परेशाँ देश सारा है, भक्तों अब तो जग जाओ..

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-विष्णु नागर।।

भक्तो आँखें खोलने का समय आ गया है। दैनिक भास्कर कोई क्रांतिकारी,मोदीविरोधी अखबार नहीं है। उसने हिम्मत करके इस सरकार की जबर्दस्त पोल खोली है। जनता से, प्रेस से, संसद से छुपाकर ऐसा पीम केयर्स फंड बनाया गया है,जिसमें कितना पैसा आया,कितना ,किस तरह सचमुच खर्च हुआ,यह एक रहस्य है।अरे भाई लोगों से पैसा इकट्ठा किया है, प्रधानमंत्री के नाम पर किया है,कोरोना के नाम पर किया है तो लोगों से ये सब छुपाना क्यों?वैसे पारदर्शिता का नारा मगर भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे अपारदर्शी सरकार यह है।

जुलाई के तीसरे सप्ताह में बताया गया था कि कोरोना का टीका (वैक्सीन) बनाने के लिए इस फंड से सौ करोड़ रुपए दिए जाएँगे।बहुत अच्छा फैसला था मगर किसको दिए जाएँगे या दिए गए हैं ,यह बताने के लिए इस सरकार में कोई राजी नहीं,जबकि घोषणा किए पौने दो महीने हो चुके हैं।

यह सवाल सबसे पहले तेलंगाना के सूचना तकनालाजी मंत्री के टी रामाराव ने उठाया था। उन्हें जवाब नहीं मिला। फिर भास्कर ने उनके पत्र की सूचना के आधार पर यह सवाल केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन से किया, कोई जवाब नहीं।योजना एवं सांख्यिकी मंत्रालय के मंत्री राव इंद्रजीत सिंह से किया,मौन। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार, आयोग में टीका नीति से संबंधित समिति की अध्यक्ष विनोद के.पाल,नीति आयोग के कार्यकारी अधिकारी अमियकांत, आईसीएआर के महानिदेशक बलराम भार्गव से ईमेल से जवाब माँगा। बारह दिन बाद भी उत्तर नदारद। कुछ के दफ्तर भी फोन किया तो साहब लोग बिजी थे, कहलवाया कि बाद में वह स्वयं संपर्क करेंगे। तो ये हाल है जनता के पैसे का। हो सकता है, इनमें से किसी को कुछ मालूम ही न हो,जबकि इनमें से हरेक को बल्कि जनता को भी मालूम होना चाहिए था।

एक संभावना यह है कि अभी तक किसी को नहीं दिए हों तो सवाल यह है कि एक अरब रुपये क्या किसी शुभमुहूर्त की प्रतीक्षा में रखे गए हैं? और मान लो दिए न हों तो यह बता दो। एक संभावना यह है कि किसी देसी संस्था को न दिए हों।और संभावनाएँ अनंत हो सकती हैं।मोदी है तो मुमकिन है।

और यह भी कि जिन पाल साहब को कोरोना के टीके के बारे में नीति बनानी है,उन्होंने अभी तक बनाई नहीं है।ऐसा क्या अकारण है? इसलिए भक्तो-अभक्तो, सबसे निवेदन है कि गाँठ से पैसा खर्च करने के लिए तैयार रहो।वैक्सीन का बहुत से मामलों में अंतिम चरण चल रहा है और यहाँ गाँठ से पैसा किसे दिया है,यह तक नहीं बताया जा रहा है। वैक्सीन बनेगी तो कैसे पहुँचेगी,कौन पहुँचाएगा,यह बताया नहीं जा रहा है।एक खबर यह छपी थी कि सरकार 50 लाख वैक्सीन खरीदने पर विचार कर रही है।वह विचार भी अभी निर्णय तक नहीं पहुंचा है।जो सरकार भूखे मजदूरों को ट्रेन का किराया देने को तैयार नहीं हुई।राज्यों को जीएसटी में न जिसने हिस्सा दिया,न कर्ज लेकर जीएसटी का भार उनका उठाया और राज्यों से कहा कि खुद कर्ज लो, वह सारे देशवासियों के वैक्सीन का खर्च उठाएगी, इसमें काफी संदेह है। नीति न बनाने के पीछे और क्या कारण हो सकता है?बिहार का चुनाव है, फिर पश्चिम बंगाल का चुनाव है।सरकार यह कड़वा सच शायद बताना नहीं चाहती। एक समाचार यह आया था कि वैक्सीन का दाम 250 रुपये हो सकता है। इसका एक डोज काफी होगा या अधिक अभी स्पष्ट नहीं है। भक्ति इस मामले में काम न आएगी, पैसा काम आएगा। बहुत से भक्त भी वैसे इस समय दुर्भाग्य से बेरोजगार होंगे। पेट भरने का संकट है और वैक्सीन बनी तो उसका बोझ उठाने का भी। और अगर खुदा न खास्ता केंद्र सरकार वैक्सीन मुफ्त दे दे तो बेशक फिर से भक्ति चालू रखना। यह कहना कि भक्ति में ही शक्ति है।

मरकर भी सुशांत सिंह राजपूत गोदी चैनलों में जिंदा रहे, कंगना रनौत रानी लक्ष्मीबाई का खिताब पाती रहें, लगता है ,यही फाइनल वैक्सीन नीति है । अर्णब प्यारे जिन्दाबाद, सुधीर भैया तुम्हारी जय हो।

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