लॉकडाऊन की तरह कुछ हफ्ते सफाईकर्मियों बिना रहने की कल्पना कर देखें..

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-सुनील कुमार।।
रोज सुबह से कचरा ले जाने के लिए गाड़ी आती है, और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की तरह देश के और भी बहुत से शहरों में कचरा बाहर लाने के लिए गाना बजाती होगी। सामाजिक सरोकार रखने वाले कुछ जिम्मेदार लोगों ने ऐसे कार्टून बनाए और अपने बच्चों को समझाते भी हैं कि वे कचरे वाले नहीं हैं, वे सफाई वाले हैं, कचरे वाले तो लोग हैं जिनके घरों में इतना कचरा पैदा होता है कि जिसे ले जाने के लिए गाडिय़ों को दिन में कई फेरे लगाने पड़ते हैं।

अभी जब पिछले कुछ महीनों में लोगों के घरों में काम करने वाले कम रहे या नहीं रहे, तो उन्हें कचरे की बाल्टियां ले जाकर बाहर रखनी पड़ीं, और खाली बाल्टियां वापिस लानी पड़ीं। इतने में ही लोगों के होश उड़ गए कि इन बाल्टियों से कैसी बदबू आती है, और इनमें कहीं चीटियां भर जाती हैं, तो कहीं दूसरे कीड़े। अब उन लोगों की कल्पना करें जो दिन में कम से कम आठ घंटे ऐसी ही बाल्टियों को उठा-उठाकर कचरे की गाडिय़ों में पलटते हैं, अपने सिर से ऊपर तक उठाते हैं, और बाल्टियां वापिस गेट पर छोडक़र जाते हैं। बारिश के दिनों में इन बाल्टियों में पानी भर जाता है, और जब कचरा-गाड़ीवाले इन्हें पलटते हैं तो उनके ऊपर यह पानी गिरते भी रहता है।

यह तो फिर भी ठीक है, लेकिन शहरों में गटर सफाई करने वाले लोगों को जिस तरह गटर में उतरना पड़ता है, और कीचड़ के पानी में डुबकी लगाकर फंसे हुए कचरे को निकालना पड़ता है, उस जिंदगी की कल्पना करना भी उस तबके के बाहर के लोगों के लिए नामुमकिन है। और यह तबका हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म के भीतर सबसे ही हिकारत और नफरत के लायक माना गया दलित तबका है, दलितों में भी और नीचे के दलित जिन्हें कि सफाई के अलावा और किसी काम के लायक माना नहीं गया है।

अब पल भर के लिए कल्पना करें कि हिकारत के लायक समझी जाने वाली, अछूत मानी जाने वाली यह जाति खत्म हो जाए। लोगों के घरों का कचरा तो खत्म नहीं होगा, लोगों के मुहल्लों और शहरों की नालियां, उनके गटर तो खत्म नहीं होंगे, फिर क्या होगा? अगर तमाम दलित यह तय कर लें कि सफाई के जिस काम की वजह से उन्हें अछूत माना जाता है वह काम करना ही नहीं है, तो सफाईकर्मियों की ऐसी जातियां तो मेहनत का कोई दूसरा काम एक बार कर भी लेंगी, शर्तियां ही कर लेंगी, लेकिन लोग अपने कचरे और अपनी फंसी हुई नालियों का क्या करेंगे? उनका काम तो कचरा पैदा करने वाले लोगों, उनसे ऊंची जातियों के लोगों के बिना एक बार चल जाएगा, वे तो मनरेगा जैसी किसी सरकारी योजना में मिट्टी भी खोद लेंगे जो कि कचरा और गटर के मुकाबले बेहतर काम होगा, लेकिन बाकी हिन्दुस्तानी क्या करेंगे? वे अपना कचरा लेकर कहां जाएंगे? और घरों में, इमारतों में पखाने की टंकियां भर जाएंगी, तो क्या होगा? अलग-अलग इलाकों में गटर का पानी सडक़ों पर फैल जाएगा तो क्या होगा?

ऐसी नौबत के बारे में कुछ देर सोचना चाहिए, फिर गटर में काम करने वाले लोगों के हाल पर भी सोचना चाहिए, और फिर यह सोचना चाहिए कि उन्हें खुद यह काम करना पड़ा तो वे क्या कर पाएंगे? यह पूरा सिलसिला अब उन दिनों का नहीं रह गया है जब गंदगी साफ करने वाले लोगों के बिना भी ऊंची मानी जाने वाली जातियों के लोग पखाने के लिए गांव के बाहर खेत चले जाते थे, और नालियां खुली रहती थीं, गटर रहते नहीं थे, न पखाने होते थे न उनकी टंकियां। उन दिनों वैसे में तो सफाईकर्मियों के बिना काम चल जाता था, लेकिन अब क्या होगा? क्या सफाईकर्मियों के ऐसे मजबूत संगठन बन सकते हैं जो कि अपनी खतरनाक नौबत के मुताबिक अधिक मेहनताना और अधिक मुआवजा मांग सकें? और फिर इस बात का मुआवजा भी मांग सकें कि समाज की गंदगी को ढोने की वजह से उन्हें जिस सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है, उसके लिए भी तो गंदगी पैदा करने वाला समाज कुछ दे।

लेकिन जाति व्यवस्था और समाज व्यवस्था से परे भी एक बात समझने की जरूरत है। आज शहरों में, और खासकर संपन्न लोगों में जिस बड़े पैमाने पर कचरा पैदा किया जा रहा है, क्या उससे निपटना हमेशा के लिए मुमकिन हो पाएगा? आज छोटे-छोटे से सामान भी ऑनलाईन ऑर्डर करके बुलाए जा रहे हैं, और वे भारी-भरकम पैकिंग के भीतर आ रहे हैं। क्या इतनी पैकिंग के निपटारे के लिए कोई शहरी ढांचा बना हुआ है, या इतनी पैकिंग बनाने के लिए भी धरती पर काफी पेड़ हैं? ये तमाम बातें सोचना इसलिए जरूरी है कि कुछ लोगों को यह भी लग रहा है कि ऑनलाईन खरीदी से लोगों का बाजार जाना कम हो रहा है, और ईंधन बच रहा है, उसका प्रदूषण बच रहा है। हमारे पास अभी कोई वैज्ञानिक आंकड़े इस बात के नहीं हैं कि ईंधन कितना बच रहा है, और पैकिंग कितनी अधिक लग रही है, और इनमें से कौन सी बात धरती के लिए अधिक नुकसानदेह है। लेकिन यह बात तय है कि आज दुनिया की सरकारों को कारोबार पर नकेल कसकर यह देखना होगा कि पैकिंग कितनी गैरजरूरी हो रही है, और उसे कैसे कम किया जाना चाहिए। यह राज्यों को भी अपने स्तर पर देखना चाहिए कि उनकी जमीन पर चाहे स्थानीय बाजार में पहुंचने वाले सामान, या फिर ऑनलाईन ऑर्डर से कूरियर के मार्फत आने वाले सामान की पैकिंग कितनी है? हमने कई बरस पहले भी इसी जगह यह बात सुझाई थी कि स्थानीय सरकारों को अपने प्रदेश में एक गार्बेज टैक्स लगाना चाहिए जिसमें आई हुई पैकिंग का पूरा वजन हो, और उसके भीतर इस्तेमाल होने वाले सामान का भी वजन हो। जितना भी प्लास्टिक, पु_ा, या किसी और किस्म का पैकिंग मटेरियल आ रहा है, उस पर एक टैक्स लगाना चाहिए। हर बक्से या पैकेट पर यह लिखने का नियम रहे कि उसके भीतर इस्तेमाल के सामान का वजन कितना है। बाकी तो पूरा का पूरा कचरा बनकर उस प्रदेश पर बोझ रहेगा, और उस पर एक टैक्स लगाना चाहिए। हो सकता है कि केन्द्र सरकार के स्तर पर ऑनलाईन कंपनियों से लेकर बाजार में जाने वाले थोक सामान तक पर ऐसा एक टैक्स लग सके जिससे लोगों को यह भी समझ में आए कि गैरजरूरी पैकिंग एक गलत बात है, और उसके लिए टैक्स या जुर्माना लग रहा है। आज छोटे-छोटे से सामानों को सजावटी और आकर्षक दिखाने के लिए उनकी ढेर-ढेर पैकिंग की जाती है।

इस बात को लिखने का सीधा रिश्ता इस बात से है जिससे कि आज हमने यहां लिखना शुरू किया है। यह सारी गैरजरूरी पैकिंग कचरा भी बढ़ा रही है, और नालियों को चोक भी कर रही है, इन दोनों के चलते इस देश से कभी भी सफाई कर्मचारी कम नहीं होने वाले हैं, और जब तक उनका यह काम जारी रहेगा, तब तक यह जाति व्यवस्था भी कायम रहेगी। इसलिए कचरे को कम करने की जितनी जरूरत है, उतनी ही जरूरत कचरे के व्यवस्थित निपटारे की भी है ताकि वह धरती पर कम बोझ बने, और उसे उसका निपटारा करने वाले लोगों को वह इंसानों की तरह माने भी। धरती को बचाने, इंसानों को बचाने, और शहरी जिंदगी को बचाने के लिए इन तमाम बातों पर सोचने की जरूरत है। घर या दफ्तर, दुकान से ही, बाजार से ही कचरे को अलग-अलग करना शुरू हो, स्थानीय म्युनिसिपल अलग-अलग कचरे को अलग-अलग उठाए, उसका अलग-अलग निपटारा हो, और ऐसे में ही यह निपटारा करने वाले इंसान इंसान की तरह जी सकेंगे। आज पिछले पांच-छह महीनों में लॉकडाऊन से और कोरोना-सावधानी से लोगों को जैसी जिंदगी जीनी पड़ी है, वे यह सोचकर देखें कि छह हफ्ते भी अगर सफाई कर्मचारियों के बिना जीना पड़ा तो क्या होगा?

आज अपनी सेहत के लिए खतरा उठाकर, अमानवीय परिस्थितियों में गंदगी का काम करते हुए, सामाजिक बहिष्कार और छुआछूत झेलते हुए जो लोग इंसानी जिंदगी से गंदगी को कम कर रहे हैं, उनको इतना संगठित करने की जरूरत है कि वे अपने इस काम के लिए अतिरिक्त भुगतान पा सकें। वे तो दूसरी जातियों के लोगों का काम कर लेंगे, लेकिन उनके काम के लिए तो आरक्षण को कोसने वाली जातियों के पास भी कोई ऐसे लोग नहीं हैं जो सफाई में आरक्षण मांगें।

फिलहाल हर कोई अपने-अपने स्तर पर यह सोचे कि सुबह से उनके घर कचरा लेने आने वाले लोग भी इंसान हैं, और कैसे उन पर बोझ कम किया जा सकता है। हिन्दुस्तान में दक्षिण भारत में कई म्युनिसिपल ऐसी हैं जिन्होंने पिछले बरसों में बिना किसी खर्च के वैसी सफाई हासिल की है जैसी सफाई के लिए इंदौर जैसा शहर सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना खर्च कर रहा है। देश के बाकी शहरों को भी ऐसी म्युनिसिपलों से कुछ सीखना चाहिए।

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