असफलताएँ छिपाने के लिए बच्चों का सहारा..

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मोदी सरकार इस संकटकाल में संवेदनहीनता को रोज नई ऊंचाइयों पर लेकर जा रही है। दुनिया भर में सरकारें इस वक्त जनता को राहत पहुंचाने वाले फैसले ले रही हैं। फिर चाहे वो उनके रोजगार न रहने पर वेतन की व्यवस्था हो, कारोबार को गति देने की हो, गृहणियों की मदद की हो या विद्यार्थियों की पढ़ाई की हो, हर क्षेत्र में इस तरह के फैसले लिए जा रहे हैं कि आम जनता इस भयावह बीमारी के दौर में और भयभीत न हो, बल्कि अपनी जिंदगी और सम्मानजनक जीवन के लिए आश्वस्त रहे। लेकिन भारत में सरकार की प्राथमिकता लोककल्याण शायद है ही नहीं। इसलिए लॉकडाउन में सड़क पर आ गए करोड़ों मजदूरों को उनके भाग्य भरोसे छोड़ दिया गया। और भारत एक बड़ी मानवीय त्रासदी का गवाह बना, जो दरअसल सरकार की संवेदनहीनता का परिणाम थी। इसके बाद राहत पैकेज के नाम पर निजीकरण को आसान बनाने वाले फैसले ले लिए गए।

रोजगार को मनरेगा तक सीमित कर दिया गया। सच अनमोल होता है, ये तो पता था, लेकिन झूठ 20 लाख करोड़ का बोला जा सकता है, ये भी देश ने देख लिया। लॉकडाउन और अनलॉक के बावजूद कोरोना से बीमारों की संख्या लाखों हो गई है, और अब सरकार ने इस पर भी बात करना लगभग बंद कर दिया है। इधर पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर सरकार के फरमानों का चाबुक पड़ा तो वह मरणासन्न हो चुकी है और सरकार इसे एक्ट ऑफ गॉड बता रही है। इसके साथ ही जुमले गढ़ने से भी बाज नहीं आ रही है। सरकार का 2020 का जुमला है आत्मनिर्भर भारत। जिस पर मोदीजी आए दिन प्रवचन करते रहते हैं।

अगस्त माह के मन की बात कार्यक्रम में भी उन्होंने इसे एक नए अंदाज में पेश किया। ठेठ मार्केटिंग वाले अंदाज में। जैसे बाजार जानता है कि किसी उत्पाद की बिक्री बढ़ानी हो तो उसका विज्ञापन बच्चों को लेकर करने से नतीजे अच्छे आते हैं। इसलिए कफ सिरप से लेकर, डिटर्जेट पावडर तक और तेल से लेकर टूथपेस्ट तक कई उत्पाद बच्चों के भरोसे बिकते हैं। अब भारत के प्रधानमंत्री ने भी बच्चों का सहारा लिया है। इस बार के मन की बात कार्यक्रम में उन्होंने खेल-खिलौनों की बात की।

दुनिया में खिलौनों के व्यापार में भारत की हिस्सेदारी कैसे बढ़ सकती है, कैसे भारत के लोकल खिलौना उद्योग के लिए वोकल हुआ जाए, इसकी वकालत उन्होंने की। वे अपने बाल मित्रों की बात करते हैं तो लगता है जैसे चाचा नेहरू से प्रतियोगिता कर रहे हैं। जैसे मोर को दाना चुगाते हुए वे देश के सामने आपनी कोमल हृदय छवि पेश करना चाहते थे, वैसे ही बच्चों की बातें कर दिखाना चाहते हैं। लेकिन सरकार को ये भी समझना होगा कि देश चलाना खेल खेलने जैसा नहीं है।

खेल में हार या जीत के बाद दोबारा खड़ा हुआ जा सकता है, देश चलाने में हारने का मतलब जनता को तकलीफों में झोंकना है। देश की जनता इस वक्त ऐसे ही तकलीफों की भट्टी में झुलस रही है। उसके पास रोजगार नहीं है और सरकार उसे भारत को आत्मनिर्भर बनाने कह रही है।

गरीबों के पास दो वक्त का भोजन नहीं है। सरकार खुद ऐलान कर रही है कि वह 80 करोड़ गरीबों को हर महीने पांच किलो राशन दे रही है और ऐसे में मोदी जी मन की बात में न्यूट्रिशियन और नेशन की  जुगलबंदी कर रहे हैं। जैसा अन्न वैसा मन का ज्ञान दे रहे हैं। वैसे देश जानना चाहेगा कि मोदीजी खुद क्या खाते हैं, जो उनके मन में जरूरी मुद्दों को छोड़ बाकी सारी बातें करने के ख्याल आते हैं। 

कितने आश्चर्य की बात है कि उन्होंने मन की बात के लिए सुझाव मांगे थे, मानो वे सचमुच जनता के मन की बात करना चाहते हैं। लेकिन अगर ऐसा होता तो इस वक्त जनता अपने रोजगार, कारोबार को लेकर चिंतित है। विद्यार्थी परीक्षाओं को लेकर चिंतित हैं कि कैसे परीक्षा हॉल जाएं और फिर भी खुद को बीमार होने से बचा लें। लेकिन मोदीजी ने उन चिंताओं की जगह खेल-खिलौनों की बात की। मान लिया कि किशोरों-युवाओं से अधिक उन्होंने छोटे बच्चों के मन के बारे में सोचा। खिलौनों से खेलना उनका स्वभाव भी है और अधिकार भी। लेकिन क्या मोदीजी ने इस बात पर गौर फरमाया है कि लॉकडाउन की वजह से कितने बच्चों का बचपन समय से पहले खत्म हो गया।

कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन की ओर से ”ए स्टडी ऑन इम्पैक्ट ऑफ लॉकडाउन एंड इकोनॉमिक डिस्रप्शन ऑन लो-इनकम हाउसहोल्डस् विद स्पेशल रेफरेंस टू चिल्ड्रेन” शीर्षक की एक रिपोर्ट कुछ समय पहले आई थी, जिसमें बताया गया था कि कोरोना महामारी से उपजे आर्थिक संकट की वजह से 21 फीसदी परिवार आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों से मजदूरी कराने पर मजबूर हैं। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए आसपास के गांवों में निगरानी तंत्र को और विकसित करना जरूरी है। रिपोर्ट में लॉकडाउन के बाद बच्चों की तस्करी के मामले बढ़ने का भी अंदेशा जताया गया है।

मोदीजी ने बच्चों के भविष्य से जुड़ी इन असल चिंताओं पर बात करना जरूरी क्यों नहीं समझा।  राष्ट्र की विरासत, परंपरा, युवा आबादी ऐसे बड़े-बड़े शब्दों के जाल में देश को फिर उलझाने की जगह अगर मोदीजी असल चिंताओं और उनके समाधान पर बात करते, तो मन की बात करना सार्थक हो जाता। मगर मोदीजी एक बार फिर इसमें चूक गए।

(देशबंधु)

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