजूद मोदी सरकार ने आवश्यक वस्तु संशोधन बिल को संसद के निचले सदन में पारित करा लिया। इस में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज, आलू इन तमाम वस्तुओं को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान है।

अब तक ये सारी चीजें आवश्यक वस्तुओं की सूची में आती थीं, इसका मतलब इनकी जमाखोरी कानूनन अपराध थी। कोई भी कृषि उपज को जरूरत से अधिक जमा न करे और इनकी कालाबाजारी न करे, इसलिए आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 बनाया गया था। इससे एक ओर किसानों को उनकी उपज का उचित दाम मिलता था और गरीब आदमी को भी सही कीमत पर अनाज, दालें, खाने का तेल, आलू-प्याज आदि बाजार में उपलब्ध हो जाते थे। महंगाई बढ़ने के साथ इनकी कीमतें भी बढ़ती थीं, लेकिन आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के कारण कारोबारी जमाखोरी करने और फिर जबरदस्ती मांग बढ़ाकर महंगी कीमत पर इन चीजों को बेचने का खेल नहीं खेल सकते थे। लेकिन उद्योगपतियों का मुनाफा करवाने और गरीब आदमी को खून के आंसू रुलाने के लिए प्रतिबद्ध मोदी सरकार ने अब इस खेल की शुरुआत भी कर दी है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मई में 20 लाख करोड़ रुपये के आत्मनिर्भर भारत अभियान आर्थिक पैकेज की तीसरी किस्त के तहत इसका ऐलान किया था कि सरकार आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव करेगी। साथ ही यह भी बता दिया था कि अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दाल, प्याज और आलू के बाजार भाव में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। उस वक्त देश कोरोना से डरा हुआ था और सरकार से राहत की उम्मीदें बांध रहा था। इसलिए सरकार की इस चालाकी पर अधिक चर्चा नहीं हुई। तब यह अनुमान भी नहीं था कि अगले कुछ महीनों में सरकार इसके लिए कानून ही बनाने लगेगी। अब इस विधेयक के जरिए अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को सरकार के नियंत्रण से मुक्त कर बाजार के हवाले कर दिया गया है और सरकार का कहना है कि यह सब किसानों के भले के लिए है।

केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्यमंत्री राव साहेब पाटिल दानवे का कहना है कि 1955-56 में देश में गेहूं का उत्पादन सिर्फ 100 लाख टन था जो अब बढ़कर 1000 लाख टन से ज्यादा हो गया है और चावल का उत्पादन 250 लाख टन था जो बढ़कर 1100 लाख टन हो गया है। इस संशोधन से कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा, जिससे किसानों को उनके उत्पादों का बेहतर दाम मिलेगा।  भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को भी यह फैसला किसानों की समस्याओं के लिए रामबाण लगता है।

उन्होंने कहा कि आवश्यक वस्तु अधिनियम वर्ष 1955 का है, उस वक्त उपज काफी कम थी, जो अब बहुत बढ़ गई है। अब इसको डिरेग्यूलेट करते हुए अपवाद की स्थिति का ध्यान रखा गया है। इससे प्राइवेट सेक्टर भी निवेश कर पाएगा। उन्होंने जिस तरह प्राइवेट सेक्टर का जिक्र किया, उससे जाहिर होता है कि सरकार की मंशा किसे लाभ पहुंचाने की है। जहां तक 1955 में सौ लाख टन गेहूं उपजने का तर्क है, तो तब आबादी भी 36-37 करोड़ थी, जो अब सवा सौ करोड़ हो गई है। अगर आज आबादी महज 40-50 करोड़ होती और गेहूं-चावल आदि का उत्पादन 10-11 हजार लाख टन होता, तब यह तर्क काम करता कि जमा करने की सीमा तय करने की क्या जरूरत। पर सच्चाई ये है कि आज देश बुरी तरह कुपोषण का शिकार है। लाखों लोग आधे पेट खाकर सोते हैं।

किसान को अपनी उपज का सही दाम अब भी नहीं मिल रहा है। जिस वजह से वह कर्ज में डूब रहा है और आत्महत्या को मजबूर हो रहा है। ऐसे में अगर आलू-प्याज, खाद्य तेल जैसी चीजों के दाम अगर बाजार के हवाले हो जाएंगे, और बड़ी रिटेल कंपनियां इसकी प्रमुख खिलाड़ी होंगी तो वे किसानों से अपनी शर्तों पर उनकी उपज खरीदेंगी और बेचेंगी भी अपनी ही शर्तों पर।

इस वक्त जब यह अधिनियम अपने मूल रूप में लागू है, तब तो आलू-प्याज की कीमतें बेतहाशा बढ़ चुकी हैं। जब इनकी जमाखोरी को कानूनी मान्यता मिल जाएगी, तब गरीब किसान और गरीब जनता के लिए हाहाकार मच जाएगा। इसके अलावा सरकार ने किसानों से जुड़े दो और फैसले लिए हैं, पहला कृषि उत्पादन और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020 लाया गया है, जिसमें प्रावधान है कि किसान अपनी फसल कृषि उपज मंडियों के बाहर भी व्यापारियों को बेच सकता है और दूसरा अनुबंध आधारित खेती को कानूनी वैधता देना। ये फैसले भी किसानों के हितों पर गहरा आघात करने वाले हैं। लेकिन सरकार निवेशकों, उद्योगपतियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इन्हें लागू करने पर अड़ी हुई है।

मंडियों से बाहर खरीदी, बिक्री की व्यवस्था करने का मतलब किसानों को व्यापारियों के रहमोकरम पर छोड़ देना है। अब तक कृषि उपज मंडियों में किसानों को एमएसपी के आसपास फसल के दाम मिल जाया करते थे। लेकिन अब व्यापारी उनसे किसी भी कीमत पर फसल खरीद कर उनका भंडारण कर देश के किसी भी हिस्से में मनमानी कीमतों पर बेच सकेंगे। पूरे देश में कहीं भी कृषि का कारोबार करने की सुविधा बड़े उद्योगपतियों के पास ही होती है। किसान तो अपनी फसल कृषि उपज मंडी तक ही बड़ी मुश्किल से पहुंचाता है।

उसके पास भंडारण की बहुत सुविधा भी नहीं होती। अगली फसल की तैयारी भी करनी होती है। उसकी इस मजबूरी का फायदा सरकार के उद्योगपति मित्र ही उठाएंगे। अनुबंध वाली खेती में भी किसान के अपनी ही जमीन पर मजदूर हो जाने का खतरा है। सरकार के इन तथाकथित किसान हित वाले फैसलों से किसान बेहद नाराज हैं। इसका एक नमूना बीते दिनों हरियाणा में देखने मिला था। आंदोलनों को कुचलने में कुशल यह सरकार किसानों की आवाज को पहले भी कई बार दबा चुकी है और शायद एक बार फिर ऐसा करने में कामयाब हो जाए। लेकिन जनता सोचे कि जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले इस देश में किसानों की कैसी दुर्गत ये सरकार कर रही है। हम चांद पर पहुंचे या मंगल पर, पेट हमारा अनाज से ही भरेगा, जिसे उपजाने का काम किसान करता है, उद्योगपति नहीं।

(देशबंधु)

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