Home खेल सत्तर में क्या हटेगा पत्थर ???

सत्तर में क्या हटेगा पत्थर ???

-अपूर्व भारद्वाज।।

आज मोदी जी 70 के हो गए है हमारे गाँव मे कहते है सत्तर की उम्र में सर से सारे पत्थर हट जाते है अर्थात सारी जिम्मेदारी औऱ जवाबदेरी वाले काम इंसान से छूट जाते है वो अब अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी सकता है और अपने जीवनसाथी के साथ वानप्रस्थ आश्रम भी जा सकता है यह समय सन्यास का होता है लेकिन क्या इस समय मोदी जी राजनीति से सन्यास ले सकते है?? क्या वो अगला चुनाव लड़ेंगे?? क्या वो अगला चुनाव जीत रहे है ?? इस सब सवालों का जवाब जानना है तो आगे पढ़िए.

मोदी जी की राजनीति महात्मा गाँधी से शुरू होकर सरदार पटेल से गुजरते हुए इंदिरा गाँधी पर खत्म होती है मोदी जी बड़े करीने से उन सब की राजनीति से कुछ न कुछ उठाते है और उस पर अपना कलेवर चढ़ाकर बहुत अच्छे से बेचते है मोदी जी गांधी जी से आंदोलन और कम्युनिकेशन उठाते है सरदार पटेल से संकल्प सीखते है और इंदिरा से ब्रांडिंग चुराते है और मास, मीडिया और मार्केटिंग मिलाकर ऐसा कॉकटेल बनाते है कि उनके अंध भक्त से लेकर आलोचक तक इस कॉकटेल के नशे से बच नही पाते है

आपने कभी सोचा की मोदी जी अपने आपको कभी हिन्दू राष्ट्रवादी,कभी समाजवादी,कभी अम्बेडकरवादी रूप में दिखाने की कोशिश क्यो करते है क्यो वो कभी अटलजी के समान कविता लिखते हुए उदार दिखना चाहते है क्यो वे गौतम और गांधी को यादकर अहिंसा के पुजारी हो जाते है और क्यो वो सुभाष,सावरकर और आजाद के गुण गाकर उनके कट्टर समर्थक नजर आते है यही मोदी का खेल है जो आपको अब तक इस मायाजाल उलझाए जा रहा है 2014 से भारत की राजनीति “दृश्यम” हो गई है आपको लग रहा है जो आप देख रहे है वहीं सच है लेकिन सच को जानना इतना आसान होता तो मोदी मैजिक क्या होता ???

राजनाथ सिंह को गृह मंत्री से रक्षा मंत्री बना दिया गया है ,आडवाणी जी और जोशी जी वैसे ही जबरन वीआरएस पर है सुषमाजी,अरुण जेटली,पर्रिकर ,मुंडे और अनंत का दुखांत हो गया है वसुंधरा, रमन और शिवराज को लूप लाइन में डाल दिया गया है आपको राजनीति के इस मॉडल के समझना है तो जरा गुजरात जाकर काशीराम राणा, सुरेश मेहता और केशुभाई पटेल का हाल चाल पूछ लीजिये.

मोदी की राजनीति को समझने के लिए मोदी जैसा सोचना पड़ता है यह बात बीजेपी,कांग्रेस या अन्य राजनीतिक दलो के नेताओ को जब तक समझ आएगी तब तक मोदी जी 2024 चुनाव तक पहुँच कर देश में तुर्की का एर्दोगन मॉडल (एक देश एक ही राजा ) या अध्यक्ष शासन प्रणाली लागू कर चुके होंगे,अगर मोदी को हराना है तो आपको अरविंद जैसा बागी या तो नीतीश बाबू जैसा घोर अवसरवादी बनना पड़ता है नीतीश कुमार ने अपने समर्पण से अपनी सम्भावना नगण्य कर ली है अरविंद ने अपने संघर्ष काल के दोस्तो को अलग करके व्यवहारिक राजनीति शुरू करके अपनी संभावना सीमित कर ली है राहूल गाँधी नैसर्गिक नेता नही है जब तक 24 ×7 राजनीति नही करेंगे तब तक उनसे उम्मीद रखना बेमानी होगा.

सन 2014 से मैंने मोदी जी पर बहुत कुछ लिखा है 2014 से ही मेरी चुनावी डाटावाणी सच हो रही है लेकिन 2019 की चुनावसीरीज वायरल हो गई थी इस सीरीज की दौरान मैने उनकी डाटा पर पकड़ और रणनीतिक कौशल के बहुत से अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला था मोदी की राजनीति को कोई विभाजनकारी,सम्प्रदायवादी कहता है कोई विकासवादी और राष्ट्रवादी लेकिन मोदी की राजनीति व्यक्तिवादी है भारत जैसे बहुलता वादी लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा अगर किसी चीज से है तो वो है “व्यक्तिवाद”। इसे इंदिरा गाँधी ने शुरू किया था जिसकी परिणीति आपातकाल के रूप में हुई अब मोदीयुग में यह नई उचाईयों पर पहुँच गया है.

कोरोना काल में भी मोदी का जादू भक्तों के सर चढ़ कर बोल रहा है यह सब बताने के लिए काफी है कि यह देश समाजवाद को किनारा करके पूंजीवाद की सारी सीमा लाँघ करके व्यक्तिवाद और फ़ासीवाद की और बढ़ चला है अगर आपको अभी भी लोकतंत्र लग रहा है तो नींद से जग जाइये तो “मित्रों” सन 2024 तक बीजेपी,कॉंग्रेस,संस्थाएं मुद्दा,नेता,जनता सब हारेंगे और केवल मोदी ही जीतेगा.

और अंत मे मोदी जी को जन्मदिन की बधाई भारत की राजनीति में मोदी एक बहुत ही विवादित और करिश्माई चरित्र है उनकी राजनीति में बहुत कुछ ऐसा है जिसकी सच्चाई जानना सबको जरुरी है इसलिए जब भी मैं मोदी जी किताब के आखरी हिस्से को लिखना शुरू करता हूँ तो साहब हर बार एक नई कहानी का प्लाट तैयार कर देते है मेरे लिए मोदी जी की राजनीति एक ऐसी अधूरी फ़िल्म है जिसका क्लाइमेक्स आना अभी बाकी है.

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