कोरोना-टीका जब आए, तब आए, लेकिन लगाने की योजना बन जाए…

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-सुनील कुमार||

पिछले कुछ महीनों से दुनिया में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा विकसित की गई कोरोना वैक्सीन का मानव परीक्षण चल रहा था, और एक ब्रिटिश वालंटियर के बीमार पडऩे से यह रोक दिया गया है। इस वैक्सीन का परीक्षण हिन्दुस्तान के भी कई अस्पतालों में चल रहा था। इस बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि वैक्सीन से सुरक्षा प्राथमिकता का मुद्दा है। काम तेजी से करना है लेकिन सुरक्षा से समझौते के बिना। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक दवा कंपनी के साथ मिलकर इसे बनाया है, और इसका तीसरे चरण का ट्रॉयल अभी चल रहा था। वैक्सीन को इतना संवेदनशील मामला माना जाता है कि करीब 30 हजार वालंटियर में से एक पर इसका नकारात्मक असर दिखा तो इसे पूरी तरह रोक दिया गया है।

आज इस मुद्दे पर इसलिए लिखना ठीक लग रहा है कि पूरी दुनिया बड़ी बेसब्री से कोरोना वैक्सीन का इंतजार कर रही है, और दुनिया के बहुत से देशों में इस पर काम चल रहा है, और रूस के अलावा चीन ने इसे बना लेने का दावा किया है, और लोगों को लगाना शुरू करने का भी। ये दोनों ही देश एक नियंत्रित आजादी वाले देश हैं इसलिए यहां की सरकारें किसी के प्रति जवाबदेह नहीं रहती, और उनके दावों की सच्चाई को परखना बाहरी लोगों के लिए मुमकिन नहीं होता। इसके अलावा दुनिया के देशों में एक होड़ भी मची हुई है कि कौन इसे पहले विकसित कर सकते हैं, दवा कारोबार में भी होड़ मची है कि कौन सी कंपनी पहले यह टीका बाजार में उतार सकती है। हिन्दुस्तान भी देश में इसके टीके विकसित करने में लगा हुआ है, और यह देश एक शर्मनाक दावे से किसी तरह उबर पाया जब जुलाई की शुरूआत में इसके मानव परीक्षण शुरू होने के पहले देश की भारतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, आईसीएमआर, ने टीके से संबंधित लोगों को यह चिट्ठी लिखी थी कि इसे तेजी से विकसित किया जाए ताकि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इसे लोगों के लिए उतारा जा सके। इस बात का खूब मखौल बना क्योंकि आजादी की सालगिरह एक जलसा हो सकती है, वह लालकिले से कोरोना-वैक्सीन की घोषणा का एक बेहतरीन मौका हो सकती है, लेकिन वह प्रयोगशाला और अस्पतालों में काम कर रहे वैज्ञानिकों के लिए एक समय सीमा नहीं बन सकती। खैर, शर्मिंदगी के बाद आईसीएमआर ने अपनी चिट्ठी वापिस ली थी। और अब हिन्दुस्तान इस बारे में बोलने की हालत में नहीं बचा है कि भारतीय वैक्सीन में और कितना समय लगेगा।

आज वैक्सीन को लेकर इसके कामयाब हो जाने के बाद भी बहुत से सवाल बचे रहने वाले हैं। इसे विकसित करने वाले देश अपने देश और अपने समर्थकों के बाद इसे किसको देंगे, कितने में देंगे, दवा कंपनियां इस पर कितनी कमाई करेंगी, ऐसे कई सवाल अभी बाकी ही हैं। कल ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह कहा है कि कोरोना के टीके को लेकर एक राष्ट्रवादी सोच दुनिया के लिए बहुत घातक होगी। यह बात एकदम सही है। दुनिया को अगर बचाना है तो लोगों को देशों की सीमा के आरपार फैली हुई, फैलती हुई, और बढ़ती हुई इस महामारी से निपटने के लिए एक राष्ट्रवादी नजरिए के बजाय वैज्ञानिक नजरिए से काम लेना होगा। पूरी दुनिया की फिक्र किए बिना कोई भी देश अपने आपमें महफूज नहीं रह सकेंगे। लोगों को यह भी समझना होगा कि जिन गरीब देशों के पास इस टीके को खरीदने की ताकत नहीं होगी, उन्हें भी वैश्विक स्तर पर एक योजना के तहत ये टीके उपलब्ध कराने होंगे।

अभी हमने भारत में तो ऐसी कोई चर्चा नहीं सुनी है कि केन्द्र सरकार या राज्य सरकारें उस दिन के हिसाब से कोई तैयारी कर रही हैं जिस दिन ऐसा कोई टीका देश को मिल सके। अभी रूस की खबर है कि उसने बड़े पैमाने पर इसके उत्पादन के लिए भारत से बातचीत की है। लेकिन वह उत्पादन तो रूस का रहेगा, भारत का नहीं, और अभी तो उसका असर साबित होना बाकी ही है क्योंकि रूस और चीन के अपारदर्शी ढांचे से निकले किसी सामान पर आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन एक बात जो अभी करना जरूरी है वह यह कि हिन्दुस्तान जैसे भ्रष्ट देश में जहां वीआईपी संस्कृति बुरी तरह से हावी है, जहां पर पूंजीवाद बहुत ही अश्लील और हिंसक ताकत रखता है, वहां पर इस टीके को पहले किनको लगाया जाए यह बात अभी से तय होनी चाहिए। क्योंकि सारे भ्रष्टाचार के बीच भी इस देश में कई तबके अदालत तक जा सकते हैं कि वे पहले इसके हकदार हैं। यह बात तो तय है कि 130 करोड़ से अधिक आबादी को एकमुश्त ऐसे टीके न मिल पाएंगे, न लग पाएंगे। और कुछ अनुमान बताते हैं कि इसमें दो बरस तक का समय लग सकता है। इसलिए सरकार को आज से व्यापक विचार-विमर्श करके यह तय करना चाहिए कि टीकाकरण किन तबकों से चालू हो। और केन्द्र सरकार ने जिस तरह लॉकडाऊन के हर फैसले से राज्यों को परे रखा, कोरोना से जुड़े हर फैसले से राज्यों को अलग रखा, वैसा नहीं होना चाहिए। केन्द्र सरकार इस देश में टीकाकरण के लिए एक एजेंसी हो सकती है, लेकिन उसे हर राज्य से अभी से राय लेनी चाहिए कि वे किस क्रम में टीकाकरण चाहते हैं, और ऐसी तमाम बातों पर सोच-विचार कर ही एक खुला कार्यक्रम बनाना चाहिए।

यह क्रम समझने के लिए बहुत बड़ी अक्ल की जरूरत भी नहीं है, जाहिर है कि सबसे पहले डॉक्टरों और ऐसे चिकित्सा कर्मचारियों का टीकाकरण होना चाहिए जो कि कोरोना-मरीजों के संपर्क में आते हैं। इसके साथ-साथ ऐसे मरीजों के संपर्क में आने वाले एम्बुलेंस ड्राइवर से लेकर शव वाहन चलाने वाले तक का नाम लिस्ट में रहना चाहिए। पुलिस के जो लोग सार्वजनिक ड्यूटी करते हैं, खासकर मरीजों के आसपास जिनकी मौजूदगी की नौबत आती है, उन्हें भी शुरू में ही रखना चाहिए। इस तरह केन्द्र और राज्य सरकारों को टीके के आने के पहले एक पुख्ता लिस्ट बनाकर रखनी चाहिए, अभी से टीकाकरण केन्द्र तय करने चाहिए, वहां पर इंतजाम करने चाहिए। जितने देश टीका विकसित करने में लगे हैं, किसी भी दिन कहीं से अच्छी खबर आ सकती है, और उस वक्त भारत के लॉकडाऊन की तरह हड़बड़ी का कोई वैसा बुरा फैसला फिर से नहीं होना चाहिए। इस भ्रष्ट देश में एक खतरा यह भी रहेगा कि कोरोना का टीका काले बाजार में बिकने लगेगा, जिस तरह इस देश में लोगों की किडनी निकालकर बेचने का धंधा चलता है, तो इस टीके की जगह कोई साधारण इंजेक्शन लगाकर टीके को ब्लैक में बेचने का धंधा नहीं चलेगा यह सोचना भी बेकार है। बहुत से गरीब और अनपढ़ लोग ऐसे रहेंगे जो समझ भी नहीं पाएंगे कि उन्हें किस चीज का इंजेक्शन लग रहा है, और उनका टीका किसी और को बिकना शुरू हो जाएगा। ऐसी तमाम आशंकाओं और ऐसे तमाम खतरों की कल्पना करके उनसे बचाव की योजना भी अभी से तैयार कर लेना चाहिए क्योंकि बिना योजना के बड़े-बड़े फैसले लेने का क्या नतीजा होता है यह हिन्दुस्तान मेें नोटबंदी से लेकर जीएसटी, और लॉकडाऊन तक खूब अच्छी तरह देखा है। कोरोना के टीके पर काम करने वाले लोग अलग हैं, और दुनिया में उसे लगाने वाले संगठन, इस काम को करने वाली सरकारें अलग हैं। इसलिए इस विशाल मेहनत के लिए, एक जटिल व्यवस्था और सावधानी के लिए केन्द्र सरकार को राज्यों की भागीदारी के साथ अभी से योजना बनानी चाहिए।

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