Home देश मौत से निकली राजनैतिक पटकथा..

मौत से निकली राजनैतिक पटकथा..

14 जून को सुशांत सिंह राजपूत ने आखिर किन वजहों से अपनी जिंदगी खत्म कर ली थी। वे अवसाद या किसी अन्य तरह की मानसिक समस्या से जूझ रहे थे, या उन पर करियर का दबाव था। उनकी मौत वाकई आत्महत्या थी या इसके पीछे कोई साजिश थी। ये सारे सवाल अभी कुछ समय पहले तक रोजाना टीवी चैनलों की चर्चा का हिस्सा बने हुए थे। उनकी रंगीन और ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर बैकग्राउंड में होती थी और पूरा माहौल बनाकर उनके जीवन के आखिरी दिनों को रिक्रिएट किया जाता था। तब नेपोटिज्म पर भी खूब विवाद हुआ और करण जौहर से लेकर आलिया भट्ट तक इसके निशाने पर रहे। आलिया भट्ट की नई फिल्म सड़क-2 तो दुष्प्रचार का शिकार ही बन गई। नेपोटिज्म पर बहस छिड़ी तो कई संघर्षशील कलाकारों को लगा कि इस बहाने उनकी आवाज भी सुनी जाएगी।

सुशांत के साथ-साथ उन्हें भी न्याय मिल जाएगा। लेकिन ऐसा तब होता जब इस नकली विमर्श के तामझाम का मकसद सचमुच किसी को इंसाफ दिलाना होता। यह सब तो विशुद्ध राजनैतिक प्रहसन की पटकथा है। जिसमें एक आत्महत्या से शुरु हुई बहस नेपोटिज्म से होते हुए पितृसत्तात्मक समाज, वंशवाद और अब बेटी का अपमान नहीं होने देंगे तक पहुंच चुकी है।

सुशांत सिंह राजपूत इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी मौत से कई लोग अपनी जिंदगी और अपनी राजनीति संवारने में लग गए हैं। हिंसक या क्रूर होना केवल उसे ही नहीं कहते हैं कि जब आप किसी पर हथियारों से वार करें या किसी को शारीरिक रूप से प्रताड़ित करें। इस वक्त देश की राजनीति और मीडिया में जो चल रहा है, वह क्रूरता और हिंसा की नई मिसाल है। जिसमें हथियार नहीं शब्द आघात कर रहे हैं, राजनीति प्रताड़ित कर रही है और मासूम लोगों को अपना शिकार बना रही है। इस राजनैतिक पटकथा का पहला शिकार बनी रिया चक्रवर्ती, जिन पर सुशांत की मौत का मीडिया ट्रायल कर उन्हें अपराधी साबित कर दिया गया। अब वे जेल में है, लेकिन ड्रग्स के सिलसिले में। नेपोटिज्म का सवाल भी हाशिए पर डाल दिया गया है। लेकिन रिया की टीशर्ट पर पितृसत्तात्मकता के खिलाफ लड़ने के संदेश ने एक नयी बहस को शुरु किया और सोशल मीडिया पर रिया के लिए इंसाफ के साथ पितृसत्तात्मकता के खिलाफ मुहिम छिड़ गई। 

इस बीच अब तक इस प्रकरण में बीच-बीच में बगावत और बहादुरी का किरदार निभाने आती कंगना रनौत अब पूरी तरह लीड रोल में आ गई हैं। उन्होंने ही नेपोटिज्म को इस मुद्दे के साथ जोड़ा था और अब वे इसे वंशवाद से राजनैतिक तौर पर जोड़ते हुए बाला साहेब ठाकरे तक पहुंच गई हैं। उनके किरदार को सपोर्ट करने के लिए हिमाचल से मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने भी एंट्री ले ली है और इस मामले में कहा है कि बेटी का अपमान नहीं सहेंगे। चूंकि कंगना हिमाचल प्रदेश की हैं तो वहां के नेता उनके साथ हैं। इस हिसाब से क्या रिया चक्रव्रती को बंगाल अस्मिता का सवाल बनाया जाएगा। सुशांत को तो पहले ही बिहार अस्मिता से जोड़ लिया गया है। क्या इंसाफ इस तरह राज्यों में बंट कर अपनी मंजिल तक पहुंचने का मोहताज हो जाएगा। इस सवाल का जवाब भी वही लिख सकता है जो इस पूरे राजनैतिक पटकथा का लेखन और निर्देशन कर रहा है।

कंगना रनौत ने मुंबई को पहले पीओके कहा, फिर शिवसेना सांसद संजय राउत से उनकी जुबानी बहस हुई तो उन्हें वाय श्रेणी की सुरक्षा गृहमंत्रालय से मिल गई। सुरक्षा घेरे में उनकी जुबान और धारदार हो गई। मुंबई में उनके आफिस में अवैध निर्माण को लेकर बीएमसी ने तोड़फोड़ शुरु की तो इसे बदले की कार्रवाई बतलाया गया। हालांकि बीएमसी पहले भी कई अवैध निर्माण तोड़ चुकी है, शाहरुख खान का दफ्तर भी उसमें शामिल है। दो साल पहले भी कंगना को म्यूनिसिपल कार्पोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई ने 2018 में एमआरटीपी एक्ट के तहत अवैध निर्माण तोड़ने का नोटिस दिया था, जिसके खिलाफ कंगना डिंडोशी सत्र न्यायालय भी गई थीं। तब उन्हें अपने दफ्तर में राममंदिर जैसी फीलिंग शायद नहीं हुई होगी, लेकिन अब उन्होंने इस पर अयोध्या से लेकर कश्मीर तक सबको जोड़ते हुए बाबर को चेतावनी दे ही है कि वे राम मंदिर बनाकर रहेंगी। चेतावनी देने वाले इस सीन में वे उद्धव ठाकरे के लिए इस तरह तू-तड़ाक वाली भाषा का प्रयोग करती हैं, मानो वे किसी राज्य के मुख्यमंत्री नहीं, उनके वो दोस्त हैं, जो अब दुश्मन बन चुके हैं।

संयोग ऐसा है कि उद्धव ठाकरे यानि शिवसेना और भाजपा पहले दोस्त थे, जो अब राजनैतिक तौर पर दुश्मन बने हुए हैं। भाजपा रोज उनकी एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार को गिराने के लिए अलग-अलग तरह की बयानबाजी करती है। इधर भाजपा चुप है, लेकिन कंगना बोल रही हैं। कंगना ने अब उद्धव ठाकरे को वंशवाद का नमूना बताते हुए ट्वीट किया कि तुम्हारे पिताजी के अच्छे कर्म तुम्हें दौलत तो दे सकते हैं मगर सम्मान तुम्हें खुद कमाना पड़ता है। इस बीच एनडीए में सहयोगी रामदास अठावले ने ऐलान कर दिया है कि उनकी पार्टी आरपीआई कंगना को मुंबई में सुरक्षा देगी।

इस पटकथा के आखिरी दृश्य कैसे होंगे, इस बारे में ऊपर के घटनाक्रम को देखकर कुछ अनुमान लग सकते हैं, जैसे कंगना भाजपा या उसके सहयोगी दलों में किसी की ओर से लोकसभा प्रत्याशी हो सकती हैं। या राज्यसभा उम्मीदवार हो सकती हैं। या अतिशयोक्ति में कल्पना के घोड़े दौड़ाएं तो सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष भी हो सकती हैं। अपने अभिनय के लिए वे राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी हैं और इस साल करण जौहर के साथ-साथ उन्हें भी पद्मश्री मिला था। लेकिन इसके आगे भी और बड़े सम्मान हैं, जो उनके नाम आने वाले समय में हो सकते हैं। वैसे ये सब उस स्क्रिप्ट राइटर पर निर्भर होगा, जिसने अब तक इस समूचे प्रकरण को नित नए मोड़ देते हुए सुर्खियों में बनाए रखा। काश उसमें थोड़ी जगह इंसाफ के लिए बनी होती।

(देशबंधु)

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