/* */

क्या प्रेस काउन्सिल में भी अपनी सख्ती और बेबाकी का जलवा दिखा पाएंगे जस्टिस मार्कंडेय काट्जू?

Page Visited: 94
0 0
Read Time:5 Minute, 56 Second

सर्वोच्च न्यायालय से कुछ ही दिनों पहले रिटायर हुए सख्त माने जाने वाले न्यायमूर्ति मार्कंडेय काट्जू अब एक और मुश्किल मिशन पर हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उन्हें भारत की बेलगाम और भ्रष्ट होती जा रही मीडिया पर शिकंजा कसने की जिम्मेदारी सौंपी है इंडियन प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष बना कर। न्यायमूर्ति काट्जू का मीडिया से काफी पुराना रिश्ता रहा है क्योंकि वे अपने कार्यकाल में कई बड़े फैसले लेने के लिए अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियां बटोर चुके हैं।

20 सितम्बर 1946 को जन्मे काट्जू कई पीढ़ियों से वकालत और अदालतों से संबद्ध रह चुके हैं। कई स्वतंत्रता सैनानियों के वकील रहे कैलाशनाथ काट्जू, जो बाद में केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल भी बने, न्यायमूर्ति काट्जू के दादा थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ब्रह्मानंद काट्जू उनके चाचा थे जबकि इसी उच्च न्यायालय में न्याधीश रहे न्यायमूर्ति शिवानंद काट्जू उनके पिता थे। वर्ष 1991 में मार्कंडेय काट्जू को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया था। अगस्त 2004 में वह इसी न्यायालय में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यरत रहे। फिर नवम्बर 2004 में उन्हें मद्रास उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। वे अक्टूबर 2005 में दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने।

अप्रैल 2006 में उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया। उनकी बेबाक टिप्पणियों ने कई बार अदालत के बाहर और भीतर तूफान खड़ा कर दिया था। दारिया मुठभेड़ मामले में निलम्बित एडीजे अरविन्द जैन की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काट्जू ने कहा था कि फर्जी मुठभेड़ करने वालों को फांसी मिलनी चाहिए। न्यायमूर्ति काटजू ने भ्रष्टाचार को लेकर कड़े स्वर में कहा था कि भ्रष्ट लोगों को खंभों पर लटका देना चाहिए क्योंकि देश में भ्रष्टाचार से निपटने का यही मात्र तरीका है। उन्होंने एक बार पुलिस पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि किसी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने से ही कोई व्यक्ति आतंकवादी या अपराधी नहीं हो जाता।

न्यायमूर्ति काट्जू झूठी शान के नाम पर होने वाली ऑनर किलिंग और दहेज हत्याओं के खिलाफ भी खासे सख्त रहे थे। उन्होंने एक बार कह डाला था कि मुस्लिम अपने शिक्षण संस्थानों में दाढ़ी रखने पर जोर नहीं दे सकते और भारत का तालिबानीकरण नहीं कर सकते। हालांकि बाद में उनके इस बयान को लेकर खासा हो-हल्ला मचा था और न्यायमूर्ति काट्जू ने अपनी टिप्पणी के लिए अफसोस जताते हुए अपने फैसले को भी वापस ले लिया था।

न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू करीब साढ़े पांच साल देश की सबसे बड़ी अदालत में रहे। उन्हें अपने सख्त फैसलों के लिए जाना जाता है। वे 19 सितम्बर, 2011 को सेवानिवृत्त हुए। न्यायमूर्ति काटजू के सर्वोच्च न्यायालय से रिटायरमेंट के दौरान न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने कहा था, ”जस्टिस काटजू ने ना तो कभी सच बोलने का साहस छोड़ा और न ही आम आदमी के प्रति अपनी चिंता छोड़ी।”

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा बुधवार को की गई घोषणा के मुताबिक काटजू प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष पद पर न्यायाधीश जी. एन. राय की जगह लेंगे। हालांकि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया सरकार की एक ऐसी अर्धन्यायिक निकाय है जिसका काम मीडिया के क्रियाकलापों पर नजर रखना है, लेकिन इसे कागजी शेर कहा जाता है क्योंकि इसके पास ठोस कार्रवाई करने के अधिकार नहीं हैं। नियम के तहत इसका अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है। अपनी कमजोर छवि के लिए काफी हद तक इसके पूर्व अध्यक्षों को भी दोषी ठहराया जाता है जिन्होंने अपने सीमित दायरे से बाहर निकलने की कोशिश भी नहीं की। अब देखना है कि एक दमदार अध्यक्ष के नेतृत्व में यह संस्था अपने वास्तविक उद्देश्यों में किस हद तक खरा उतर पाती है।

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

2 thoughts on “क्या प्रेस काउन्सिल में भी अपनी सख्ती और बेबाकी का जलवा दिखा पाएंगे जस्टिस मार्कंडेय काट्जू?

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram