Home गौरतलब चीन पर सरकारी रवैया

चीन पर सरकारी रवैया

मोदी सरकार की विफल विदेश नीति और अस्पष्ट बयानबाजी का बड़ा नुकसान अब एलएसी पर देखने मिल रहा है। मई से भारत और चीन के सैनिक एलएसी पर आमने-सामने हैं। यह तनाव जून में और बढ़ गया जब गलवान घाटी पर हमारे कई सैनिक शहीद हो गए। दोनों देशों के बीच सैन्य अधिकारी स्तर की चर्चा लगातार हो रही है लेकिन तनाव किसी भी तरह खत्म नहीं हो रहा, बल्कि अब और बढ़ता नजर आ रहा है। अब तक पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर फिंगर- 4 में भारत-चीन सैनिक आमने-सामने थे,  लेकिन अब तनाव का सबसे बड़ा पॉइंट पैंगोंग झील के दक्षिण किनारे रेजांग ला के पास की चोटियां बन गई हैं।  

पिछले 53 सालों से एलएसी पर फायरिंग नहीं हुई थी, लेकिन अब चीन का आरोप है कि भारतीय सैनिकों ने उसके सैनिकों पर गोली चलाई। चीनी प्रवक्ता झांग शिउली ने दावा किया कि भारतीय सैनिकों ने ‘दोनों पक्षों द्वारा किए गए समझौते का उल्लंघन किया है, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है और इससे आसानी से गलतफहमी पैदा होगी, जो एक गंभीर सैन्य उकसावा है और यह घृणित कार्य है। हालांकि भारतीय सेना की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि एलएसी पर भारतीय सैनिकों की ओर से कोई गोली नहीं चलाई गई है।

उन्होंने कहा कि चीन की तरफ से ही उकसावे की कार्रवाई की गई है। गौरतलब है कि साल 1996 में ‘भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ सैन्य क्षेत्र में ‘विश्वास-निर्माण के उपायों’ पर किए गए एक समझौते के तहत ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा के दो किलोमीटर के भीतर’ फायरआर्म्स के उपयोग पर प्रतिबंध है। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि इस प्रतिबंध का उल्लंघन किया गया है। और दोनों पक्ष एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

भारत-चीन के बीच ये ताजा तनाव उस वक्त बना है जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह हाल ही में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में मास्को में चीन के रक्षा मंत्री के साथ मुलाकात कर चुके हैं और अब विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अपने चीनी समकक्ष के साथ मास्को में मुलाकात होगी। इन मुलाकातों का कोई अर्थ तभी निकलेगा जब दोनों देशों के बीच तनाव कम करने पर सहमति बनेगी। अभी आलम ये है कि बातचीत की मेज पर जो सहमति बनती है वो सीमा पर तनाव के रूप में नजर आती है। 

चीन लगातार अपनी बातों से मुकर रहा है। वह ऐसा दुस्साहस क्यों कर रहा है अब इस सवाल का ईमानदारी से जवाब तलाशने का समय शायद आ गया है। अभी दो दिन पहले चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लजिनि ने अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा बताया था। उनका कहना है कि चीन ने कभी अरुणाचल प्रदेश को मान्यता नहीं दी है जो चीन का दक्षिणी तिब्बत इलाका है। दरअसल उनसे उन पांच युवकों के बारे में पूछा जा रहा था, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि चीन की सेना ने उन्हें अगवा कर लिया है। बताया जाता है कि ये युवक भारतीय सेना के लिए पोर्टर के रूप में काम करते थे जो दुर्गम क्षेत्रों में सामान की ढुलाई करते थे। यह भी कहा जा रहा है कि ये आदिवासी युवक संभवत: जंगल की ओर गए होंगे जहां से ये चीनी सेना के हत्थे चढ़े। चीन के प्रवक्ता ने इन युवकों के बारे में कुछ नहीं कह कर एक बार फिर चीन के अड़ियल रवैये को उजागर किया।

चीन बार-बार यही संकेत दे रहा है कि वह सीमा पर अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आएगा, उसके सैनिक पीछे नहीं हट रहे हैं, हमारी जमीन का कुछ हिस्सा चीनियों के कब्जे में है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी अब भी खुलकर कुछ नहीं बोल रहे हैं। जून में ही जब तनाव खुलकर सामने आया था, तब अगर वे सच्चाई को स्वीकार कर सही फैसले लेते तो शायद सीमा पर हालात दूसरे होते। लेकिन तब वे यही कह रहे थे कि कोई हमारी ओर आंख उठाकर नहीं देख सकता, कोई हमारी जमीन पर नहीं आया है। उस गलतबयानी का खामियाजा आज हमारी सेना और सीमांत गांवों के नागरिक भुगत रहे हैं। मोदीजी को अब तो कम से कम कोई निर्णायक कदम उठाना चाहिए। लेकिन वे अब भी इशारों में धमकाने में लगे हुए हैं। 

सोमवार को जब डीआरडीओ ने हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक का सफल परीक्षण किया तो मोदीजी ने बधाई देते हुए कहा कि बहुत कम देशों के पास ऐसी क्षमता है। उनके इस बयान को परोक्ष तौर पर चीन के लिए धमकी माना जा रहा है। दरअसल अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत यह तकनीक हासिल करने वाला चौथा देश बन गया है।  बेशक हमारे वैज्ञानिकों ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। हमारे सैनिक भी दिन-रात मोर्चे पर डटे हुए हैं। चीन के आर्थिक बहिष्कार से हो रहे प्रभाव को देश की जनता महसूस कर रही है, फिर भी देशहित में उसे यह बहिष्कार स्वीकार है। सब अपनी जिम्मेदारी और देश के लिए योगदान अपनी क्षमता के अनुकूल दे रहे हैं। सवाल ये है कि मोदी सरकार कब साफ-साफ बात करेगी और अपनी जिम्मेदारी निभाएगी।

(देशबंधु)

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