कुंभकर्णी नींद में सोई सरकार..

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2014 में मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने के पीछे कार्पोरेट जगत का साथ होने के साथ, युवाओं के बीच उनका लोकप्रिय हो जाना भी एक बड़ा कारण था। उन्होंने तब जो भाषण दिए, उनमें अक्सर युवा भारत, नौजवान साथियों का जिक्र होता था। ये वही साल था जब युवाओं को हर साल 2 करोड़ रोजगार का सपना भी देखने मिला। इससे पहले यूपीए शासनकाल में अन्ना आंदोलन ने कांग्रेस की छवि धूमिल की, और राहुल गांधी, डॉ.मनमोहन सिंह को एक मजाक की तरह पेश किया। इस आंदोलन की तुलना जेपी आंदोलन से मीडिया ने प्रायोजित तरीके से करनी शुरु कर दी, ताकि इस पीढ़ी के नौजवानों तक यह संदेश पहुंचे कि जैसे तब कांग्रेस की सरकार को हटाया गया था, वैसे ही इस बार भी सत्ता से बेदखल करने का काम अन्ना हजारे के नेतृत्व में देश के युवा करेंगे। कांग्रेस सत्ता से हट गई।

अन्ना हजारे वापस रालेगण सिद्धि पहुंच गए। उनके साथियों में अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की सत्ता मिल गई। किरण बेदी पुड्डुचेरी की उपराज्यपाल बन गई हैं। इससे पहले केंद्र में मोदी सरकार काबिज हुई। देश का राजनैतिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका था। बस नहीं बदले तो वे हालात, जिनसे आम आदमी को तकलीफ हो रही थी। यानी महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, किसानों, मजदूरों की दुर्दशा, महिलाओं के लिए असुरक्षित माहौल, ये तमाम समस्याएं पहले से कहीं अधिक विकराल रूप में जनता को डराने लगीं। इन समस्याओं के लिए कांग्रेस विरोधियों ने एक झटके में यूपीए सरकार की नाकामियां करार दिया था।

लेकिन अब एनडीए शासनकाल में, मोदीजी की अगुवाई वाली सरकार में जब बेरोजगारी 45 सालों के उच्च स्तर पर पहुंच गई, लॉकडाउन ने करोड़ों नौकरियां छीन लीं, तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता होने के बावजूद भारतीयों को खून के आंसू रूला रहा है, जीडीपी लगभग 24 फीसदी गिर चुकी है, तब इसे मोदीजी की नाकामियां नहीं बताया जाता, इसके लिए हालात को जिम्मेदार ठहराया जाता है। कम से कम गोदी मीडिया बहानेबाजी का यही प्राइमटाइम रोज चला रहा है और असल मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए फर्जी विमर्श खड़े कर रहा है। कुछ ऐसा ही हाल खुद प्रधानमंत्री का भी है। जो अपने मासिक कार्यक्रम मन की बात में अब अनर्गल बात करने लगे हैं।

2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदीजी ने मन की बात कार्यक्रम शुरु किया था। रेडियो के जरिए जनता तक पहुंचना सबसे आसान होता है, यह बात वे जानते हैं। वैसे भी जुमलेबाजी के साथ संवाद उनकी पुरानी अदा रही है। 2014 के चुनाव प्रचार के वक्त चाय पर चर्चा का फायदा उन्होंने देखा था। खैर… पिछले छह सालों से लगातार हर महीने के आखिरी रविवार को मोदीजी मन की बात करते हैं। 

इन छह सालों में उन्होंने देश और आम आदमी के जीवन से जुड़े कई मुद्दों पर मोनोलॉग किया। हालांकि वे इस कार्यक्रम के लिए बाकायदा जनता से सुझाव भी मांगते हैं कि वो किस मुद्दे पर चर्चा चाहती है। ये और बात है कि मोदीजी को करना अपने मन की ही होती है। इसलिए उन्होंने अक्सर जरूरी मुद्दों पर चर्चा नहीं की और इधर-उधर की बातों में टाइमपास किया। लेकिन अब ये टाइमपास शायद लोगों को खटकने लगा है। इसका सबूत है इस बार यानी अगस्त महीने की मन की बात कार्यक्रम को मिले डिस्लाइक। इस कार्यक्रम को यूट्यूब पर जितने लोगों ने लाइक किया उससे दस गुना अधिक लोगों ने डिस्लाइक किया।

यह खबर जंगल में आग की तरह फैली और भाजपा के आईटी सेल ने तुरंत सफाई दी कि यह सब कांग्रेस का किया धरा है। साथ ही मीडिया में यह खबर प्लांट करवाई गई कि इस कार्यक्रम को इतने लाख लोग देखते हैं और इस एपिसोड को नीट-जेईई की परीक्षा को लेकर छात्रों के असंतोष के चलते भी जानबूझकर दुष्प्रचारित किया गया। गौरतलब है कि मन की बात रेडियो और टीवी के साथ-साथ भाजपा,  मोदी जी, पीएमओ और पीआईबी के यूट्यूब चैनल पर भी प्रसारित किया जाता है। इन सभी यूट्यूब चैनल पर यही स्थिति थी कि लाइक करने वालों से अधिक संख्या डिस्लाइक करने वालों की थी। इसके बाद मोदी जी ने प्रोबेशन आईपीएस अधिकारियों को जो सम्बोधित किया उसे भी कई डिस्लाइक मिले। अब क्या भाजपा बताएगी कि आईपीएस अधिकारियों के कार्यक्रम से लोगों की क्या नाराजगी हो सकती है?

 बहरहाल, डिस्लाइक से परेशान पीएमओ के यूट्यूब चैनल पर कमेंट और लाइक डिस्लाइक करने का ऑप्शन ही अब हटा दिया गया है। अब केवल इतना पता चलता है कि यह कार्यक्रम अब तक कितने लोगों ने देखा है। बता दें कि मोदी जी के निजी यूट्यूब चैनल के 76 लाख सब्सक्राइबर हैं और उनके 12 हजार वीडियो इसमें हैं। हाल के महीनों का ट्रेंड देखें तो पता चलता है कि यूट्यूब पर उनके कार्यक्रम केवल चंद हजार लोग ही अब देखते हैं और लगभग हर कार्यक्रम को लाइक करने वालों से अधिक डिस्लाइक करने वालों की संख्या अधिक होती है। यह ट्रेंड उन तमाम चैनल्स का भी है जहां मोदी जी के वीडियो डाले जाते हैं। 

जाहिर है यह सब मोदी जी की सरकार की नाकामियों का ही नतीजा है। लेकिन सरकार का रवैया तो ऐसा है कि अपनी गलती मान कर थोड़ा झुक जाएगी तो उसकी बड़ी हेठी हो जाएगी। सरकार अपनी गलती माने न माने, लेकिन अब देश के युवाओं का बड़ा तबका उसके कानों तक उसकी नाकामियों का शोर पहुंचाने के लिए तत्पर है। और इसकी एक कोशिश 5 सितंबर को देखने मिली, जब देश भर के युवाओं ने 5 बजे 5 मिनट तक थाली पीट कर बेरोजगारी के मसले पर सरकार का विरोध जताया। 5 सितंबर को सोशल मीडिया ऐसे तमाम वीडियो और पोस्ट से भरा रहा, जिनमें परीक्षाओं और रोजगार को लेकर सरकार का विरोध देखने मिला।

बीते कुछ समय से एसएससी रेलवे की परीक्षाओं को लेकर भी सरकार विरोधी ट्रेंड सोशल मीडिया पर चला था और इसी का असर था कि 5 तारीख की शाम 6 बजे के करीब केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के ट्विटर अकांउट से जानकारी दी गई कि परीक्षाएं 15 दिसंबर से होंगी। गौरतलब है कि रेलवे के नॉन टेक्निकल पॉपुलर कैटगिरीज में फरवरी, 2019 में 35,308 पोस्ट की वैकेंसी निकली थी और एक करोड़ से ज़्यादा आवेदन आए थे। जून-सितंबर 2019 के बीच इसकी परीक्षा होनी थी लेकिन अब 2020 का सितंबर आ गया और परीक्षा नहीं हुई। ऐसे ही रेलवे की गु्रप डी की परीक्षा भी लटकी थी। अन्य परीक्षाओं को लेकर भी ऐसा ही हाल है कि कहीं परीक्षा हो गई, लेकिन परिणाम नहीं आए और परिणाम है तो रिजल्ट नहीं आया। इससे लाखों छात्रों में रोष था, जो थालियों की आवाज के जरिए सरकार तक पहुंचाया गया। कुंभकर्ण की नींद सोई सरकार अब भी जागती है या नहीं, ये देखना होगा।

(देशबंधु)

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