Home देश ठाकुरों और ब्राह्मणों में चली आ रही वर्चस्व की इस जंग में पिसता ब्राह्मण समाज ?

ठाकुरों और ब्राह्मणों में चली आ रही वर्चस्व की इस जंग में पिसता ब्राह्मण समाज ?

-तौसीफ़ क़ुरैशी।।

लखनऊ, जहाँ कोरोना वायरस देश भर में अपना क़हर बरपा रहा है और यूपी को भी अपनी ज़बरदस्त चपेट में लिए है वहीं यूपी के सियासी संग्राम का पारा भी सातवें आसमान पर है और मुद्दा है ब्राह्मण। यूपी में एक बार फिर जातिवाद का माहौल बनाने का सियासी रहनुमाओं द्वारा प्रयास किया जा रहा है और उसको सरकार भी हवा दे रही है। अब ज़मीन पर इसका क्या इफेक्ट होगा या हो रहा है इसी को रेखांकित करने का प्रयास हम भी कर रहे है। सियासी दलों में जैसे होड़ मची है। अलग-अलग पार्टियों के नेता हर रोज़ मोदी की, भाजपा की ठाकुर आदित्यनाथ योगी सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे है। देखते है वह कहाँ तक कामयाब होते है या योगी सरकार उन्हें पटकनीं देने में कामयाब रहती है। इस समय यूपी में ब्राह्मणों को लेकर सियासत तेज़ हो गई है। ब्राह्मणों के बड़े नेता चाहे वह कांग्रेस के आचार्य प्रमोद कृष्णम, शाहजहाँपुर की सियासत से प्रदेश एवं देश की सियासत में पहचान रखने वाले परिवार के सदस्य जितिन प्रसाद हो या सपा के फ़ैज़ाबाद की सियासत में अमल दखल रखने वाले पूर्व विधायक पवन पाण्डेय या आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह आदि नेताओं का आरोप है कि यूपी की ठाकुर आदित्यनाथ योगी सरकार ब्राह्मणों को ठिकाने लगाने पर तुली हुई है बाक़ायदा इसको लेकर ब्राह्मणों में अभियान भी चलाया जा रहा है जो किसी हद तक कामयाब भी हो रहा है। ब्राह्मणों में यह बात चर्चा का विषय बन गईं है कि हाँ हमारे साथ अन्याय हो रहा है। इसी कड़ी में मोदी की भाजपा के सुल्तानपुर की लम्भुवा विधानसभा सीट से विधायक देवमणि द्विवेदी ने भी सरकार से यह सवाल कर सबको चौंका दिया है कि वर्तमान भाजपा सरकार बताए कि पिछले तीन सालों में कितने ब्राह्मणों की हत्या हुई है ? कितने हत्यारे पकड़े गए है ? कितने हत्यारों को पुलिस सज़ा दिलाने में कामयाब हुई है ? ब्राह्मणों की सुरक्षा के लिए आगे योगी सरकार की क्या रणनीति है ? क्या ऐसे हालात में सरकार ब्राह्मणों को शस्त्र लाइसेंस देने में प्राथमिकता देंगी ? प्रदेश भर में कितने ब्राह्मणों ने शस्त्र लाइसेंस के लिए आवेदन किया है ? प्रदेश में कितने ब्राह्मणों को शस्त्र लाइसेंस जारी किया है ? यह सब सवाल मोदी की भाजपा के विधायक देवमणि द्विवेदी ने विधानसभा के पटल पर रख कर पूछे है योगी सरकार को अपने ही विधायक के इन सवालों के जवाब विधानसभा में देने होंगे। जब इन सवालों के जवाब सरकार की ओर से आएँगे उसके बाद भी चर्चा होगी कि क्या भाजपा विधायक के गंभीर सवालों के जवाब सरकार ने गंभीर ही होकर दिए है या सिर्फ़ लीपा पोती कर मामले को दबाने का प्रयास किया है। ऐसा भी हो सकता है कि सरकार जवाब ही ना दे। इसके बाद इन्हीं विधायक के लेटर पैड पर 17 ठाकुर जाति के लोगों की लिस्ट वायरल हुई जिसमें नाम और मुक़दमों की संख्या बताईं गई है जिसमें पहले नंबर पर बृजेश सिंह पर 106 मुक़दमे, धनन्जय सिंह पर 46 मुक़दमे, सपा सरकार में मंत्री रहे ठाकुर राजा भैया पर 31 मुक़दमे, डाक्टर उदयभान सिंह पर 83 मुक़दमे , अशोक चन्देल पर 37 मुक़दमे, अभय सिंह पर 49 मुक़दमे, विनीत सिंह पर 34 मुक़दमे, बृजभूषण सिंह पर 84 मुक़दमे, चुलबुल सिंह पर 53 मुक़दमे, सोनू सिंह पर 57 मुक़दमे मोनू सिंह पर 48 मुक़दमे, अजय सिंह सिपाही पर 81 मुक़दमे, पिंटू सिंह पर 23 मुक़दमे, सनी सिंह पर 48 मुक़दमे, संग्राम सिंह पर 58 मुक़दमे, चुन्नु सिंह पर 42 मुक़दमे व बादशाह सिंह पर 88 मुक़दमे दर्ज होना बताया गया था। इस लेटरहैड पर 20-8-20 दिनांक भी पड़ी है तथा हस्ताक्षर भी हुए है। हालाँकि इस लेटर के वायरल होने बाद मोदी की भाजपा विधायक ने इस लेटर के फ़र्ज़ी होने की बात कही थी। बाद में लखनऊ की हज़रतगंज थाना कोतवाली ने बिना किसी की शिकायत के मामला भी दर्ज कर लिया है तथा मामले की जाँच में जुट गई है। अब यह तो जांचोप्रांत ही ज्ञात होगा कि इस लेटर को वायरल करने के पीछे क्या रणनीति रही थी। क्या यह विधायक और सरकार को बदनाम करने की साज़िश थी या ठाकुर आदित्यनाथ योगी सरकार को यह बताना था कि सिर्फ़ ब्राह्मण ही आपराधिक पर्वती में शामिल नही है ठाकुर भी है अन्य जातियों के भी अपराधी है ना कि सिर्फ़ ब्राह्मण ही अपराधी है जिनके ख़िलाफ़ योजनाबद्ध तरीक़े से अभियान चलाया जा रहा है। इन ठाकुरों के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई हुई ? नही हुई तो क्यों नही हुई ?

यही सब आज कल यूपी की सियासत में अपनी जगह बनाए हुए है। ब्राह्मणों के सामने बड़ी समस्या खड़ी की जा रही है या फिर वाक़ई ब्राह्मण समाज ठाकुर आदित्यनाथ योगी की सरकार से नाराज़ है। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक सियासी फ़िज़ाओं में बस यही गूंज है कि यूपी में ब्राह्मणों के साथ अन्याय हो रहा है और ब्राह्मणों के छोटे से लेकर बड़े नेताओं तक ज़्यादातर यही मान रहे हैं। इससे लगता है कि वास्तव में ब्राह्मण नाराज़ है क्या ब्राह्मणों को लेकर सियासी तापमान में गर्मी है ? क्या वही गर्मी ज़मीन पर भी महसूस हो रही है या नहीं ? सरकार समर्थित लेखकों का कहना है कि इस असंतोष को संगठित तरीक़े से तानाबाना बुनकर माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। उसमें वह लोग भी शामिल है, जिन्हें सरकार में तरज़ीह नही मिल पा रही है। लेकिन उनके पास भी ब्राह्मणों के तर्कों का कोई जवाब नहीं है। सहमति और विरोध साथ-साथ चलते है। विपक्षी गंण भी अपना सियासी निशाना साधने में कोई कोर कसर नही छोड़ना चाहते है। विपक्षी दलों के नेता ब्राह्मणों के अंदर उपज रही इस नाराज़गी को हवा देने का काम कर रहे है। विपक्ष का काम सरकार की नाकामियों को उजागर करना होता है यह बात अपनी जगह सही है लेकिन जिस तरह से ठाकुर आदित्यनाथ योगी की सरकार द्वारा चलाई जा रही ठोक दो की नीति की चारों ओर आलोचनाएँ हो रही है, संविधान की पैरोकारी करने वालों का कहना है कि देश संविधान से चलेगा ना कि लठैतों और बंदूक़धारियों से अगर यही सब होता रहा तो फिर संविधान और न्यायालयों के क्या मायने रह जाएँगे फिर सब काम पुलिस ही करेंगी जिसे चाहेगी अपराधी बना ठोंक देंगी और जिसे उसके सियासी आका कहेंगे रोक देगी।

जहाँ तक अपराधियों के विरूद्ध अभियान की बात है उसका सभी समर्थन करते है और करना भी चाहिए। अपराधी किसी का नही होता वह पूरे समाज के लिए घातक होता है उसको सज़ा मिलनी चाहिए। हर इंसान क़ानून-व्यवस्था को बिगाड़ने वालों पर क़ानून के अनुरूप कार्रवाई की उम्मीद करता है लेकिन उसमे पारदर्शिता होनी चाहिए ना कि धर्म एवं जाति देखकर कार्रवाई होनी चाहिए। अगर यह सब होगा तो लाज़िमी है सवाल होंगे और होने भी चाहिए। किसी जाति विशेष या धर्म को निशाना बनाने या उनको ही ठोंक देने से क़ानून-व्यवस्था को दुरुस्त नही किया जा सकता है। इसी का नतीजा है कि यूपी में आज खुलेआम बदमाशों द्वारा पुलिस को चुनौती दी जा रही है। पुलिस का ख़ौफ़ आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के दिमाग़ से निकल गया है। इसके भी बहुत से कारण है। पुलिस अपना दायित्व सही तरीके और ईमानदारी से नही निभा पा रही है। उसने अपना एक पैटर्न बना लिया है जैसे ही सरकार में झण्डे का रंग बदलता है वैसा ही वह अपना रवैया अख़्तियार कर लेती है। जिसकी वजह से आपराधिक प्रवृति के लोग उसी झण्डे के रंग में रंग जाते है और पुलिस लाचार खड़ी दिखाईं देती है और तमाशा भी देखती दिखाई देती है। वह तो बेगुनाहों को सलाखों के पीछे धकेल कर काग़ज़ों का पेट भरती रहती है। वीपी सिंह के दौर में भी यही सब हुआ था। ठाकुरों में सत्ता का नशा होने की वजह से कमज़ोर तबक़े के लोगों पर अत्याचार हुए थे ऐसा सियासत पर पैनी नज़र रखने वाले बताते है। पुलिस बदमाशों के सामने बौनी साबित हो रही है और ग़रीबों पर अत्याचार के लिए रह गई है। इस तरह की घटनाओं की निष्पक्षता से पड़ताल हो और क़ानून को हाथ में लेने वालों को निलंबित नहीं सेवा से रवानगी कर देनी चाहिए। तब जाकर हालातों में सुधार आ सकता है।

जब भी शासक अपना राजधर्म निभाना छोड़ देगा ऐसे ही हालात उत्पन्न होंगे। इतिहासकारों का यही मानना है शासक को ख़ुदा-भगवान (या आप जिसे भी मानते है) की परछाई कहा जाता है और वह इंसाफ़ करता है भेदभाव नही। ख़ैर यह सब बातें अपनी जगह है एक और कहानी भी है वह है पूरब में ठाकुरों और ब्राह्मणों में अपने-अपने वर्चस्व को लेकर बरसों से जंग चली आ रही है फ़िलहाल इस जंग में ठाकुर हावी है। ठाकुरों के राज में वर्चस्व की इस जंग में पिस ब्राह्मण समाज रहा है। इसी लिए कहा जा सकता है ठाकुरों और ब्राह्मणों की जंग में पिस्ता ब्राह्मण समाज। इसके क्या परिणाम आएँगे यह तो आने वाले दिनों में साफ़ हो पाएगा लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि अगर ब्राह्मणों ने मोदी की भाजपा से किनारा किया तो प्रदेश की सियासी तस्वीर कुछ और हो जाएगी। जिसकी अभी कल्पना ही की जा सकती है। ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने के लिए कांग्रेस , बसपा व सपा छटपटा रहे है। अब देखना होगा कि ब्राह्मणों की पहली पसंद इन तीनों सियासी दलों में कौन बनता है। यह एक ऐसा सवाल है जो सबके ज़ेहन पर सवार है।

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