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तब्लीगी जमात का सच ..

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मोदी सरकार ने कोरोना पर अपनी विफलता छुपाने के लिए तब्लीगी जमात को ‘बलि का बकरा’ बनाया और मीडिया ने इस पर प्रोपेगेंडा चलाया। बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात मामले में देश और विदेश के जमातियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए कुछ इसी अंदाज में फैसला सुनाया। इस फैसले ने आज के दौर में सत्ता और मीडिया की मिलीभगत की कड़वी हकीकत को उजागर किया है। यह बताया है कि कैसे अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने के मौके इस देश में ढूंढे जा रहे हैं।

देश ने देखा है कि कैसे जनवरी से कोरोना को लेकर सावधानी बरतने की सलाह मोदी सरकार को दी जा रही थी। लेकिन तब वह शाहीन बाग और देश के अन्य स्थानों में चल रहे सीएए विरोधी आंदोलन को दबाने में लगी थी। फरवरी के मध्य में राहुल गांधी ने स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों ही मामलों में सरकार को एहतियाती कदम बरतने की अपील की थी। यह चेतावनी दे दी थी कि आने वाले समय में गंभीर स्थिति बन सकती है। सरकार ने तब भी उनकी सलाह की उपेक्षा की। उस वक्त मोदीजी ट्रंप की मेजबानी में व्यस्त थे। मार्च आते-आते देश में कोरोना के मामले बढ़ने लगे और तब मोदीजी ने जनता कर्फ्यू का ऐलान किया। तालियां और थालियां बजाने का आग्रह भी किया।

लोगों ने बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा लिया। उसके बाद सारे देश को बच्चों के खेल की तरह स्टैच्यू कर दिया और सब कुछ थम गया। केवल राजनीति जारी रही, साथ ही बढ़ती रही कोरोना फैलने की रफ्तार। सरकार के ढीले-ढाले तौर-तरीकों ने पूरे देश को खतरे में डाल दिया। लेकिन सरकार ने खुद को बचाने के लिए तब्लीगी जमात पर कोरोना फैलाने का ठीकरा फोड़ दिया। याद कीजिए मार्च के आखिरी सप्ताह का वो दौर, जब देश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़े  और इस बीच खबर आई कि दिल्ली के निजामुद्दीन में तब्लीगी जमात के एक आयोजन में देश-विदेश से आए मुसलमान इक_ा हुए। निजामुद्दीन मरकज में कुछ लोग कोरोना पॉजीटिव पाए गए। इसके बाद तो सरकार और मीडिया दोनों ने कोरोना का जैसा सांप्रदायिकरण किया, वो अपने आप में अभूतपूर्व घटना है। दुनिया में शायद ही कहीं इस तरह किसी महामारी पर धार्मिक जहर चढ़ाया गया हो। 

सरकार ने एक बार यह खबर प्रसारित करवा दी कि तब्लीगी जमात के लोगों के कारण ही देश में कोरोना के मामलों में उछाल आया है। इसके बाद देश के कई हिस्सों में तब्लीगी जमात के लोगों की धर-पकड़ शुरु हो गई। उस वक्त रोजाना हेडलाइन्स इसी तरह की होती थीं कि आज जमात के इतने सदस्य पॉजीटिव निकले, और उनके संपर्क में आए इतने लोग भी बीमार हो गए। इसके बाद सांप्रदायिकता का खून चख चुके इलेक्ट्रानिक मीडिया ने इस मुद्दे को आदमखोर शेर की तरह लपक लिया। कई दिनों से किसी मुद्दे पर हिंदू-मुस्लिम डिबेट न कर पाने की उसकी निराशा जोश में बदल गई। हर रोज चैनलों पर तब्लीगी जमात का कोरोना कनेक्शन और उसका धार्मिक एंगल तय किया जाने लगा।

प्रिंट मीडिया भी इसमें पीछे नहीं रहा। क्वारंटीन सेंटर में किस तरह तब्लीगी जमात के लोग कहीं मांसाहारी खाना मांग रहे हैं, कहीं खुले में शौच कर रहे हैं, ऐसी झूठी खबरें छपने लगीं। और सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी भी अपने आकाओं का हुक्म बजाने में कहीं पीछे नहीं रही। फेक न्यूज की भरमार सोशल मीडिया पर हो गई। फैक्ट चेक करने वाली एक वेबसाइट ‘फैक्टली’ के संस्थापक राकेश डुब्बुडू ने तब बताया था कि- मार्च महीने के मध्य से देश में सोशल मीडिया में कोविड-19 के बारे में तूफान की तरह फेक न्यूज में बढ़ोतरी हुई है। डुब्बुडू ने कहा था कि अभी हाल तक कोविड-19 से संबंधित अधिकांश फर्जी खबरों का स्वर धार्मिक नहीं था। लेकिन 30 मार्च से सोशल मीडिया पर इस्लामोफोबिक फर्जी खबरों में अचानक से तूफान की तरह वृद्धि हुई है मानो कोई पहले से ही तैयारी कर के बैठा हो। जब से निजामुद्दीन की घटना पब्लिक डोमेन में आई तबसे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने वाली फर्जी खबरों की बाढ़ आ गई है।

एक महामारी के सांप्रदायिकरण का नतीजा ये हुआ कि देश भर में पहले से डरे-सहमे अल्पसंख्यक वर्ग के लिए जीवन और दुश्वार हो गया। कहीं उनका सामाजिक बहिष्कार हुआ, कहीं आर्थिक बहिष्कार। उनके रोजगार पर चोट करने की आपराधिक साजिश रची गई। उन्हें मानसिक और शारीरिक तौर पर प्रताड़नाएं दी गईं। सरकार की नाक के नीचे ये सब होता रहा और सरकार भी कोरोना का प्रसार रोकने में अपनी गलती देखने की जगह तब्लीगी जमात का तमाशा बनते देखती रही। लेकिन अब बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात मामले में देश और विदेश के जमातियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर  को रद्द कर दिया है।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में तब्लीगी जमात को ‘बलि का बकरा’ बनाया गया। कोर्ट ने साथ ही मीडिया को फटकार लगाते हुए कहा कि इन लोगों को ही संक्रमण का जिम्मेदार बताने का प्रोपेगेंडा चलाया गया। ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई, जिसमें भारत में फैले संक्रमण का जिम्मेदार इन विदेशी लोगों को ही बनाने की कोशिश की गई। घाना, तंजानिया, बेनिन और इंडोनेशिया जैसे देशों के आरोपी नागरिकों द्वारा दायर तीन अलग-अलग याचिकाओं की सुनवाई कर रही पीठ ने कहा कि तब्लीगी जमात के खिलाफ दुष्प्रचार अवांछित था। जमात 50 साल से गतिविधि चला रही है।

भारत में कोविड-19 के संक्रमण के हालात और ताजा आंकड़े बताते हैं कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी। बहरहाल, बॉम्बे हाईकोर्ट की इस टिप्पणी ने समाज को मौजूदा सरकार और आज के मीडिया का असली चेहरा दिखा दिया है। यह बता दिया है कि कैसे अपने फायदे के लिए सत्ता ने मीडिया के जरिए देश को गुमराह करने की कोशिश की और कैसे मीडिया ने जनजागरण के अपने कर्तव्य को किनारे कर सत्ता के इशारों पर नाचना कबूल कर लिया। चिल्ला-चिल्ला कर देश से जवाब मांगने वाले एंकरों का मानसिक दिवालियापन इस टिप्पणी ने उजागर कर दिया है। कम से कम अब समाज को यह समझ जाना चाहिए कि देश के नंबर वन चैनल होने का दावा करने वाले न्यूज चैनलों में दिखाई जाने वाली हर तस्वीर सच नहीं होती, उनकी कही हर बात पत्थर की लकीर नहीं होती।

केवल चिल्लाने से कोई देशभक्तमोदी सरकार ने कोरोना पर अपनी विफलता छुपाने के लिए तब्लीगी जमात को ‘बलि का बकरा’ बनाया और मीडिया ने इस पर प्रोपेगेंडा चलाया। बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात मामले में देश और विदेश के जमातियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए कुछ इसी अंदाज में फैसला सुनाया। इस फैसले ने आज के दौर में सत्ता और मीडिया की मिलीभगत की कड़वी हकीकत को उजागर किया है। यह बताया है कि कैसे अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने के मौके इस देश में ढूंढे जा रहे हैं। देश ने देखा है कि कैसे जनवरी से कोरोना को लेकर सावधानी बरतने की सलाह मोदी सरकार को दी जा रही थी।

लेकिन तब वह शाहीन बाग और देश के अन्य स्थानों में चल रहे सीएए विरोधी आंदोलन को दबाने में लगी थी। फरवरी के मध्य में राहुल गांधी ने स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों ही मामलों में सरकार को एहतियाती कदम बरतने की अपील की थी। यह चेतावनी दे दी थी कि आने वाले समय में गंभीर स्थिति बन सकती है। सरकार ने तब भी उनकी सलाह की उपेक्षा की। उस वक्त मोदीजी ट्रंप की मेजबानी में व्यस्त थे। मार्च आते-आते देश में कोरोना के मामले बढ़ने लगे और तब मोदीजी ने जनता कर्फ्यू का ऐलान किया। तालियां और थालियां बजाने का आग्रह भी किया।

लोगों ने बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा लिया। उसके बाद सारे देश को बच्चों के खेल की तरह स्टैच्यू कर दिया और सब कुछ थम गया। केवल राजनीति जारी रही, साथ ही बढ़ती रही कोरोना फैलने की रफ्तार। सरकार के ढीले-ढाले तौर-तरीकों ने पूरे देश को खतरे में डाल दिया। लेकिन सरकार ने खुद को बचाने के लिए तब्लीगी जमात पर कोरोना फैलाने का ठीकरा फोड़ दिया। याद कीजिए मार्च के आखिरी सप्ताह का वो दौर, जब देश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़े  और इस बीच खबर आई कि दिल्ली के निजामुद्दीन में तब्लीगी जमात के एक आयोजन में देश-विदेश से आए मुसलमान हुए। निजामुद्दीन मरकज में कुछ लोग कोरोना पॉजीटिव पाए गए। इसके बाद तो सरकार और मीडिया दोनों ने कोरोना का जैसा सांप्रदायिकरण किया, वो अपने आप में अभूतपूर्व घटना है। दुनिया में शायद ही कहीं इस तरह किसी महामारी पर धार्मिक जहर चढ़ाया गया हो। 

सरकार ने एक बार यह खबर प्रसारित करवा दी कि तब्लीगी जमात के लोगों के कारण ही देश में कोरोना के मामलों में उछाल आया है। इसके बाद देश के कई हिस्सों में तब्लीगी जमात के लोगों की धर-पकड़ शुरु हो गई। उस वक्त रोजाना हेडलाइन्स इसी तरह की होती थीं कि आज जमात के इतने सदस्य पॉजीटिव निकले, और उनके संपर्क में आए इतने लोग भी बीमार हो गए।

इसके बाद सांप्रदायिकता का खून चख चुके इलेक्ट्रानिक मीडिया ने इस मुद्दे को आदमखोर शेर की तरह लपक लिया। कई दिनों से किसी मुद्दे पर हिंदू-मुस्लिम डिबेट न कर पाने की उसकी निराशा जोश में बदल गई। हर रोज चैनलों पर तब्लीगी जमात का कोरोना कनेक्शन और उसका धार्मिक एंगल तय किया जाने लगा। प्रिंट मीडिया भी इसमें पीछे नहीं रहा। क्वारंटीन सेंटर में किस तरह तब्लीगी जमात के लोग कहीं मांसाहारी खाना मांग रहे हैं, कहीं खुले में शौच कर रहे हैं, ऐसी झूठी खबरें छपने लगीं। और सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी भी अपने आकाओं का हुक्म बजाने में कहीं पीछे नहीं रही।

फेक न्यूज की भरमार सोशल मीडिया पर हो गई। फैक्ट चेक करने वाली एक वेबसाइट ‘फैक्टली’ के संस्थापक राकेश डुब्बुडू ने तब बताया था कि- मार्च महीने के मध्य से देश में सोशल मीडिया में कोविड-19 के बारे में तूफान की तरह फेक न्यूज में बढ़ोतरी हुई है। डुब्बुडू ने कहा था कि अभी हाल तक कोविड-19 से संबंधित अधिकांश फर्जी खबरों का स्वर धार्मिक नहीं था। लेकिन 30 मार्च से सोशल मीडिया पर इस्लामोफोबिक फर्जी खबरों में अचानक से तूफान की तरह वृद्धि हुई है मानो कोई पहले से ही तैयारी कर के बैठा हो। जब से निजामुद्दीन की घटना पब्लिक डोमेन में आई तबसे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने वाली फर्जी खबरों की बाढ़ आ गई है।

एक महामारी के सांप्रदायिकरण का नतीजा ये हुआ कि देश भर में पहले से डरे-सहमे अल्पसंख्यक वर्ग के लिए जीवन और दुश्वार हो गया। कहीं उनका सामाजिक बहिष्कार हुआ, कहीं आर्थिक बहिष्कार। उनके रोजगार पर चोट करने की आपराधिक साजिश रची गई। उन्हें मानसिक और शारीरिक तौर पर प्रताड़नाएं दी गईं। सरकार की नाक के नीचे ये सब होता रहा और सरकार भी कोरोना का प्रसार रोकने में अपनी गलती देखने की जगह तब्लीगी जमात का तमाशा बनते देखती रही। लेकिन अब बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात मामले में देश और विदेश के जमातियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर  को रद्द कर दिया है।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में तब्लीगी जमात को ‘बलि का बकरा’ बनाया गया। कोर्ट ने साथ ही मीडिया को फटकार लगाते हुए कहा कि इन लोगों को ही संक्रमण का जिम्मेदार बताने का प्रोपेगेंडा चलाया गया। ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई, जिसमें भारत में फैले संक्रमण का जिम्मेदार इन विदेशी लोगों को ही बनाने की कोशिश की गई। घाना, तंजानिया, बेनिन और इंडोनेशिया जैसे देशों के आरोपी नागरिकों द्वारा दायर तीन अलग-अलग याचिकाओं की सुनवाई कर रही पीठ ने कहा कि तब्लीगी जमात के खिलाफ दुष्प्रचार अवांछित था। जमात 50 साल से गतिविधि चला रही है।

भारत में कोविड-19 के संक्रमण के हालात और ताजा आंकड़े बताते हैं कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी। बहरहाल, बॉम्बे हाईकोर्ट की इस टिप्पणी ने समाज को मौजूदा सरकार और आज के मीडिया का असली चेहरा दिखा दिया है। यह बता दिया है कि कैसे अपने फायदे के लिए सत्ता ने मीडिया के जरिए देश को गुमराह करने की कोशिश की और कैसे मीडिया ने जनजागरण के अपने कर्तव्य को किनारे कर सत्ता के इशारों पर नाचना कबूल कर लिया।

चिल्ला-चिल्ला कर देश से जवाब मांगने वाले एंकरों का मानसिक दिवालियापन इस टिप्पणी ने उजागर कर दिया है। कम से कम अब समाज को यह समझ जाना चाहिए कि देश के नंबर वन चैनल होने का दावा करने वाले न्यूज चैनलों में दिखाई जाने वाली हर तस्वीर सच नहीं होती, उनकी कही हर बात पत्थर की लकीर नहीं होती। केवल चिल्लाने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता और केवल सवाल पूछने से कोई देशद्रोही नहीं हो जाता। नहीं हो जाता और केवल सवाल पूछने से कोई देशद्रोही नहीं हो जाता।

(देशबंधु)

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