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डॉ. कफील की रिहाई से उपजे सवाल ​

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29 जनवरी से मथुरा की जेल में बंद डॉ.कफील खान आखिरकार 1 सितंबर को जेल की सलाखों से बाहर आ गए। सात महीने की उनकी यह कैद राजनीति, मानवाधिकार, लोकतंत्र और इंसाफ से जुड़े कई सवाल खड़े करती है। गौरतलब है कि पिछले साल दिसंबर में नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के ​िखलाफ डॉ. कफील खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भाषण दिया था। जो सरकार और कथित राष्ट्रवादियों की नजर में भड़काऊ था। इस वजह से डॉ. कफील के ​​िखलाफ अलीगढ़ के सिविल लाइंस थाने में केस दर्ज किया गया था। 29 जनवरी को उत्तरप्रदेश के एसटीएफ ने उन्हें मुंबई से गिरफ़्तार किया और मथुरा जेल में बंद किया। डॉ. कफील को 10 फरवरी को जमानत मिल गई थी, लेकिन इसके बावजूद तीन दिन तक जेल से उनकी रिहाई नहीं हो सकी और इस दौरान अलीगढ़ जिला प्रशासन ने उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा $कानून (एनएसए) लगा दिया। याद रहे कि एनएसए उस स्थिति में लगाया जाता है जब किसी व्यक्ति से राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा हो या फिर $कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका हो। एनएसए में सरकार को अधिकार होता है कि वह किसी भी व्यक्ति को हिरासत में रखे। इस $कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को एक साल तक जेल में रखा जा सकता है। उत्तरप्रदेश सरकार की नजर में डॉ. कफील से राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा था, क्योंकि उन्होंने भी उसी कानून का विरोध किया, जिस पर देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। सीएए विरोधी प्रदर्शनों को रोकने के लिए कई तरह की कोशिशें की गईं। महिलाओं के चरित्रहनन से लेकर, अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने जैसे प्रयास हुए। भड़काऊ बयान और भाषण दिए गए, जिनके बाद दिल्ली दंगे जैसे भीषण परिणाम भी देखने मिले। भाजपा के कुछ नेताओं ने गोली मारो जैसे उकसाने वाले बयान दिए, लेकिन उनके खिलाफ एफआईआर करने में कोताही बरती गई। उनके भाषणों में राष्ट्र के लिए कोई खतरा नजर नहीं आया, उन पर कानून की सख्ती देखने नहीं मिली। लेकिन डॉ.कफील खान के सरकार के फैसले विरोधी भाषण को देशविरोधी मान कर उन्हें जेल में डालने में जरा देरी नहीं की गई, मानो उनके आजाद रहने से सरकार को किसी किस्म का डर लग रहा था। उन्हें जमानत मिलने के बावजूद एनएसए लगाना भी सरकार के डर को ही जाहिर करता है। डॉ. कफील की रिहाई के लिए लंबे समय से आवाज उठ रही थी। पिछले कुछ वक्त से कांग्रेस ने भी उनके हक में इंसाफ मांगा था। आखिरकार अदालत में उनके हक में फैसला आया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को अपने $फैसले में कहा कि कफील खान को एनएसए के तहत गिरफ़्तार किया जाना ‘गैरकानूनी’ है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ‘डॉ. कफील खान का भाषण किसी तरह की नफरत या हिंसा को बढ़ावा देने वाला नहीं था, बल्कि यह लोगों के बीच राष्ट्रीय एकता का आह्वान था। इसके साथ ही अदालत ने डॉ. कफील खान को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था। अदालत के इस फैसले से जाहिर है कि डॉ.कफील पर जो भी कार्रवाई की गई, उसके पीछे राजनैतिक दुर्भावना काम कर रही थी।
सवाल ये है कि क्या पुलिस ने राजनैतिक निर्देशों पर काम किया। अगर ऐसा है तो इसकी जांच कौन करेगा और क्या उन अधिकारियों पर कार्रवाई होगी, जिन्होंने और कानून का दुरुपयोग किया। सवाल ये भी है कि डॉ.कफील $खान की आजादी, अभिव्यक्ति के अधिकार समेत जिन लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा। सवाल ये भी है कि क्या डॉ.कफील खान ने अल्पसंख्यक होने का खामियाजा भरा। क्योंकि एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि देश की जेलों में 4.72 लाख कैदी हैं, जिनमें से 70 प्रतिशत विचाराधीन हैं और केवल 30 प्रतिशत दोषी हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सबसे ज्यादा कैदी उत्तरप्रदेश की जेलों में ही बंद हैं, यहां कैदियों की संख्या लगभग एक लाख है। उप्र की जेलों में दलित और मुस्लिम कैदियों की संख्या भी देश में सबसे अधिक है। ये आंकड़े आज की राजनीति की हकीकत बयां करते हैं। अब शायद वक्त आ गया है कि जनता भी इस हकीकत को देखे और समझे। अन्यथा आखिर में नुकसान उसे ही भुगतना पड़ेगा। डॉ.कफील $खान पहले भी कानून के बेजा इस्तेमाल से पीड़ित हो चुके हैं। 2017 के गोरखपुर मामले में, उन्हें कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। यहां के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन सिलेंडरों की कमी के चलते कई बच्चों की मृत्यु हो गई थी। तब आपात स्थिति में ऑक्सीजन सिलेंडरों की व्यवस्था कर कई बच्चों की जान बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. कफील ने बचाई थी। उन्हें हीरो की तरह समाज में देखा जाने लगा था, लेकिन जल्द ही उन्हें विलेन वाली छवि में ढाल दिया गया। उन पर कार्रवाई हुई। लेकिन बाद में जमानत भी मिल गई। हैरानी की बात ये है कि जिस योगी सरकार में इतने बच्चों की जान चली गई, उससे सवाल पूछने की हिम्मत नहीं दिखाई गई। 2017 के बाद से डॉ. कफील तरह-तरह की ज्यादतियों और दुष्प्रचार का सामना कर रहे हैं। कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर एक हास्पिटल का ब्लू प्रिंट वायरल हुआ, जिसे ‘बाबरी हॉस्पिटल’ का ब्लू प्रिंट बताया गया और ये भी कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए मिली 5 एकड़ की जमीन पर इस हास्पिटल को बनवाने की योजना में है। दावा ये भी किया गया कि डॉ. कफील $खान इस हॉस्पिटल के प्रमुख होंगे। लेकिन ये एक अमेरिकी हॉस्पिटल की फोटो थी। इस तरह के भ्रामक प्रचार से समझा जा सकता है कि किस तरह किसी व्यक्ति और समुदाय के बारे में गलत धारणाएं बनाने की कोशिशें चल रही हैं। मगर इसमें नुकसान देश का ही है। डॉ.कफील एक अच्छे डॉक्टर हैं और उनकी सेवाएं समाज को मिलनी चाहिए। वे खुद कोरोना के वक्त अपने चिकित्सीय दायित्व को निभाना चाहते हैं। बेहतर होगा कि उन्हें राजनैतिक बदले की जगह समाज के लिए उपयोग में लाया जाए।

(देशबंधु)

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