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उच्छृंखलप्रदेश बना उत्तरप्रदेश..

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उत्तर प्रदेश अब अपराधियों के लिए उच्छृंखल प्रदेश बन चुका है। एक दिन भी नहीं बीतता जब मारपीट, लूटपाट, बलात्कार और हत्या की वारदात प्रदेश के किसी न किसी हिस्से में न घटती हों। उस पर इनमें से कई घटनाओं से जिस तरह राजनीति के सिरे जुड़ते हैं, वह और चिंता उपजाते हैं। क्योंकि राजनेताओं, बाहुबलियों और पुलिस प्रशासन के त्रिकोण में आम जनता बुरी तरह फंसी हुई है।

उन्नाव बलात्कार कांड या कानपुर का विकास दुबे कांड राजनीति और अपराध के घालमेल के कुछ नमूने हैं। प्रदेश की योगी सरकार ने हमेशा अपराधियों के लिए सख्ती बरतने की बात कही, लेकिन ये हकीकत है कि अपराधी पहले से कहीं अधिक उच्छृंखल हो चुके हैं। बढ़ते अपराधों को लेकर विपक्ष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर सवाल उठाते रहता है। लेकिन मुख्यमंत्री योगी के मुताबिक विपक्ष ही कानून व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है। उन्होंने शनिवार को विधानसभा में आंकड़े पेश करते हुए यह भी कहा कि राज्य में हालात पहले से कहीं ज्यादा बेहतर हैं।

मुख्यमंत्री ने सदन में 2016 से लेकर अब तक के तुलनात्मक आंकड़े पेश करते हुए कहा कि राज्य में अपराध का ग्राफ गिरा है। उन्होंने कहा कि विपक्ष कानून व्यवस्था की बात करता है लेकिन विपक्ष कानून व्यवस्था की स्थिति के लिए ज्यादा बड़ा खतरा है। पता नहीं उत्तरप्रदेश की कानून व्यवस्था कितनी लाचार है कि उसे विपक्ष से ही खतरा नजर आने लगा। ये सही है कि सपा और बसपा दोनों के शासनकाल में भी अपराधों और अपराधियों पर लगाम लगाना आसान नहीं था और हालात अब भी नहीं बदले हैं।

मंगलवार को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने प्रत्यक्षं किम प्रमाणम लिखते हुए एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने बताया कि रविवार को गोरखपुर, प्रयागराज, जौनपुर, चित्रकूट, उन्नाव, बरेली में हत्या की जघन्य वारदात हुईं, वहीं सोमवार को फिर उन्नाव, फतहपुर, सुल्तानपुर, बाराबंकी, बिजनौर में भी हत्या की घटनाएं घटीं, बागपत में नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप हुआ। इन दो दिनों की अपराध की सूची देखकर ही रूह कांप जाती है। लेकिन सरकार और पुलिस प्रशासन अब भी बचाव के तर्क  गढ़ने में लगे हैं। उनकी मुस्तैदी पर बलिया में पत्रकार की हत्या ने भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक निजी चैनल के पत्रकार रतन सिंह अपने घर पैदल लौट रहे थे, तभी उन पर गोलियां चलाई गईं, जिससे उनकी घटनास्थल पर ही मौत हो गई है। पुलिस इस मामले को निजी विवाद बता रही है, लेकिन असल वजह क्या है, यह विस्तृत जांच के बाद ही पता चलेगा। 

रतन सिंह की हत्या के बाद ग्रामीणों के रोष को देखते हुए पुलिस ने आरोपियों की धरपकड़ शुरु की और तीन लोगों को हिरासत में लिया है। वहीं सरकार ने मुआवजे की घोषणा भी की है। लेकिन अब इस मामले ने राजनैतिक रूप भी ले लिया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने रतन सिंह के परिजनों से मिलने जाने का ऐलानिया ट्वीट किया तो उन्हें पुलिस ने रोका, जिसके बाद उन्होंने गाड़ी छोड़ पैदल ही जाने का फैसला लिया। योगी सरकार में इससे पहले भी विपक्ष के नेताओं को इस तरह घटनास्थल या पीड़ित के परिजनों से मिलने से रोका गया है। यह रवैया प्रशासन की कमजोरी को ही दर्शाता है।

अगर सरकार को कानून व्यवस्था की मजबूती का इतना ही यकीन है तो विपक्षी नेताओं को किस प्रयोजन से रोका जाता है। बहरहाल, यह पहली बार नहीं है कि प्रदेश में किसी पत्रकार की हत्या हुई हो। अभी पिछले महीने ही गाजियाबाद में पत्रकार विक्रम जोशी को अपनी भांजी से छेड़खानी से रोकने पर मार दिया गया। जून में उन्नाव में पत्रकार शुभममणि त्रिपाठी की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। पिछले साल शाहजहांपुर में पत्रकार राजेश तोमर और उनके भाई को अवैध वसूली का विरोध करने पर मारा गया था। पिछले साल ही कुशीनगर और सहारनपुर में भी पत्रकारों की हत्या हुई। इसके अलावा प्रशासन की ओर से पत्रकारों को प्रताड़ित करने की घटनाएं भी हुई हैं। मिड डे मील में गड़बड़ी और गरीबों, दलितों के हक में रिपोर्टिंग करने पर पत्रकारों को सरकार की सख्ती का सामना करना पड़ा। 

जनता की आवाज उठाने वाले पत्रकारों को इस तरह डराने या उनके साथ आपराधिक घटनाओं का घटना इस ओर ही इशारा करता है कि इन अपराधों के सूत्र कहीं न कहीं राजनीति से जुड़े हैं। रतन सिंह की हत्या के बाद पत्रकार बिरादरी में रोष देखने मिल रहा है। जो स्वाभाविक भी है। लेकिन अब क्या वक्त नहीं आ गया है कि पत्रकार तस्वीर के दूसरे पहलू को भी देखने की कोशिश करें। राजनेताओं से नजदीकी या उनसे उपकृत होकर किसी सरकार के प्रवक्ता की तरह काम करने से पत्रकार अपने मूल उद्देश्य से विचलित हो जाते हैं। जनता के हक के लिए आवाज उठाने की जगह जब वे सरकार के पक्षकार की तरह काम करते हैं तो अपने लिए विश्वसनीयता का संकट खड़ा कर लेते हैं जो अंतत: इसी तरह की घटनाओं में बदलती है।

सरकार और पुलिस प्रशासन को भी अब अपनी जिम्मेदारियों को और गंभीरता से लेना चाहिए। उनका काम जनता को सुरक्षित माहौल देना है, जिसके लिए निष्पक्ष और पारदर्शी होकर काम करने की जरूरत है। जनहित के मुद्दों से ध्यान भटकाकर भावनात्मक मुद्दों के बूते बहुत दूर तक नहीं चला जा सकता।

(देशबंधु)

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