देश नई गुलामी की ओर..

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नाम की राजनीति को आगे बढ़ाते हुए उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने आगरा में बन रहे मुगल संग्रहालय का नाम बदल कर छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम पर करने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि कोई मुगल हमारा नायक नहीं हो सकता। छत्रपति शिवाजी महाराज ही हमारे असली नायक हैं। उन्होंने एक ट्वीट भी किया कि आगरा में निर्माणाधीन म्यूजियम को छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से जाना जाएगा। आपके नए उत्तर प्रदेश में गुलामी की मानसिकता के प्रतीक चिह्नों का कोई स्थान नहीं है। हम सबके नायक शिवाजी महाराज हैं। जय हिंद, जय भारत…। इस ट्वीट में अगर योगीजी गुलामी की जगह पराधीनता या परतंत्रता जैसे शब्द का इस्तेमाल करते तो बेहतर होता, क्योंकि गुलामी संस्कृतनिष्ठ हिंदी का शब्द नहीं है। वैसे पराधीनता की जगह गुलामी लिखने-बोलने में उन्हें फर्क नहीं महसूस हुआ होगा, क्योंकि इस तरह के हजारों शब्द हमारी भाषा में, आज की हिंदुस्तानी में घुल-मिल चुके हैं। और यही हाल परंपराओं, संस्कृतियों का है। गरज यह कि आज कोई भी चीज विशुद्ध नहीं है।

लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि ये मिलावट खराब ही है। बल्कि इस मिलावट का खूबसूरत नाम ही हिंदुस्तान है, जो हजारों सालों में सैकड़ों जातियों, मान्यताओं, रीति-रिवाजों, राजे-रजवाड़ों, कबीलों, धर्मों और पंथों से मिलकर बना है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे महामानव समुद्र कहा। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने निबंध ‘अशोक के फूल’ में इस देश के बारे में लिखा है कि विचित्र देश है यह। असुर आए, आर्य आए, शक आए, हूण आए, नाग आए, यक्ष आए, गंधर्व आए- न जाने कितनी मानव जातियां यहां आईं और आज के भारतवर्ष के बनाने में अपना हाथ लगा गईं। जिसे हम हिंदू रीति-नीति कहते हैं, वह अनेक आर्य और आर्येतर उपादानों का अद्भुत मिश्रण है। इसी निबंध में वे आगे लिखते हैं हमारे सामने समाज का आज जो रूप है, वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है।

देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बाद की बात है। सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है। शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। यह जिजीविषा उन मुगल बादशाहों में भी खूब थी, जिन्होंने हिंदुस्तान को अपना घर बनाकर यहां अपना राज-पाट फैलाया। बाद के मुगल बादशाह उस आंतरिक शक्ति और संयम का परिचय नहीं दे पाए, तो समय के साथ गुम हो गए। यह जिजीविषा शिवाजी में भी कूट-कूट कर भरी थी, तभी उन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मराठा साम्राज्य को मुगल शासक औरंगजेब के सामने खड़ा किया। उस वक्त समाज व्यवस्था वर्ण आधारित थी। इसलिए राज्य रक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले का राज्याभिषेक क्षत्रिय आधार पर होता था। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार शिवाजी के जाति से कुर्मी होने के नाते उनका राज्याभिषेक करने को कोई ब्राह्मण तैयार न हुआ।

लेकिन शिवाजी ने तब भी समाज के आगे घुटने नहीं टेके और काशी से पंडित गंग भट उनके आमंत्रण पर रायगढ़ पहुंचे और उनका राज्याभिषेक कराया। इसी तरह आगरा के किले में 1666 को जब औरंगजेब ने उन्हें कैद किया था तो कुछ समय बाद शिवाजी ने बीमारी का बहाना किया और पीरों, पंडितों को दान में भेजने के लिए फलों-मिठाइयों की टोकरी मंगवाने लगे और एक रात एक टोकरी में बैठकर वे कैद से भागने में सफल रहे। शिवाजी के जीवन की ये घटनाएं जहां उनकी राजनैतिक और रणनीतिक कुशलता को बताती हैं, वहीं ये भी दर्शाती हैं कि मराठों और मुगलों के बीच की लड़ाई में धर्म का कोई काम न था, केवल साम्राज्य की चाह ही केंद्र में थी। एक पंडित ने धर्म की सीमाओं को लांघकर उनका राज्याभिषेक कराया और जिस औरंगजेब का नाम धार्मिक कट्टरता के लिए लिया जाता है, उसने दान में देने के लिए अपने हिंदू कैदी को फल-मिठाइयों की टोकरी भिजवाई। 

इतिहास की इन घटनाओं के आज पुन:पाठ की जरूरत इसलिए है कि हम एकबारगी किसी को अपना नायक धर्म के आधार पर नहीं ठहरा सकते, न ही किसी के नायकत्व को इसलिए खारिज कर सकते हैं कि वह विधर्मी था। इन ऐतिहासिक नायकों की संघर्षशीलता और बहादुरी जैसे गुणों से आज जनता को सीख लेनी चाहिए। लेकिन आज जनता को इतिहास के नाम पर सड़ी-गली सोच का शिकार बनाया जा रहा है। योगी जी गुलामी के प्रतीकों से वाकई मुक्ति चाहते हैं तो अब तक किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज का नाम बदलने का क्या कोई प्रस्ताव उनकी सरकार ने दिया है। भाजपा के इस शासन में मुगलसराय, इलाहाबाद, फैजाबाद सबके नाम बदल गए। लखनऊ का नाम लक्ष्मणपुर करने की मांग भी उठती रही है और अब ताजमहल का नाम तेजोलय करने की मांग हो रही है। पहले जो नाम बदले गए, उनसे वहां की स्थितियां नहीं बदलीं और न आगे ऐसा कुछ होगा।

हालात तभी सुधरते हैं, जब कठिनाइयों से मोर्चा लेने का जज्बा बचा हो। धर्म के नाम पर सत्ता चलाने वाली सरकारें बड़ी चतुराई से जनता को धार्मिक भावनाओं में उलझा देती हैं। देश में और उत्तरप्रदेश में अभी ऐसा ही हो रहा है। महामारी और आर्थिक बदहाली से आम आदमी अधमरा हो रहा है। बची-खुची जान लगाकर अगर कोई नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाए तो सत्ता का चाबुक उसे खाना पड़ रहा है। धर्म की आड़ में लोगों के नैतिक साहस को गुलाम बनाने का खेल चल रहा है और आजाद होने का खोखला नारा लगाया जा रहा है। जिन्हें सरकार गुलामी के प्रतीक चिह्न कह रही है, वे हमारे इतिहास का सच हैं, जिनसे हमें अपनी विशिष्टताओं और खामियों का बोध होता है। सरकार इस बोध को खत्म कर जनता को नई गुलामी की ओर ही ले जा रही है, जहां आजाद सोच के लिए कोई स्थान नहीं होगा।

(देशबंधु)

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