Home गौरतलब हम क्या बन चुके हैं.?

हम क्या बन चुके हैं.?

सुशांत सिंह राजपूत की आकस्मिक मौत के बाद उनकी महिला मित्र रिया चक्रवर्ती से अब नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो पूछताछ कर रही है। इसी सिलसिले में वे रविवार को जब ब्यूरो के दफ्तर पहुंची तो वहां मौजूद मीडियाकर्मियों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की। इस दृश्य को देखने के बाद मीडियाकर्मियों के लिए बहुत से लोग नाराजगी प्रकट कर रहे हैं। अभिनेता प्रकाश राज ने इस बारे में ट्वीट किया है कि ‘शर्मनाक… दिल टूट गया… हम क्या बन चुके हैं?’ उनका ये सवाल शायद इस वक्त का सबसे बड़ा सवाल होना चाहिए। जो समाज को, सरकार को, अधिकारियों को, मीडियाकर्मियों को आत्मविश्लेषण के लिए प्रेरित करता है। हम अपने भीतर झांके और देखें कि बीते कुछ सालों में हम इंसान होने के नाम पर क्या हो गए हैं।

सुशांत सिंह की मौत से उनके हजारों-लाखों प्रशंसकों को तकलीफ हुई। उनके परिवार वालों के लिए दुख हुआ। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि बिहार चुनाव के मद्देनजर उस दुख का तमाशा बनाने की राजनैतिक चाल चली गई, जिसके नियम मीडिया ने तय किए और रिया चक्रवर्ती को कानूनी प्रक्रिया के बगैर ही दोषी ठहरा दिया गया। जून से रिया को दोषी साबित करने का जो उन्माद मीडिया ने फैलाना शुरु किया, जो बिहार चुनाव का वक्त नजदीक आते-आते और बढ़ता जा रहा है। एक समाज में अकेली स्त्री या अपने सपनों को पूरा करने की चाह रखने वाली लड़की, अपने प्यार का खुलकर इजहार करने वाली लड़की के लिए कितने दोहरे मापदंड रखे जाते हैं, यह रिया प्रकरण में एक बार फिर साबित हो गया है।

रिया और उनका परिवार सुशांत की मौत के लिए कितना दोषी है या नहीं, इसका फैसला तो अदालत को करना है, लेकिन उससे पहले ही विषकन्या, काला जादू करने वाली लड़की जैसे तमाम विशेषणों से रिया को दोषी साबित करने का काम मीडिया कर चुका है। मीडिया के उन्माद फैलाने का ही नतीजा है जो रिया के साथ इस तरह की धक्का-मुक्की हुई। उन्हें सामाजिक, मानसिक या कानूनी तौर पर कोई सुरक्षा नहीं मिल रही है।

लेकिन इस बीच एक अन्य अभिनेत्री कंगना रनौत, जो खुद को नेपोटिज्म की पीड़िता के रूप में प्रस्तुत करती हैं और अपने साधारण परिवार, छोटे शहर से होने के कारण भेदभाव की बात को अक्सर उठाती हैं, उन्हें सरकार ने वाय श्रेणी की सुरक्षा दी है, क्योंकि मुंबई में शिवसेना सांसद संजय राउत के साथ उनकी जुबानी बहस हुई है।

सोशल मीडिया पर अपने क्रांतिकारी तेवर दिखाने वाली कंगना को मुंबई में शायद डर महसूस हो रहा है। वैसे इस देश में हजारों-लाखों लड़कियां हैं, जो वाय तो दूर ए श्रेणी की सुरक्षा के लिए भी तरस जाती हैं। उनकी चाहत तो बस इतनी ही होती है कि वे अपने घर से सुरक्षित स्कूल, कालेज या दफ्तर पहुंचे और सुरक्षित लौट आएं।  

लेकिन यह सुरक्षा भी उन्हें कई बार नहीं मिल पाती। और मीडिया भी इस बारे में तब तक आवाज नहीं उठाता, जब तक निर्भया या कठुआ या उन्नाव जैसा कोई बड़ा मामला न हो जाए। अब तो ऐसा लग रहा है मानो मीडिया सही मायनों में जनता की आवाज ही नहीं उठाता है, बल्कि वह सरकार का भोंपू बन चुका है। इसलिए देश में बीते बरसों में हेट स्पीच के मामले बढ़ते गए और सौहार्द्र कम होता गया। इस हेट स्पीच का पहला शिकार अल्पसंख्यक होते हैं और अवसरों के मुताबिक कभी-कभी रिया जैसी स्वतंत्र पहचान बनाने की इच्छा रखने वाली लड़कियां भी हेट स्पीच के निशाने पर होती हैं। इन लड़कियों का चरित्र हनन सबसे आसान काम होता है। 

एनडीटीवी ने एक विश्लेषण में बताया गया है कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के चौथे वर्ष के दौरान हेट स्पीच के मामलों में 500 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। विश्लेषण के मुताबिक ये भाषण संसद और विधानसभाओं के चुने हुए प्रतिनिधियों, मुख्यमंत्रियों, उच्च पदों पर बैठे लोगों, पार्टी के बड़े नेताओं और राज्यपालों द्वारा दिए गए। हेट स्पीच का दूसरा स्रोत सोशल मीडिया है,  इसके लिए नैतिक तौर पर खोखली हो चुके फेसबुक जैसे प्लेटफार्म का इस्तेमाल किया जा रहा है। हेट स्पीच की मुहिम को आगे बढ़ाने में तीसरा मंच मीडिया का रहा है। इसके जरिये बड़े पैमाने पर कट्टरपंथ और सांप्रदायिक झूठ के साथ हिंसा को बढ़ावा दिया जाता है। अभी कोरोना के वक्त ही किस तरह तब्लीगी जमात को मीडिया ने निशाने पर लिया था, यह सबने देखा है। इस पर अदालत की फटकार भी उसे पड़ी।

लेकिन बीते दिनों नफरत खड़ी करने की एक नई कोशिश नौकरशाही जिहाद के नाम पर देखने मिली। सुदर्शन टीवी के चीफ एडिटर सुरेश चव्हाणके ने सिविल सेवाओं में मुसलमानों के चयन पर सवाल उठाने वाले एक कार्यक्रम का टीजर जारी किया,  जिसे 28 अगस्त की रात प्रसारित किया जाना था, लेकिन उसके पहले ही दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी। इस टीजर में चव्हाणके ने दावा किया कि सिविल सेवाओं में मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों की संख्या बढ़ने के पीछे एक गहरी साजिश है। उन्होंने कहा, ‘हाल ही में मुस्लिम आईपीएस और आईएएस अधिकारियों की संख्या कैसे बढ़ गई?  सोचिए, जामिया के जिहादी अगर आपके जिलाधिकारी और हर मंत्रालय में सचिव होंगे तो क्या होगा?’ जामिया देश और दुनिया के बेहतरीन शिक्षण संस्थानों में एक है और यहां हिंदू-मुस्लिम दोनों पढ़ते हैं। लेकिन नफरत के कारोबारी सबसे पहले शिक्षण संस्थानों की बलि ही चढ़ाना चाहते हैं।

जेएनयू की छवि बिगाड़ने के बाद अब जामिया निशाने पर है। बहरहाल, सुरेश चव्हाणके ने अपने इस कार्यक्रम की सूचना ट्विटर पर दी और इस ट्वीट में उन्होंने देश में सत्ता के दो केंद्रों यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस को टैग किया। इसके जरिए शायद वे ये संदेश दे रहे हैं कि उन्हें कहां-कहां से संरक्षण मिला है। वैसे नौकरशाही जिहाद का नया विवाद खड़ा करने वाले चव्हाणके ये जानते ही होंगे कि देश के 8,417 आईएएस और आईपीएस अधिकारियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी 3.46 फीसदी है, यानी देश में कुल 292 मुस्लिम अधिकारी हैं। ये बात हमें याद रखनी चाहिए कि संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा बिना किसी भेदभाव के आयोजित होती है, यही कारण है कि किसी रिक्शेवाले या दिहाड़ी मजदूर के बच्चे को भी अपनी योग्यता के मुताबिक यूपीएससी उत्तीर्ण करने का मौका किसी संपन्न तबके के बच्चे के समान ही मिलता है।

देश के संचालन में प्रशासनिक अधिकारियों की महती भूमिका होती है और इन्हें धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश करना देश को बांटने के समान ही है। दुख इसी बात का है कि ये कोशिश लगातार जारी है। इसलिए ये पूछना जरूरी है कि हम क्या बन चुके हैं।

(देशबंधु)

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