आज हमारे विचारों की जगह अरूण शौरी और कुरियन जोसेफ की बातें..

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-सुनील कुमार।।
वकील प्रशांत भूषण के मामले में सुप्रीम कोर्ट का रूख उसे भारतीय लोकतंत्र के अधिकतर समझदार लोगों से अलग कर रहा है। और ये समझदार क्रिकेट या रॉकेट साईंस के समझदार नहीं हैं, बल्कि ये संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे जटिल मुद्दों को समझने वाले लोग हैं। इनमें सबसे ताजा नाम एक भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री रहे, आपातकाल के खिलाफ लड़े, और इंडियन एक्सप्रेस जैसे धाकड़ अखबार के दमदार संपादक रहे अरूण शौरी का है। उन्होंने अभी खुलकर कहा कि देश का जो सुप्रीम कोर्ट दो ट्वीट से अपने को खतरे में समझ रहा है वह देश की जनता को खतरे से क्या बचाएगा। उन्होंने बहुत से शब्दों में इस बात को कहा है- मुझे हैरानी हो रही है कि 280 अक्षर-मात्राओं के ट्वीट लोकतंत्र के झंडे को हिला रहे हैं। उन्होंने कहा मुझे नहीं लगता है कि सुप्रीम कोर्ट की छवि इतनी नाजुक है। 280 अक्षर-मात्राओं से सुप्रीम कोर्ट अस्थिर नहीं हो जाता। उनका कहना है कि इस फैसले से पता चलता है कि लोकतंत्र का यह स्तंभ इतना खोखला हो चुका है कि महज दो ट्वीट से इसकी नींव हिल सकती है। उन्होंने प्रशांत भूषण के माफी मांगने से इंकार पर कहा कि यह उनका निजी फैसला हो सकता है, लेकिन अगर वे माफी मांगते तो मुझे हैरानी होती।

अरूण शौरी ने इस बारे में कहा- पिछले कुछ दिनों में प्रशांत भूषण ने इस पर विचार किया होगा। कोर्ट ने 108 पेज का फैसला सुनाया है, कोर्ट का स्तर बहुत ऊंचा है। अगर आप कुल्हाड़ी से मच्छर मारेंगे तो आप अपने आपको चोट पहुंचाएंगे। आपको पता है जो शख्स ऊंचे ओहदे पर बैठता है, चाहे वह राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, या जज कोई भी हो, वो कुर्सी बैठने के लिए होती है, न कि खड़े होने के लिए। उन्होंने कहा- कोर्ट का मान ट्वीट से नहीं, जजों के काम से और उनके फैसलों से घटता है। यदि सुप्रीम कोर्ट खुद को सुरक्षित नहीं रख सकता, तो वह हमारी रक्षा कैसे करेगा। शौरी ने कहा- अगर कोई विज्ञापन कंपनी ट्विटर के लिए विज्ञापन बनाना चाहती है तो इससे अच्छा कोई विज्ञापन नहीं होगा कि ‘आओ ट्विटर से जुड़ो, हमारा प्लेटफॉर्म इतना शक्तिशाली है कि इस पर किया गया ट्वीट दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के केंद्रीय स्तंभ को हिलाने की क्षमता रखता है।’

अरूण शौरी ने कहा- प्रशांत भूषण के ट्वीट नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों द्वारा की गई इन टिप्पणियों के चलते लोगों का विश्वास सुप्रीम कोर्ट से घटेगा। लोग कहेंगे ‘अरे यार तुम सुप्रीम कोर्ट के पास भाग रहे हो कि वो तुम्हें बचाएंगे, जबकि वो खुद कह रहे हैं कि वे इतने कमजोर हो गए हैं कि दो छोटे से ट्वीट सारे ढांचे को गिरा देंगे।’ उन्होंने कहा, ‘यह वही बात हुई जैसा कि शायर कलीम आजि•ा ने कहा है, ‘हम कुछ नहीं कहते, कोई कुछ नहीं कहता, तुम्ही क्या हो तुम्ही सबसे, कहलवाए चले हो।’’ शौरी ने कहा कि कोर्ट के फैसलों की आलोचना और विश्लेषण करना अवमानना नहीं होता है। उन्होंने कुछ मामलों की मिसाल देते हुए कहा कि कोर्ट के कई ऐसे फैसले हैं जहां अदालत ने तर्कों को नजरअंदाज करते हुए फैसला दिया, या अभी भी लंबित है। उन्होंने कहा कि जैसा कोर्ट ने जजलोया और रफाल मामले में फैसला दिया, दोनों मामलों में महत्वपूर्ण सुबूतों की ओर से मुंह फेर लिया गया।

अरूण शौरी ने कहा कि अदालत हमारे संविधान के केन्द्र में स्थित बेहद महत्वपूर्ण विषयों, कश्मीर, मुठभेड़-हत्या, नागरिकता-संशोधन एक्ट को लगातार नजरअंदाज कर रही है। उन्होंने कहा, ‘क्या सत्य को उस देश में रक्षा के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा, जिसका आदर्श राष्ट्रीय वाक्य सत्यमेव जयते है? जिस देश के राष्ट्रपिता ने बार-बार कहा है कि सत्य ही भगवान है।’ उन्होंने कहा, ‘न्यायिक व्यवस्था का मान किसी ट्वीट से कम नहीं होता है, बल्कि अन्य कई कारणों, जैसे तथ्यों को नजरअंदाज करने, महाभियोग जैसे मामलों को डील करने की प्रक्रिया अपर्याप्त और निष्पक्ष न होने, और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ दुराचार के आरोपों के संबंध में पूरी तरह गोपनीयता बरतने, से कोर्ट का मान घटता है। किसी के ट्वीट पर अपना गुस्सा निकालने से अच्छा है कि इन कमियों को दूर किया जाए। याद रखें कि भ्रष्टाचार का अर्थ केवल धन स्वीकार करना नहीं है। हो सकता है कि एक अकादमिक या पत्रकार पैसे स्वीकार न करे, और फिर भी वह बौद्धिक रूप से भ्रष्ट हो कि वह आदतन दूसरों के काम को अपना बताकर छापता हो, या उससे नकल करता हो।

शौरी ने कहा कि इस तरह यदि कोई भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं तो इसका मतलब हमेशा ये नहीं होता कि वे पैसे के भ्रष्टाचार की बात कर रहे हों। एक व्यक्ति, एक जज, या एक राजनेता पैसे के मामले में पूरी तरह से ईमानदार हो सकता है, लेकिन नैतिक रूप से भ्रष्ट हो सकता है। वह किताबों में उच्च सिद्धांतों की खूब पैरवी करता होगा, मौलिक अधिकारों के बारे में खूब बोलता होगा, लेकिन जब इसे लागू करने की बात होती हो, तो वह पीछे हट जाता होगा। इस तरह के भ्रष्टाचार के ढेरों उदाहरण हैं।’

अरूण शौरी ने अलग-अलग कई अखबारों और समाचार माध्यमों से बातें की हैं, और उनकी बातों को हल्के में खारिज करना नाजायज होगा। वे खुद देश की कई सरकारों के खिलाफ लड़ चुके हैं, और वे लोकतंत्र के तमाम पहलुओं से बहुत अच्छी तरह वाकिफ इंसान हैं। आज अपने अखबार के विचारों की इस जगह पर उनकी बातों को जस का तस धर देने के पीछे इस जगह को भर देने की नीयत नहीं है, बल्कि इस अखबार की अपनी सोच से मेल खाने वाली उनकी जो सोच कल सामने आई है उसे हम पिछले कुछ दिनों में अपनी लिखी बातों के एक विस्तार के रूप में यहां रख रहे हैं, और इसीलिए उनकी बातों को पूरे खुलासे से देना ठीक लगा है।

सुप्रीम कोर्ट अगले एक-दो दिनों में इस मामले पर अपना तय किया जा चुका रूख सामने रखेगा, और अदालत की जुबान में इसे सजा का निर्धारण कहा जाएगा। प्रशांत भूषण के मुद्दे पर हमारे तर्क फिलहाल खत्म हो चुके हैं, और अभी दो दिन पहले ही हमने इस बारे में लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में फैसला भी दे सकता है, और इंसाफ भी कर सकता है। यह पूरा सिलसिला सुप्रीम कोर्ट की एक अनुपातहीन अधिक ताकत के खतरे भी बता रहा है कि दर्जनों जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच पूरी न्यायपालिका के सम्मान पर एक फैसला ले रही है, और इस बेंच से दस गुना अधिक दूसरे जज इस बुनियादी और लोकतांत्रिक मुद्दे पर राय देने से बाहर हैं। सुप्रीम कोर्ट से अभी रिटायर हुए जज जस्टिस कुरियन जोसेफ ने किसी विवाद को लेकर दो दिन पहले एक बयान जारी करके कहा है कि मामले की सुनवाई पांच या सात जजों की संवैधानिक बेंच को करनी चाहिए। इस तरह के महत्वपूर्ण मामलों को कोर्ट के भीतर विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए जहां व्यापक चर्चा, और व्यापक भागीदारी की गुंजाइश हो। उन्होंने लिखा- भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने न्यायालय की अवमानना के दायरे और सीमा पर कुछ गंभीर प्रश्नों को सुनने का फैसला लिया है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक स्वत: संज्ञान मामले में दोषी ठहराए व्यक्ति को अंतर-अदालत की अपील का मौका मिलना चाहिए क्योंकि आपराधिक मामलों में सजा की अन्य सभी स्थितियों में दोषी व्यक्ति के पास अपील के माध्यम से दूसरे अवसर का अधिकार है। अदालत की अवमानना अधिनियम के तहत एक अंतर-अदालत अपील दी जाती है जहां उच्च न्यायालय के एकल जज द्वारा आदेश पारित किया जाता है तो मामले में डिवीजन बेंच सुनवाई करती है, जिसकी अपील भारत के सर्वोच्च न्यायालय में निहित है। उन्होंने लिखा यह सुरक्षा शायद न्याय के अंत की आशंका से बचने के लिए भी प्रदान की गई है। क्या अन्य संवैधानिक न्यायालय, भारत के सर्वोच्च न्यायालय में भी इस तरह की सुरक्षा नहीं होनी चाहिए, जब एक स्वत: संज्ञान आपराधिक अवमानना मामले में सजा हो?

जस्टिस कुरियन ने अपने बयान में लिखा है- न्याय किया जाना चाहिए, भले ही आसमान टूट पड़े, ये बात न्यायालयों द्वारा न्याय के प्रशासन की बुनियादी नींव है। लेकिन अगर न्याय नहीं किया जाता है, या न्याय विफल होता है, तो आसमान निश्चित रूप से टूट पड़ेगा। भारत के सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा नहीं होने देना चाहिए। वर्तमान अवमानना मामले केवल एक या दो व्यक्तियों से जुड़े हुए नहीं हैं, बल्कि न्याय से संबंधित देश की अवधारणा और न्यायशास्त्र से संबंधित बड़े मुद्दे हैं। इन जैसे महत्वपूर्ण मामलों को विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए जहां व्यापक चर्चा और व्यापक भागीदारी की गुंजाइश है। लोग आ सकते हैं, और लोग जा सकते हैं, लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय को सर्वोच्च न्याय के न्यायालय के रूप में हमेशा के लिए रहना चाहिए।

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