तो क्या संसद में राजनाथ सिंह झूठ बोले.?

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संसद में राजनाथ का बयान मोदी के बयान से पूरा परे है ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि कौन झूूठा है, राजनाथ सिंह या मोदी.?

-सुनील कुमार।।
कोरोना के मोर्चे पर अभी एक नया निष्कर्ष सामने आया है जो बताता है कि हिन्दुस्तान की हालत आज के सरकारी आंकड़ों के मुकाबले दोगुने से भी अधिक खराब है। सरकारी आंकड़े आज देश में 95 हजार से एक लाख नए कोरोना पॉजिटिव रोज मिलना बता रहे हैं, लेकिन एक वैज्ञानिक अनुमान यह आया है कि ये आंकड़े दो से ढाई लाख हर दिन हो सकते हैं क्योंकि आज के सरकारी आंकड़े एक ऐसे रैपिड टेस्ट के आधार पर हैं जिनमें बहुत से पॉजिटिव लोगों को निगेटिव पाया जाता है, बताया जाता है। यह वैज्ञानिक निष्कर्ष है कि जब अधिक भरोसेमंद पीसीआर टेस्ट किया जाता है, और उसे भी सही तरीके से किया जाता है तो रैपिट टेस्ट के मुकाबले दो से तीन गुना अधिक पॉजिटिव मिलते हैं। दिल्ली और महाराष्ट्र इन दो राज्यों में जांच अधिक अच्छे से हुई, तकनीक का ठीक इस्तेमाल हुआ, और वहां पीसीआर जांच में रैपिट टेस्ट के मुकाबले ढाई-तीन गुना अधिक पॉजिटिव मिले हैं। ये आंकड़े अगर देश में दहशत पैदा नहीं करते तो यह मान लेना चाहिए कि यह देश जिम्मेदारी से बरी हो चुका है, और यहां पर सब कुछ जनधारणा पर चल रहा है जिसे कि ढाला जा रहा है, और कुछ भी सच के आधार पर नहीं चल रहा।

आज लोकसभा में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने बयान दिया है कि चीन ने लद्दाख में हिन्दुस्तान की 38 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा है। अब अगर कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विपक्षी नेताओं के साथ चीन के मुद्दे पर ही हुई बातचीत को याद करें, तो उन्होंने बड़े साफ शब्दों में यह कहा था कि हिन्दुस्तान की जमीन पर न कोई विदेशी घुसे हैं, न यहां पर हैं। प्रधानमंत्री के उस बयान पर पहले भी बहुत हंगामा हो चुका है कि वह सच से परे का था क्योंकि उस वक्त भी भारत सरकार के बड़े-बड़े लोग हिन्दुस्तान में चीनी घुसपैठ, अवैध कब्जे, अवैध निर्माण की बातें कर चुके थे, लेकिन प्रधानमंत्री ने बहुत साफ शब्दों में इन सबका खंडन किया था। तब से लेकर अब तक इस देश के पास सरकारी स्तर पर और कोई जानकारी नहीं थी, आज संसद में राजनाथ सिंह ने साफ-साफ 38 हजार वर्ग किलोमीटर पर अवैध कब्जा कहा है। जाहिर है कि यह कब्जा प्रधानमंत्री के बयान के बाद तो नहीं हुआ है क्योंकि उसके बाद से रोज निगरानी की खबरें आ रही हैं। ऐसा शायद पहली ही बार हुआ कि देश की जमीन पर विदेशी अवैध कब्जे को लेकर केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री की दी गई जानकारी पर ऐसा विवाद हो रहा है। इतिहास बताता है कि यह 38 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन अक्साईचिन का इलाका है जिस पर भारत 1962 की जंग के पहले से अपना हक जताते आया है, और हमेशा उसने इसे अपनी जमीन पर चीन का अवैध कब्जा, अवैध मौजूदगी माना है। भारत सरकार का यह रूख केन्द्र में किसी भी पार्टी की सरकार रहे, लगातार जारी रहा है। इस हिसाब से प्रधानमंत्री का सर्वदलीय बैठक का बयान सच से दो मायनों में परे था। इस 38 हजार वर्ग किलोमीटर पर चीन की मौजूदगी को वह बयान अनदेखा कर रहा था, और दूसरी बात यह भी कि आज राजनाथ सिंह ने संसद में जिन इलाकों में चीन की घुसपैठ की बात कही है, उन इलाकों के बारे में प्रधानमंत्री उस दिन सभी दलों से बात कर रहे थे, और उन्होंने इस घुसपैठ को भी अनदेखा करते हुए साफ शब्दों में कहा था कि भारत की जमीन पर न कोई आया है, न कोई है। यह बात आज के राजनाथ सिंह के बयान के साथ मिलाकर देखें, तो हकीकत समझ आती है।

देश में आज हकीकत की हालत इतनी खराब इसलिए है कि केन्द्र सरकार ने नोटबंदी के नफे-नुकसान का हिसाब देश को आज तक नहीं दिया है, देश के आर्थिक सर्वेक्षण, राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे के आंकड़े देश के सामने रखने से मना कर दिया, पीएम केयर्स नाम के बनाए गए एक खास फंड को सीएजी के ऑडिट से भी परे रखा गया, उसके बारे में कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया गया। ऐसे बहुत से अलग-अलग मामले हैं जिनमें जानकारी देने से मना किया जा रहा है। अब सवाल यह उठता है कि जिस देश परंपरागत रूप से पंचवर्षीय योजनाओं से लेकर सालाना बजट तक देश के आंकड़ों के आधार पर बनते आए हैं, और इन्हें देश से कभी नहीं छुपाया गया, आज उनको क्यों छुपाया जा रहा है? लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि चीनी सरहद पर हिन्दुस्तानी सैनिकों की शहादत करीब आधी सदी बाद हुई, लेकिन प्रधानमंत्री ने इस सरहदी तनाव के बारे में जो कुछ भी कहा, उसमें चीन का नाम भी नहीं लिया गया, चीन शब्द भी नहीं कहा गया। यह पूरा सिलसिला बड़ा अटपटा है, और इस देश के प्रधानमंत्री के ओहदे की साख को भी घटाता है क्योंकि नरेन्द्र मोदी ही गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए शायद पांच बार चीन गए थे, प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने बहुत ही दोस्ताना और अनौपचारिक अंदाज में चीनी राष्ट्रपति की भारत में लीक से हटकर, परंपरा से आगे बढक़र खातिरी की थी। इसके बाद अगर आज भारत के चीन के साथ राष्ट्रप्रमुख के स्तर पर बातचीत के रिश्ते भी नहीं है, तो यह बहुत ही हैरानी की बात है, बहुत ही सदमे की बात भी है।

हम आज यहां पर कोरोना के आंकड़ों से लेकर भारतीय जमीन पर चीनी कब्जे के आंकड़ों तक कई बातों को देख रहे हैं, और इनमें एक ही बात साफ लग रही है कि जनता से सच बांटने में सरकार बिल्कुल भी साफ नहीं है। भारत जैसे लोकतंत्र में जहां बहुत सा काम भरोसे पर चलता है, जहां पर मुसीबत के वक्त सर्वदलीय बैठक भी सारे अधिकार प्रधानमंत्री को देते आई है, वैसे देश में जानकारी को छुपाकर रखना एक नया सिलसिला है, बहुत ही खतरनाक सिलसिला है। पहले तो चीनी कब्जे को लेकर यह बात साफ लग रही थी कि प्रधानमंत्री का कहा हुआ सच नहीं है। वे क्यों सच से परे कह रहे हैं, यह बात आज भी साफ नहीं है। खासकर तब जब उनकी सरकार और उनकी पार्टी आधी सदी से भी अधिक पहले नेहरू की चीन-नीति को रात-दिन कोसते आए हैं, ऐसे में मोदी को तो अपनी चीन-नीति को पारदर्शी रखने चाहिए था, संसद, देश, और सर्वदलीय बैठक में खुलकर साफ बात करनी थी। अगर चीन ने हिन्दुस्तानी जमीन पर कब्जा किया है तो उस बात को छुपाने की कोई वजह हमें समझ नहीं आती है। अगर सरहद पर किसी तरह की शिकस्त हुई है, या पड़ोस के देश ने इतना बड़ा कब्जा किया है, तो उसे देश से छुपाना नहीं था। अभी यह लिखते हुए भी संसद से रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का बयान आ रहा है, और उनके बयान की यह जानकारी बार-बार टीवी की खबरों पर आ रही है कि चीनी कब्जा कितना बड़ा है। राजनाथ सिंह इस कब्जे का पुराना इतिहास नहीं बता रहे हैं, लेकिन वे भारत सरकार का हमेशा से स्थापित एक स्टैंड बता रहे हैं, जो कि हर प्रधानमंत्री के रहते लगातार जारी रहा है।

भारतीय लोकतंत्र में केन्द्र और राज्य सरकारों को जनता के साथ पारदर्शी तरीके से रहना चाहिए। जनता कभी भी सरकार की फौजी खुफिया जानकारी मांगने के चक्कर में नहीं रहती, लेकिन यह बात तो कई महीनों से दुनिया के कई देशों के उपग्रहों से खींची गई तस्वीरों के आधार पर दुनिया के कई विशेषज्ञ लिख चुके हैं कि हिन्दुस्तानी जमीन पर चीनी कब्जा है, चीन निर्माण कर रहा है।

आज कोरोना पर हिन्दुस्तान के लोग बहुत बुरी तरह लापरवाह दिख रहे हैं। और इतनी लापरवाही की एक वजह यह भी हो सकती है कि लोगों को खतरे की असलियत देखने नहीं मिल रही है, लोगों को खतरा घटाकर दिखाया जा रहा है। यह सिलसिला ठीक नहीं है। आज अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पर यही तोहमत लग रही है कि उन्होंने अमरीका में कोरोना के खतरे को घटाकर दिखाया। और उसका नतीजा सामने है।

सरकार को तात्कालिक अलोकप्रियता से डरकर सच को छुपाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लोकतंत्र में सरकार पर लोगों की आस्था इस बात पर भी टिकी रहती है कि सरकार की सच के मामले में क्या साथ। भारत का इतिहास बताता है कि नेहरू के मौत की आधी सदी बाद भी उन पर यह तोहमत लगती है कि उन्होंने चीनियों पर जरूरत से अधिक भरोसा किया था। आज राजनाथ सिंह बयान देखें, तो यह साफ लगता है कि सर्वदलीय बैठक में मोदी की कही बातें भी चीन पर जरूरत से अधिक भरोसे वाली थीं, या कम से कम वे चीन के ऐतिहासिक कब्जे के जिक्र के बिना थीं, या सरहद पर जिस ताजा घुसपैठ का जिक्र आज राजनाथ सिंह ने किया है, उनके भी जिक्र के बिना थीं। आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री को अपने ही उस बयान को लेकर और सवालों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन वे अपने आपको सवालों के घेरे से खासा दूर रखते हैं, इसलिए ऐसा कोई खतरा उन पर नहीं रहता। तो क्या आज मोदी व्यक्तिगत रूप से चीन पर अपनी बाकी सरकार के मुकाबले अधिक भरोसा करते हुए उसके आधी सदी अवैध कब्जे के भी जिक्र से बच रहे हैं, चीन की ताजा घुसपैठ को भी साफ-साफ शब्दों में नकार रहे हैं, और ऐसा करते हुए क्या वे नेहरू की वैसी ही चूक को दुहरा नहीं रहे हैं जैसी कि उनकी पार्टी हमेशा से नेहरू के नाम के साथ जोड़ती आई है?

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