‘शाकिर उर्फ़…’: दोयम दर्जे का दंश और पहचान छिपाने का संकट..

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-कामेश्वर।।

दलित लेखकों की मान्यता है कि उनकी पीड़ा और संघर्ष का सही चित्रण कोई सवर्ण लेखक नहीं कर सकता। उन्हें तो प्रेमचंद का भी दलित-चित्रण वास्तविकता से दूर लगता है। हालांकि महत्व, दूर से ही सही, दमदार वक़ालत की है, जो प्रेमचंद ने बखूबी की है। फिर भी, दलित-चेतना के असंतोष को पूरे तौर पर ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता। प्रत्यक्ष अनुभव से उपजा साहित्य अपने कथ्य की प्रामाणिकता के कारण प्रासंगिक और प्रभावोत्पादक बन पड़ता है। ऐसा साहित्य अपने समय का दस्तावेज बन जाता है।


कुछ ऐसी ही महसूसियत अनवर सुहैल के कहानी-संग्रह ‘शाकिर उर्फ…’ की कहानियों को पढ़ते समय होती है। इन कहानियों में वर्तमान का भोगा जा रहा यथार्थ है जिसे हिंदी के कथाकार या तो महसूस नहीं कर रहे हैं, या फिर इसे छूने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। बँटवारे के समय के सांप्रदायिक माहौल को उस समय के लेखकों ने अपनी रचनाओं में जीवंत किया है। उस दौरान हुए दंगों में हिंदू-मुस्लिम दोनों लगभग बराबरी पर हैं। बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक का नज़रिया दंगों के स्थानीय रूपों तक सीमित है। यह नज़रिया पूरे देश की सोच पर हावी नहीं हो पाता। देश में धर्म-निरपेक्ष और उदारवादी विचारधारा का ही बोल-बाला रहता है। उसी में से शांति और सौहार्द के नायक भी जब-तब उभर आते हैं। बाद के दिनों में हिंदू-मुस्लिम समुदायों के आपसी संबंधों पर कहानियाँ बहुत कम आईं। जो आईं भी वे पुराने संबंधों का इंप्रेशन लिए हुए। आज तो इस पर लिखना भी एक तरह से बंद हो गया है।
बहुत दिनों बाद पिछली होली के अवसर पर पंकज सुबीर की एक कहानी एक अख़बार के साहित्यिक पन्ने पर पढ़ने को मिली थी। कहानी अपने कहन और भाषा की चुस्ती के कारण बाँध लेती है। बचपन की यादें सांप्रदायिक सौहार्द को तृप्त करती हैं। पर वर्तमान का यथार्थ उसमें अँट नहीं पाता। उसमें अतीत की खुशग़वार यादें तो हैं, पर वर्तमान का सच नहीं। हिंदू-मुस्लिम संबंध आज वैसा नहीं रह गया है जैसा उस कहानी के समय में है। पिछले तीन दशकों में बहुसंख्यकवाद का जो विकास हुआ है उससे बुद्धिजीवी भी आक्रांत हैं। आज की कहानी उसे बहुत कम पकड़ पा रही है। ऐसे में दलित लेखकों की तरह यह सोचा जाए कि बहुसंख्यकवाद से उपजे भय, आशंका, अनिश्चितता और दोयम दर्जे की अनुभूति को कोई मुस्लिम लेखक ही प्रामाणिक ढंग से प्रकट कर सकता है तो इसमें ज़्यादा आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
ऐसे प्रत्यक्ष अनुभूतिपरक लेखन में ख़तरा यह है कि मुख्यधारा के लेखक इसे एकपक्षीय, शिकायती और कट्टरपंथियों के प्रति सहानुभूतिशील मान सकते हैं। बहुसंख्यक वर्ग के बुद्धिजीवियों को एक शिकायत यह भी रही है वे अपने समुदाय के कट्टरपंथियों के विरोध में जितने मुखर होते हैं, मुस्लिम बुद्धिजीवी उस अनुपात में नहीं होते। लेकिन जो मुखर हैं उनके लेखन पर ध्यान न देना भी एक तरह का पूर्वाग्रह है जो शायद, खुद को महसूस नहीं होता।
अनवर सुहैल की इन कहानियों में भय और संशयग्रस्त अल्पसंख्यक समाज की त्रासदी के साथ ही उसकी ख़ामियों को भी अनदेखा नहीं किया गया है। पर कहानियों का मूल कथ्य वर्तमान बहुसंख्यक सांप्रदायिक माहौल में अपने जीवन और रोजगार को लेकर मुसलमानों में समाया डर और बेचैनी ही है। वे इतना डरे हुए हैं कि वे अपना नाम और पहचान भी छिपाते फिर रहे हैं। ऐसी घटनाएँ हमने कोरोना-काल में ही देखी-सुनी। अनवर सुहैल ने इस संकट को पहले ही भाँप लिया था। यह उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति का ही परिणाम है।
संग्रह की पहली और शीर्षक कहानी ‘शाकिर उर्फ…’ और नवें क्रम की कहानी ‘मोहन’ के मुस्लिम किरदार असुरक्षा बोध के कारण हिंदू नाम रखने को मज़बूर हैं। शाकिर उर्फ़…राजू एक हुनरमंद मुसलमान है जो ठेकेदारी में वेल्डर का काम करता है। वह अपने ठेकेदार का काम करने बिहार से बीकानेर जा रहा होता है। कथाकार को वह ट्रेन में मिलता है। शुरूआती झिझक के बाद दोनों खैनी खाते और बातें करते काफी घुल-मिल जाते हैं। उसके हुलिए और हाव-भाव से कथाकार उसे हिंदू समझता है। अपना परिचय वह ‘राजू’ नाम से ही देता है, “साब, मैं एक वेल्डर हूँ। मेरे ठेकेदार का काम बिहार और बंगाल में चलता है। बड़ी गाड़ियों और मशीनों की टूट-फूट पर ठेकेदार बोलता है कि राजू, तेरे सिवा कोई पक्का काम नहीं कर पाएगा।”
उसके मुसलमान होने का राज़ आख़िर में तब जाकर खुलता है जब उसे फोन कॉल आता है और वह फोन पर ‘वालेकुम सलाम अम्मी!” कहता है। घरेलू बात-चीत से पता चलता है कि वह मुसलमान है। कथाकार उसकी तरफ हाथ बढ़ाकर कहता है, “अस्सलाम वालेकुम भाई!…मेरा नाम सुल्तान अहमद है।” तब राजू भी ज़वाब देता है, “अरे वाह…मेरा नाम शाकिर है, शाकिर अंसारी…अब तो पुकारू नाम ही मेरी पहचान बन गया है…” फिर फुसफुसाते हुए वह कहता है, “इस राजू नाम के कारण परदेस में कहीं कोई परेशानी नहीं उठानी पड़ती। काम का हुनर ही पहचान बन गया है साब…!”
पहचान को छुपाने के इस संकट को दोनों बखूबी समझते हैं और इसलिए वे आपस में क़रीबी महसूस करने लगते हैं। कथाकार जब अनूपपुर स्टेशन में उतरता है तो उसे उसके खाने की चिंता होती है। आगे किसी स्टेशन पर खाना मिलना मुश्किल था। वह पास के स्टाल में पूड़ी-सब्जी देखता है तो खरीदकर शाकिर उर्फ़ राजू को आकर देता है। वह उसे अहसानमंद होकर देखता है। पहचान छुपाने का संकट उनका साँझा दुख है जिसे वे अनकहे ही बाँटते हैं।
‘मोहन’ का मोहन भी दरअसल, इसरार है। वह कॉलोनी की झोपड़पट्टी में धोबी का काम करता है। सुलेमान के यहाँ भी कपड़े लाने-पहुँचाने जाता है। एक दिन सुलेमान की बीवी नज़मा मोहन को पैसे उधार देने की सिफारिश करती है तो वह मोहन के प्रति उसकी सहानुभूति को लेकर चुहल करता है, पर मन में वह भी मोहन से सहानुभूति रखता है। मोहन की बीवी जुबैदा ने नज़मा को बताया था कि मोहन के अब्बा ने झूठ बोलकर उसका निक़ाह उससे कराया था। कहा था कि लड़का मध्यप्रदेश में ड्राई क्लीनिंग का काम करता है।
एक दिन सुलेमान के पूछने पर मोहन बताता है, “…धोबी का काम शुरू किया तो काम कम मिलता था साब! लोगों ने मुसलमान जानकर काम देने से इंकार कर दिया था। तब हमारी दाढ़ी-मूँछ भी थी और टोपी भी खपकाए रहते थे। एक दिन दाढ़ी-मूँछ कटवाकर हम आम आदमी बन गए और जब कोई नाम पूछता तो मोहन बता देते। इस तरह हमें काम मिलने लगा और हम इसरार अंसारी से मोहन धोबी हो गए।”
मुसलमानों पर छा रहे पेशे के संकट को हम लोगों ने कोरोना-काल में देखा है। लोगों ने मुसलमान सब्जी-ठेले वालों से सामान लेना बंद कर दिया। मुहल्ले में दिखने पर उन्हें पीटने लगे। ठेलों पर पहचान के लिए भगवे झंडे लगाए जाने लगे।
सुलेमान उतने, यानी कट्टर मज़हबी नहीं हैं, पर इस्लाम और दूसरे धर्मों के बारे में उन्होंने खूब अध्ययन किया है। पाँचो वक़्त नमाज़ के पाबंद लियाक़त भाई से बहस के दौरान वे कहते हैं, “क्या हुज़ूर मुहम्मद साहब चाहते तो अल्लाह तआला के एक छोटे से हुक़्म से सारी दुनिया के इंसान इस्लाम धर्म में दाखिल नहीं हो जाते? लेकिन ऐसे में इस्लाम की खूबसूरती कहाँ रह पाती। यह तो अल्लाह तआला ने मुहम्मद साहब के हाथों इस्लाम सौंपा कि कुरआन के संदेश से दुनिया के लोग खुद-ब-खुद आकर्षित होंगे और ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस्लाम में दाख़िल होंगे।” और कि “लियाक़त भाई, काहे हुज्जत करते हैं।अल्लाह के रसूल चाहते तो अल्लाह पाक से दुआ माँग लेते और दुनिया के तमाम इंसानों को अल्लाह तआला मुसलमान बना देता। हद है लियाक़त भाई! क्या सारे मुसलमान एक हुए हैं…?”
फिर भी लियाक़त भाई कहते हैं, “आपको इसीलिए वहाबी कहता हूँ तो आप नाराज हो जाते हैं। अल्लाह पर भरोसा रखकर इस्लाम का पैगाम कोने-कोने तक फैलाना हमारी जिम्मेदारी है। हम इससे इंकार नहीं कर सकते हैं।”
तब सुलेमान साफ-साफ कहते हैं, “और यह भी हमारी जिम्मेदारी है कि देश-समाज से कटकर कुएँ के मेंढक बनकर अल्ला-अल्ला करते रहें मुसलमान। दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई और देखो हमारा मुसलमान समाज कितना पिछड़ा और दक़ियानूस है। अभी भी मुल्ला-मौलवियों के चंगुल से आजाद होना नहीं चाहता है।”
सुलेमान पाखंड से दूरी बनाए रखते हुए दीन को मानना पसंद करते हैं। छल-फ़रेब या धोखेबाजी की नौबत आने पर अक़्सर उनके मुँह से कुरान की यह आयत निकल जाती है, लकुम दीनकुम वलेया दीन… तुमको तुम्हारा दीन और उनको उनका दीन।
मियाँ-बीवी की पारिवारिक चुहल और सामान्य व्यवहार से मुस्लिम परिवार का रहन-सहन सोच-विचार स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है। सुलेमान गरमा-गरम चाय की चुस्की के साथ बीवी से चुहल भरे अंदाज़ में कहते हैं, “तुम्हें बड़ी हमदर्दी रहती है अपने मोहन भाई से…!”
“आप भी न, आखिर अपने ससुराल वालों से हमदर्दी भी न रखूँ तो कहेंगे मायके में कुछ एख़लास-मुहब्बत भी सीख कर नहीं आई। अरे हुज़ूर, रैयत हैं ये लोग। आपको अल्लाह ने हैसियत दी है तभी तो कोई हाथ पसारे दरवाजे पर आता है।”
नज़मा को मायके के पटंतर की चिंता है तो दुनियादारी की समझ और व्यावहारिकता भी। एक आम मुस्लिम परिवार के पारिवारिक व्यवहार की सुंदर झाँकी देखने को मिलती है।
‘होलोकास्ट’ कहानी में सलीम टीवी पर होलोकास्ट म्युज़ियम पर काव्यात्मक रिपोर्टिंग देखकर सिहर उठता है। उसे हिटलर की पदचाप सुनाई देती है। वह डिस्टर्व रहता है। क्लब से हौजी में जीतकर उमंग से लौटी बीवी सुरैया का मन उसे देखते ही बुझ जाता है। यह अवसाद सुरैया को भी उससे दूर कर देता है, ‘भाड़ में जाएँ। जैसा रहना चाहें रहें। उनकी अपनी ज़िंदगी है।’ सुरैया को सलीम का फेसबुक, व्हाट्सैप और न्यूज़ चैनलों में डूबा रहना पसंद नहीं है जिनमें आ रही सामग्री ही तनाव का कारण है।
सलीम एकाएक भड़क उठते हैं, “देखा, भीड़ ने चलती ट्रेन में रोजेदार मुसलमान लड़कों की पीट-पीटकर हत्या कर दी।”
सलीम का अवसाद अकारण नहीं है। बाहर भी दूसरे समुदायों के साथ व्यवहार में अंतर आया है। ‘मिसेज मुखर्जी ने आज ही सुरैया को सुनाते हुए कहा था, “लगता है पाकिस्तान के साथ वार होकर रहेगा।”
सलीम डरने लगा है, “मैं डरता हूँ सुरैया, कहीं दुनिया में मुसलमानों के लिए भी क्या कोई होलोकास्ट म्युज़ियम बनाया जाएगा?” मुसलमानों के प्रति दुनिया भर में नफ़रत को सलीम जानता है इसलिए उसे डर है। इस नफ़रत के बायस समुदाय के वे कट्टरपंथी हैं जिनसे सलीम इत्तेफ़ाक नहीं रखता, लेकिन उनके किए को मुसलमानों के प्रति नफ़रत के रूप में भोगता है। वह दिल्ली में रह रही बेटी को हिदायत देते हैं, “…अब ये हिज़ाब पहनना बंद कर दो। दिल्ली में रहती हो, समय ठीक नहीं है। हिज़ाब के कारण तुम पहचान में आ जाएगी। बिना हिज़ाब के साधारण हिंदुस्तानी लड़की दिखोगी।” सुनकर सुरैया के मन में भी डर समाने लगता है। मुस्लिम समुदाय जिस भय और संत्रास को जी रहा है वह ‘होलोकास्ट’ में साफ दिखाई देता है।
‘ट्यूब लाइट’ कहानी में मुस्लिम समुदाय के सिकुड़ते आर्थिक और राजनीतिक परिवेश और देश में अवांछित समझे जाने की चिंता है जो तीन दोस्तों- वसीम, अयूब और सरवर के बात-व्यवहार से प्रगट होता है। वसीम मोबाइल रिपेयरिंग शाप चलाता है और जागरुक इंसान है। वह सोशल मीडिया में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ़ चल रहे दुष्प्ररचार से अवगत होने के लिए शौर्यप्रताप सिंह के फेक आईडी से व्हाट्सैप ग्रुपों से जुड़ा हुआ है। अयूब प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठते थक चुका है और सरवर दसवीं फेल है। तीनों रहीम चा की चाय दूकान में अड्डा जमाते हैं। अयूब और सरवर वहीं अपने अब्बाओं के मटन-चिकन सेंटर में कभी-कभी हाथ बँटाते हैं। बात-चीत ‘ट्यूबलाइट’ फिल्म के पिटने के ज़िक्र से शुरू होती हुई इस्लाम, समाज और राजनीति पर मुस्लिम समुदाय के वर्तमान मनो-विचारों को सामने रखती है।
वसीम और अयूब दोनों बरेलवी अक़ीदे के खुले विचारों वाले सुन्नी मुसलमान हैं और सरवर तबलीगी। वसीम को व्यवस्था में उचित हिस्सेदारी न मिलने का दुख पहले से ही है। इस धर्मनिरपेक्ष देश की समस्त संस्थाओं के लोगो और सूक्तियों से लेकर दूरदर्शन पर प्रसारित धार्मिक धारावाहिकों तक बहुसंख्यक धर्म का ही बोल-बाला रहा है। अल्पसंख्यक समुदाय तुष्टिकरण की बदनामी का दंश झेलता वंचित ही रहता आया है। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि वसीम कह उठता है, “एक अदद वोट ही तो थे हम यार! अब उसके लायक भी नहीं समझते…”
वसीम मुसलमानों के धंधे-पानी में लग रही सेंध को लेकर चिंतित है। चिकवा, नॉन-वेज होटल, दर्जी, धोबी, मैकेनिक, कबाड़ी जैसे उनके छोटे-मोटे धंधे भी छिनते जा रहे हैं।
वसीम मुस्लिम समाज में पनप रही कट्टरता को भी नज़रअंदाज नहीं करता। मज़हबी सोच के सरवर को खूब झाड़ पिलाता रहता है। सरवर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार पर ठंडी साँस भरकर कहता है, “दीन दिलों से निकलता जा रहा है इसीलिए ऐसे आसार नज़र आ रहे हैं। हुज़ूर की एक सुन्नत छोड़ने पर कितना ख़ामियाजा भुगतना पड़ा था ईमान वालों को। आज हम मस्ज़िदों से दूर होते जा रहे हैं इसीलिए ख़ुदा का कहर हम पर टूट रहा है।”
वसीम उस पर बिगड़ उठता है, “इन तबलीगी जमात वालों को तो हर गलती पर अल्लाह का कहर ही दिखता है।” वह दोस्तों से कहता है, “जानते हो सालों, हम मुसलमानों के ख़िलाफ बड़ी मोर्चेबंदी हो रही है आजकल। पुरानी पीढ़ी से कोई शिकवा नहीं, लेकिन सोशल साइट उपयोग करने वाली नयी पीढ़ी मुस्लिम-विहिन इंडिया का सपना देखने लगी है।”
वसीम अपने दोस्तों से मुस्लिमों के प्रति हो रहे दुष्प्रचार का मुकाबला करने को प्रेरित करता है, पर तीनों के चेहरे पर अनिश्चितता का भाव स्थायी होता जाता है।
‘गोकशी’ कहानी में यह बताने की कोशिश की गई है कि बीफ प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत है और इस धंधे में मुसलमान ही नहीं हिंदू और ईसाई समुदाय भी जुड़े हुए हैं, लेकिन अब इसे सांप्रदायिक चश्मे से देखकर सिर्फ मुसलमानों को टारगेट किया जाता है। चार युवा सलमान कुरैशी, अंसार, अशोक विश्वकर्मा स्मार्ट फोन के लिए लालायित रहते हैं। इसमें मिलने वाली अश्लील सामग्री के लिए उनमें युवकोचित आकर्षण है। सलमान उर्फ सल्लू की सलाह पर वे गोकशी करके पैसे जुगाड़ने की योजना बनाते हैं। इस काम में दलित कालूराम को भी शामिल कर लेते हैं।
गोकशी की ख़बर मिलते ही शहर में सांप्रदायिक उबाल आ जाता है। मुसलमानों के प्रति नफरत भड़क उठता है। उन्हें सबक सिखाने का खुलेआम उद्घोष और भर्त्सना होनी लगती है। मुस्लिम समुदाय भी खुद को अलग-थलग पड़ने से बचाने के लिए मुुख्यधारा में आने वाले बयान जारी करने लग जाते हैं। इस घटना को कम्युनिस्ट साथी बाजारवाद से जोड़ कर देखते हैं।
जब चारो युवक पकड़े जाते हैं तब पता चलता है कि उनमें से दो तो हिंदू हैं। फिर मामला शांत पड़ने लगता है। कथाकार प्रश्न करता है, ‘तो क्या बाजार का बहाना लेकर हम अमानवीयता, क्रूरता, अनैतिकता जैसी बुराइयों का महिमामंडन करें? जो गलत है सो गलत होगा ही, किसी भी तर्क से उसे सही नहीं कहा जा सकता…’
‘डॉली’ मध्यम वर्गीय नाशुक्रे समाज की झलक दिखाती है। पढ़े-लिखे लोगों में भी सांप्रदायिकता किस तरह घर कर गई है और बहुसंख्यकों के बीच अकेले रह रहे मुस्लिम परिवार को किन अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है इसे हम देख पाते हैं।
वर्मा साहब और मिसेज वर्मा अपने डॉगी को पड़ोसी रहमान साहब की निगरानी में नौकर के हवाले छोड़कर छुट्टी पर चले जाते हैं। रहमान साहब को बीमार डॉली को लेकर बहुत परेशान होना पड़ता है। आख़िरकार वह मर ही जाती है। रहमान साहब स्वीपर को बुलाकर उसे कहीं फेंकवा देते हैं। वे वर्मा साहब को बताने के लिए फोन तो करते हैं, पर प्रवास में उनका मूड खराब न हो जाए सोचकर नहीं बताते।
मिसेज वर्मा वापस आती हैं तो बिफर पड़ती हैं, “…कौन होते हैं रहमान साहब! डॉली को फेंकवाने का डिसीजन क्यों लिया उन्होंने? क्यों नहीं बताया कि डॉली पर क्या गुज़र रही है…?” मिसेज़ सिन्हा उन्हें और भड़काती हैं। मिसेज़ रहमान को देखकर समूह की महिलाएँ अक्सर पाकिस्तान का ज़िक्र करती रहती हैं। मानों यह जताना चाहती हों की तुम्हारी सहानुभूति हिंदू विरोधियों और पाकिस्तान के साथ है।
दुखी होकर मिसेज रहमान काम पर गए रहमान साहब को फोन कर बताती हैं। वे मिसेज रहमान को सांत्वना देते हैं, “…तुम अब घर में ही रहो। फालतू टेंशन न लो। अगर मिसेज वर्मा ज़्यादा नाटक करे तो करने दो।” लेकिन मिसेज वर्मा के इस बर्ताव से उनके खुद के मन में उथल-पुथल मच जाती है। अहसान फ़रामोशी से ज़्यादा खलता है उन्हें समुदाय का सांप्रदायिक बर्ताव। अपने देशप्रेम पर शक किया जाना उन्हें भीतर ही भीतर सालता है। ख़ाम-ख़याली में वे अंडर ग्राउंड खदान में अपने कार्यस्थल से आगे निकल जाते हैं। उन्हें वापस लौटना पड़ता है। सांप्रदायिक व्यवहार व्यक्ति और परिवार को किस तरह विचलित किए रहता है यह बात गहरे तक महसूस होती है।
‘जीव-हत्या’ कहानी हिंदू-मुस्लिम समाजों में लड़के की चाहत में भ्रूण-हत्या और अहिंसा के प्रति उनके रुख को दर्शाती है। किस्सागो मुसलमान है और राकेश का लंगोटिया यार है। दोनों एक-दूसरे की फ़ितरत को अच्छी तरह जानते हैं। लोग उन्हें राम-रहीम की जोड़ी कहते हैं, पर वे एक-दूसरे के प्रति इतने सदय नहीं हैं। चुगलखोर किस्सागो को राकेश ‘नारद जी’ कहता है। राकेश की दो बेटियाँ हैं। उसके मां-बाप पोते की आस लगाए हुए हैं। बहू संगीता को कोसते भी रहते हैं। तीसरा भी कन्या-भ्रूण निकल जाता है। वे माँ-बाप को बताए बिना अबार्शन करा लेते हैं। कहानी हॉस्पीटल में ही शुरू होकर वहीं ख़त्म भी हो जाती है।
हॉस्पीटल में राकेश के मां-बाप के पास बैठा किस्सागो उसके प्रति उनकी शिकायतों पर नमक-मिर्च लगा रहा होता है। और इसी क्रम में वह पुरुषवादी सोच और हिंसा को लेकर हिंदू-मुस्लिम समुदायों की धारणाओं पर सोचता भी रहता है। राकेश के पिता प्रजापति अंकल पिछड़े वर्ग से आने के बावजूद सवर्णों से भी ज़्यादा हिंदू हैं। लोग उन्हें देखकर धार्मिक आचरण सीखते हैं। उन्हें पोते की ललक है, पर भ्रूण-हत्या को पाप समझते हैं। उन्हें शिकायत है कि इतना बड़ा कदम उठाने से पहले राकेश और संगीता ने उनसे पूछा तक नहीं। राकेश संगीता और बच्चों के लिए घर में अंडे वगैरह छिपाकर लाता है। पुरुषवादी विचार और हिंसा के प्रति राकेश का ऐसा ढुल-मुल रवैया किस्सागो को पसंद नहीं। शायद, इसीलिए वह उसे घामड़ कहता है।
राकेश-परिवार से नज़दीकी होने के बावजूद उससे किस्सागो का अलगाव का अहसास ख़त्म नहीं होता। राकेश के यहाँ उसके लिए अलग कप रखे गए हैं। किस्सागो से राकेश की पक्की दोस्ती के बावजूद वे आम मुसलमानों को औरंगज़ेब के वंशज, बर्बर, ज़ालिम, असहिष्णु, मूर्तिभंजक, विधर्मी, आतताई, म्लेच्छ समझते हैं। वे चाहते हैं कि मुसलमान या तो झुककर रहें या पाकिस्तान चले जाएँ।
बचपन में राकेश के घर वाले किस्सागो से पूछा करते, “जीव-हत्या करते दया नहीं आती तुमको?” मुस्लिम परिवेश से होने के कारण किस्सागो के लिए सामान्य-सी बात है। ‘बिस्मिल्लाहो-अल्लाहो अकबर’ कहकर मुर्गी को हलाल करने में उसे मज़ा आता। पर यह समझा पाना उसके लिए मुश्किल है कि खान-पान का मनुष्य की विवेकशीलता और नैतिकता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
अहिंसा के प्रति मान्यताएँ अपने जैविक परिवेश के अनुसार बनती हैं। तिब्बत में लामा मछली के बजाय याक का मांस खाने को कम अहिंसक बताते हैं। उनका मानना है कि एक याक की जान बहुत सारी मछलियों की जान बचा देती है। बंगाल के ब्राह्मण मछली को मांसाहार की श्रेणी में नहीं मानते। कुछ लोग अंडे को शाकाहारी मानते हैं। यानी, वे लोग हिंसा के अर्थ में जीव की संख्या को नहीं, उसकी समझ के विकास को महत्व देते हैं। सभी समुदाय अपनी सुविधाओं के अनुसार अहिंसा की समझ गढ़ लेते हैं। वरना शाकाहार भी मुश्किल हो जाए। जीव तो उसमें भी होता है।
‘नरगिस’ कहानी में मुलिम समुदाय की गरीबी, रूढ़िवादिता, कट्टरता, महिलाओं की स्थिति और उनके संघर्ष का बयान है। नरगिस टीन-पत्तर का काम करने वाले गरीब तबके की बेटी है जहाँ लोग अपने बच्चों के नाम बॉलीवुड कलाकारों से लेकर आतंकवादियों और साम्राज्यवादियों तक के नाम पर रखने में फ़ख़्र समझते हैं। नरगिस का शौहर रईस सिर्फ नाम का रईस है। एकदम कंजड़ और दारूबाज। एक एक्सीडेंट के कारण उसे अपना एक पाँव कटवाना पड़ जाता है। उसकी बिरयानी की दुकान बंद हो जाती है। घर चलाने के लिए उसकी इच्छा के विरुद्ध नरगिस कपड़ा दुकान में सेल्स गर्ल का काम करने लगती है। नकारा रईस हमेशा उसे शको-शुबहा की निगाह से देखता है। उसकी कमाई छीनकर दारू पीता है। उसके दूकान पर पहुँचकर बवाल करता है।
एक दिन वह दुकान पहुँचकर काने अगरवाल सेठ को नरगिस का हिसाब कर देने को कहता हुआ बवाल मचाए रहता है। उस दिन उसकी नंगई की पराकाष्ठा हो जाती है। नरगिस एकाएक बिफर पड़ती है और उसी की बैसाखी से उस पर तड़ा-तड़ प्रहार कर देती है। आँखों से चिंगारियाँ छोड़ते हुए रईश से कहती है, “तुम हमेशा मुझे तलाक के चाबूक से मारने की धमकी देते थे। आज तक मरद औरत को तलाक देता आया है और आज इतने लोगों के सामने मैं नरगिस पूरे हेशो-हवास से तुम्हें तलाक देती हूँ, तलाक, तलाक, तलाक!…”
‘जीव-हत्या’ में हिंदू समुदाय में स्त्री जाति की हीनता ज़ाहिर होती है। उसी तरह ‘नरगिस’ में मुस्लिम समुदाय के पुरुषवादी सोच का पता चलता है। नरगिस की दो बेटियाँ होने पर उसके ससुराल वालों को शिकायत है। वे उससे और बच्चे पैदा करने की अपेक्षा रखते हैं। पर नरगिस उन्हें बिना बताए ऑपरेशन करा लेती है। काम-काजी नरगिस एक साहसी महिला के रूप में उभरती है।
साहसी तो उसकी मां भी है। नरगिस का बाप पराई औरत के चक्कर में पड़कर उन्हें छोड़कर भाग जाता है। कुुछ साल बाद नरगिस की मां एक गैर-आदमी से नाता जोड़ लेती है। यह नाता गैर-शरई, यानी रीति-रिवाजों से हटकर है। पर यह साहस भी अंधविश्वास से मुक्त नहीं है। नरगिस की मां मानती है कि उसके बाप को उस औरत ने जादू-टोने के बल पर अपने वश में कर लिया था। नरगिस की मां ने क़ानूनी लड़ाई इसलिए नहीं लड़ी, क्योंकि नरगिस के बाप ने अपने चार बच्चों पर कोई हक़ नहीं जताया। दरअसल, निचले तबके के पास कोई ज़ायदाद-पूँजी का मामला भी तो नहीं रहता जिसके लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ी जाए। पर सामाजिक असुरक्षा का मुक़ाबला करने के लिए लोक-लाज को छोड़ना पड़ जाता है।
अम्मा के पास आने वाला गैर-आदमी बच्चों को भी प्रिय लगने लगता है। उसके आते रहने से उन्हें भी सुरक्षा मिलती है। मछली, मटन, अंडे खाने को मिलते हैं। वह बच्चों को बाप की हैसियत से देखता है। ‘गरीब की लड़की समय से पहले जवान हो जाती है और समय से पहले बूढ़ी।’ वही आदमी रईस से नरगिस की निक़ाह कराता है। ढ़ूँढ़ता भी है तो अपनी सोच के अनुसार रईश जैसा नकारा और दारूबाज इंसान। जैसे को तैसे खानदान वाले मिलते हैं।
‘रुखसाना’ भी एक निचले तबके की आम मुसलमान लड़की की कहानी है। उसका परिवार नरगिस के परिवार से कुछ ऊपर दर्जे का है। उसके अब्बा स्कूल के शिक्षक हैं। लेकिन उसके जीवन की परिणति नरगिस जैसी ही होती है। बल्कि उससे भी बदतर। उसके बचपन का प्रेमी शरीफ बहुत अरसे बाद एक दिन उसे अपने खाला के घर देखता है तो उसे उसकी दुरवस्था का पता चलता है। रुखसाना का शौहर एक हिंदू लड़की को भगा ले गया होता है। शुक्र है कि तब ‘लव ज़िहाद’ शब्द उस कस्बे में नहीं पहुँचा था।
परित्यक्ता रुखसाना का निक़ाह शरीफ की ख़ाला के लड़के गुलज़ार से हो जाता है। बाहर रहने के कारण शरीफ को पता नहीं होता कि गुलज़ार की पहली बीवी मरने के बाद रुखसाना से उसका निक़ाह हुआ है। गुलज़ार भाई पहले जींस और टी-शर्ट के शौकीन थे। लेकिन जब से तबलीगी जमात में शामिल हुए हैं, मेंहदी रची दाढ़ी, माथे पर काला निशान, गोल टोपी, लंबा-सा कुरता और उठंगा पैजामा पहनते हैं। अपना आख़िरत सँवारने के लिए घर छोड़कर विभिन्न शहरों की मस्जिदों में चालीस दिन का चिल्ला करते हैं। एक चिल्ला काटने के बाद उनकी दुनियावी आदतों में दीन ऐसा पेवश्त हो जाता है कि एक तरह से उनका कायाकल्प हो जाता है।
गुलज़ार भाई के इस रूप को देखकर शरीफ़ को हँसी आती है। वे शरीफ से उसका हाल-चाल पूछने के बजाय उसे दुनियादारी छोड़ कर समय रहते दीन की राह पर चलने की दावत देते हैं। मुस्लिम समुदाय में मज़हबी कट्टरता का रंग किस तरह पनता है यह गुलज़ार को देखकर समझा जा सकता है। शरीफ़ को इन तबलीगी लोगों से चिढ़ होती है। घर-बार छोड़कर इस्लामी जीवन-पद्धति सीखना उसे पसंद नहीं। ‘दुनिया की रोजमर्रा के उलझनों के बीच रहकर दीन पर क़ायम रहना ज़्यादा कठिन है।’
अपने मास्साब की पढ़ी-लिखी और सुसंस्कृत बेटी और अपने बचपन के प्यार को ऐसे माहौल में पाकर शरीफ़ दुखी होता है। समाज की व्यवस्था ही ऐसी है जिसमें वे बेदर्द समय की हक़ीकत को तो महसूस करते हैं, पर इसे बदलने के लिए कुछ कर नहीं पाते।
अंतिम कहानी ‘एसी’ में मुस्लिम समुदाय के बच्चों में सहज रूप से पनपने वाली हुनरमंदी है। निचले तबके में जीविका का संघर्ष बच्चों को हुनरमंद बना देता है। सैयद मज़ीद साहब अपनी कार की एसी बनवाते थक चुके हैं। शहर के जाने-माने गैरेज में भी दिखाया। लेकिन वह सुधरी नहीं। संयोग से उन्होंने कोलकाता गैरेज़ में जाकर दिखाया तो वहाँ के मुस्लिम लड़कों ने उसे ठीक कर दिया। वे मज़हब और ईमान की समझ भी रखते हैं। मज़ीद साहब जब गुटका खाते समय हनीफ़ को भी पेश करते हैं तो वह कहता है, “अरे नईं साब, रमजान के समय दिन में कुछ नहीं लेता। काम के कारण रोजा तो रख नहीं पाता, लेकिन दिन भर चाय-गुटका नहीं लेता…”
कोलकाता गैरेज की एक और ख़ासियत है। वहाँ बजरंगी और डेविड भी काम करते हैं। दीवार पर एक तरफ काली माता का फोटो है तो दूसरी तरफ मक्का-मदीने का। उस गैरेज में पूरा हिंदुस्तान नज़र आता है। ‘मेहनतकश, हुनरमंद मजदूर हैं ये लोग। इन्हें हिंदू-मुसलमान के चश्में से देखना कितना बड़ा अपराध है। सब मिल-जुलकर रोटी कमाने के लिए पसीना बहाते हैं।’
सैयद मज़ीद साहब उन्हें मुँहमाँगा मेहनताना देने के बाद लौटते समय एसी की ठंडी हवा में खुशदिल होते सोच रहे होते हैं कि ऐसे ही क्या कभी समाज को नफ़रतों की लू से निज़ात मिलेगी? यह कथाकार की केंद्रीय चिंता है जो कमो-बेश हर कहानी में झलकती है।
इन कहानियों में जहाँ एक ओर बहुसंख्यकवाद से पीड़ित संवेदना का स्वर है तो दूसरी ओर मुसलमानों के पिछड़ेपन, ज़हालत और कट्टरता से उपजी निराशा और दुख। इनमें सामाजिक यथार्थ का असली रूप दिखाई देता है। इसका साक्षात् किए बिना किसी सार्थक बदलाव के विचार का उदय हो पाना मुमकिन नहीं।
सधी हुई भाषा प्रवाहमय है। वर्णन और कथोपकथन आम मुस्लिम-समाज के रहन-सहन, रीति-रिवाजों और धार्मिक रुझानों को प्रकट करते हुए किरदारों को जानदार बना देते हैं। भाषा में स्वाभाविक रूप से घुले-मिले स्थानीय बोली के शब्द, कथाभूमि के नाम और उनका दृश्यांकन बयान को विश्वसनीयता और गहराई देते हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुए मन में गहरे अवसाद के साथ चिंता भी होती है। आख़िर हमारा समाज जा कहाँ रहा है? इस चिंता का पैदा होना ही महत्वपूर्ण है। इन कहानियों का पावना है।


पुस्तक: शाकिर उर्फ…
लेखक: अनवर सुहैल
प्रकाशक: एजुक्रिएशन पब्लिशिंग
मूल्य: रु. 209/-

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