कांग्रेस में फेरबदल के मायने..

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 कांग्रेस में कुछ दिनों पहले हुई कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष पद के बारे में कोई फैसला लिया जाना था, लेकिन एक पत्र ने संगठन के भीतर हलचल पैदा कर दी। दरअसल 23 वरिष्ठ नेताओं के हस्ताक्षर वाली एक चिठ्ठी अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजी गई, जिसमें उन्होंने संगठन में आमूलचूल बदलाव की मांग की थी। इस पत्र पर सीडब्ल्यूसी की बैठक में तीखी बहस हुई। बाद में कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद जैसे हस्ताक्षर करने वाले वरिष्ठ नेताओं ने खुलेआम अपनी नाराजगी भी जाहिर की। एक बार फिर ऐसा लगा कि बिहार चुनाव, मध्यप्रदेश उपचुनाव, मानसून सत्र और आगामी उत्तरप्रदेश व प.बंगाल चुनाव के पहले कांग्रेस फिर अंतर्कलह का शिकार होकर विरोधियों को आगे बढ़ने का मौका न दे दे।

सीडब्ल्यूसी की बैठक में नए पूर्णकालिक अध्यक्ष पर तो कोई फैसला नहीं हो सका था, अलबत्ता सोनिया गांधी ने एक साल तक इस जिम्मेदारी को निभाने के बाद फिर से इसे उठाने का फैसला ले लिया। पत्र विवाद पर भी उन्होंने खुलकर कुछ नहीं कहा। लेकिन बीते शुक्रवार 11 सितंबर को उन्होंने जो संगठनात्मक बदलाव किए हैं, वे काफी कुछ बयां कर रहे हैं। इस फेरबदल में राहुल गांधी के करीबियों को काफी तरजीह दी गई है, साथ ही पत्र लिखने वाले नेताओं के लिए भी अलग-अलग तरह से संदेश दिए गए हैं, युवा और अनुभवी नेताओं के बीच संतुलन साधने के साथ कुछ पुराने नेताओं को फिर से अहम पदों पर बैठाया गया है। इस बदलाव से एक ओर नाराज नेताओं को साधने की कोशिश की गई है, दूसरी ओर राहुल गांधी को भविष्य में पार्टी की कमान सौंपने की तैयारी भी नजर आ रही है।

 हालांकि राहुल गांधी ने 2019 आम चुनाव में मिली हार के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और बार-बार के आग्रह के बाद भी वे अब तक इस पद पर लौटने की अनिच्छा जतलाते रहे हैं। पर अगले चुनाव में अभी चार साल का वक्त है और इस दौरान राजनैतिक घटनाओं के साथ-साथ राहुल गांधी के राजनैतिक तौर-तरीकों में बदलाव होना लाजिमी है। इसकी छाप अभी से दिखने भी लगी है। पिछले चुनाव तक मीडिया के जरिए भाजपा ने राहुल गांधी की छवि को लगातार शहजादा, वंशवादी राजनीति का प्रतीक और नौसिखिए राजनेता के रूप में गढ़ने की कोशिश की। इसके लिए उनके कुछ अपमानजनक उपनाम रखे गए। संसद या अन्य जगहों पर उनके बयानों को मजाक का सबब बनाया गया। लेकिन राहुल गांधी इन सबसे विचलित हुए बिना सरकार को उसकी गलतियां बताने में लगे रहे।

कोरोना के इस दौर में उनकी एक अलग छवि देश देख रहा है। वे लगातार गंभीर मुद्दों को सहज-सरल भाषा में जनता के बीच उठा रहे हैं। विशेषज्ञों से मौजूदा समस्याओं के हल के लिए चर्चा कर रहे हैं। सरकार को उसकी नाकामियां दिखाने के साथ सुझाव भी दे रहे हैं। मीडिया अब भी कोशिश में है कि उनका मजाक बने, लेकिन यह कोशिश अब बहुत कामयाब नहीं दिख रही। राहुल गांधी के इस राजनैतिक अवतार से अब पार्टी में भी उनकी पकड़ मजबूत हो रही है। वे इस वक्त केवल कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य हैं और किसी पद पर नहीं हैं।

लेकिन पार्टी में अंतरिम अध्यक्ष को सलाह देने वाली समिति से लेकर, चुनाव समिति और प्रदेश प्रभारियों तक उनके करीबियों को जगह दी गई है। उनके नजदीकी रणदीप सिंह सुरजेवाला पहले पार्टी के मुख्य प्रवक्ता, फिर पार्टी के महासचिव, कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य और अब अध्यक्ष को परामर्श देने वाली समिति के सदस्य भी बन गए हैं। राहुल के करीबी सुरजेवाला अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हें एक साथ इतने पद मिले हैं। उत्तरप्रदेश चुनाव में अहम भूमिका निभाने वाले राहुल के करीबी मधुसूदन मिस्त्री को केंद्रीय चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाया है। प्रियंका गांधी को पूरे उत्तरप्रदेश की कमान सौंपी गई। इसके अलावा राहुल गांधी की टीम से दिनेश गुंडूराव, मणिकम, एच के पाटिल, शक्तिकांत गोहिल और राजीव साटव जैसे नेताओं का $कद पार्टी में बढ़ा है। इससे आने वाले समय में राहुल गांधी के अध्यक्ष पद को संभालने की संभावनाएं बलवती हो रही हैं। 

कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती असंतुष्टों को साधना है। ताजा फेरबदल में असंतुष्टों को तीन हिस्सों में बांट दिया गया है। पत्र लिखने वाले कुछ नेताओं को पार्टी की किसी न किसी समिति में रखा गया है,  कुछ को सोचने का वक्त दिया गया है और कुछ को बिल्कुल दरकिनार कर दिया गया है। इस तरह कोई यह इल्जाम कांग्रेस आलाकमान पर नहीं लगा सकता कि पार्टी के भीतर बोलने या अपने विचार रखने की आजादी नहीं है। जैसे गुलाम नबी आजाद से महासचिव का पद ले लिया गया है, लेकिन वे कार्यसमिति के सदस्य हैं। हस्ताक्षर करने वालों में प्रमुख जितिन प्रसाद को प. बंगाल और अंडमान-निकोबार का प्रदेश प्रभारी बनाया गया है।

जबकि कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, शशि थरूर और वीरप्पा मोइली जैसे नेता फिलहाल दरकिनार लग रहे हैं। राजस्थान में बगावत करने वाले सचिन पायलट को भी अभी कोई जिम्मेदारी न देकर बागियों के लिए संदेश दे दिया गया है। इस फेरबदल के जरिए उत्तरप्रदेश की राजनीति को साधने की कवायद भी दिख रही है। उत्तर प्रदेश के नेताओं को नए फेरबदल में सबसे अधिक तरजीह दी गई है। जितिन प्रसाद, राजीव शुक्ला, प्रमोद तिवारी, राजेश मिश्रा जैसे नेताओं के जरिए उप्र के ब्राह्मण वोट को कांग्रेस में पाले में करने की रणनीति नजर आ रही है। जबकि पीएल पुनिया, आरपीएन सिंह और विवेक बंसल भी कांग्रेस अध्यक्ष की नई टीम में शामिल हैं। पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को सीडब्ल्यूसी में स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है।

उत्तर प्रदेश के बाहर के नेताओं में दिग्विजय सिंह और तारिक अनवर समेत कई ऐसे नेताओं की पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में वापसी हुई है जो लंबे समय से एआईसीसी से बाहर थे। इन नेताओं को जगह देकर पार्टी ने अनुभव और युवा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। इस फेरबदल से विभिन्न राज्यों में कांग्रेस का संगठन मजबूत होगा और इसके परिणाम चुनावों में भी दिखेंगे, ऐसा माना जा रहा है। हालांकि बदलाव से असंतुष्ट सुर पूरी तरह से शांत होंगे, ये कहना कठिन है। क्योंकि जिन्हें नजरंदाज किया गया है, या जिनका ओहदा कम किया गया है, क्या वे चुप रहेंगे, क्या भाजपा उन असंतुष्टों का फायदा लेने की कोशिश नहीं करेगी। तब तक क्या पार्टी को संभालने के लिए पूर्णकालिक अध्यक्ष की भूमिका में राहुल गांधी आएंगे। इन सवालों के जवाब जानना दिलचस्प होगा।

(देशबंधु)

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