फिल्मी खलनायक देश का सबसे बड़ा नायक, तो फिर सत्तारूढ़ नायक आखिर क्या साबित हुए?

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-सुनील कुमार।।
फिल्म उद्योग के कलाकार सोनू सूद की समाजसेवा पर हम पहले भी एक-दो बार इसी जगह पर लिख चुके हैं, और कई खबरें भी छापी हैं। जिस तरह देश भर से इस नौजवान कलाकार को मदद की अपील मिल रही हैं, और वह जिस तरह लोगों का इलाज करवा रहा है, संगठित रूप से लोगों को नौकरियां दिलवा रहा है, किसी का मकान बनवा रहा है, तो किसी को बह गई भैंस दिलवा रहा है, सोशल मीडिया पर कोई तस्वीर आई कि एक किसान अपनी बेटियों को हल में जोतकर खेत में काम कर रहा है, तो सोनू सूद की तरफ से ट्रैक्टर उनके घर पहुंच जाता है। यह पूरा सिलसिला अनोखा है, और अटपटा है। क्या इतना बड़ा देश लोगों की अंतहीन जरूरतों के लिए किसी एक जिंदा इंसान के कंधों पर इस हद तक सवार होकर चल सकता है? इस देश में केन्द्र सरकार है, राज्य सरकारें हैं, स्थानीय म्युनिसिपल और पंचायतें हैं, बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीएसआर फंड हैं, बड़े-बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संगठन हैं, क्या इन सबके ढांचे ढह चुके हैं? क्या पूरे हिन्दुस्तान की जरूरतें इस रफ्तार से एक मददगार पर टूट पड़ेंगी कि किसी एक दिन उसे 41 हजार अपीलें मिलें? कोई एक इंसान, इंसान की ताकत से बहुत ऊपर उठकर अगर जरूरतमंदों का ऐसा मददगार हो रहा है, तो यह क्षमता अविश्वसनीय है। सोनू सूद की विनम्रता भी अविश्वसनीय है, उसकी रफ्तार भी अविश्वसनीय है, और मदद का उसका आकार भी अविश्वसनीय है। इस सिलसिले को नाकामयाबी के पहले दूसरे लोगों को खुद मदद की जरूरत है। अगर एक इंसान ही अंतहीन इस हद तक करते चलेगा, तो फिर लोगों को किसी ईश्वर की जरूरत क्यों होगी? इसलिए हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के बाकी तबकों को सोनू सूद नाम के एक आईने में अपना चेहरा देखना चाहिए, और अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो अब अपने पीएम केयर्स फंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक से क्लीन चिट पा चुके हैं कि उसमें कुछ गलत नहीं है। इस फंड में यह भी इंतजाम है कि इसके दानदाताओं को टैक्स में छूट मिलेगी, कंपनियों के सीएसआर का पैसा इस फंड में दिया जा सकेगा, और इसे सीएजी से ऑडिट भी नहीं करवाना पड़ेगा। अब तक पब्लिक सेक्टर कंपनियों से ही इसे हजार-दो हजार करोड़ मिल चुके हैं, और देश की बाकी बड़ी कंपनियों से भी। आज सोनू सूद किसी राजनीतिक दल का झंडा उठाए बिना जिस अंदाज में लोगों की मदद के लिए जादूगर मैन्ड्रेक और महाबली बेताल का मिलाजुला रूप बनकर सुपरमैन की तरह आसमान पर उड़ते हुए पूरे देश के गांव-गांव तक पहुंच जा रहा है, दरअसल वह अंदाज हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री को बेहतर सुहाता। नरेन्द्र मोदी अगर ट्विटर पर देख-देखकर देश भर के लोगों की दिक्कतों को इसी तरह दूर करते, तो वह लोकतंत्र में ऐसी सेवा का एक फायदेमंद काम भी होता कि उन्हें चुनाव में इसका असर देखने मिलता। लेकिन सोनू सूद फिलहाल तो किसी राजनीतिक दल में गए नहीं हैं, किसी पार्टी का प्रचार कर नहीं रहे हैं, किसी पार्टी से चुनाव लडऩे की नीयत नहीं दिख रही है, और फिर वे अकेले बिहार की मदद भी नहीं कर रहे हैं। इसलिए उनके अविश्वसनीय नेक काम पर हम शक करके उसकी बेइज्जती करना नहीं चाहते। अगर वे चुनाव लड़ते भी हैं, तो भी आज उनके किए हुए कामों से जिन लाखों जिंदगियों को राहत मिली है, या मिलने जा रही है, वह काम तो खत्म नहीं हो जाता। अब सवाल यह है कि 130 करोड़ आबादी के इस देश में सुबह से रात तक जरूरतमंद लोगों की ऐसी मदद से भी क्या तकलीफें खत्म हो जाएंगी? या तो समाज के संपन्न लोग सोनू सूद के साथ आएं, और एक ट्रस्ट बनाकर उन्हें ऐसी ताकत दें कि वे इस काम को जारी रख सकें। दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी करें, मकान देने के लिए सरकारों के पास बजट है, और उनके इलाकों में गरीबों की शिनाख्त भी है, तो किसी को मकान बनवाकर देने की जिम्मेदारी सोनू सूद तक पहुंचनी क्यों चाहिए? छत्तीसगढ़ में बारिश से किसी आदिवासी छात्रा की सारी किताबें भीगकर खत्म हो गईं, टूटी छत बिना दीवारों वाला घर, उसे देखकर सोनू सूद ने किताबों और मकानों दोनों का भरोसा दिलाया है। अब यह काम छत्तीसगढ़ के जिस हिस्से में भी होना है, वहां पर स्थानीय शासन है, राज्य शासन के आला अफसर हैं, और समाज के भी ताकतवर लोग हैं, क्या ये तमाम लोग भी सोनू सूद की ट्वीट जमीन पर उतरते देखने की राह तकेंगे? या इनकी खुद की भी अपने इलाकों के लिए कोई जिम्मेदारी बनती है?

यह पूरा सिलसिला मुंबई से मजदूरों को उनके गांव वापिस भेजने से शुरू हुआ था। सोनू सूद ने हजारों बसों में लोगों को भेजा, कई रेलगाडिय़ां चलवाईं, और दर्जनों विमानों से भी मजदूरों को भेजा। यही काम कई राज्य सरकारें भी कर रही थीं। लेकिन क्या किसी सरकार ने अपने राज्य में लौटे हुए मजदूरों के लिए सोनू सूद को भुगतान की पेशकश की? कम से कम एक-दो राज्यों के मंत्रियों की तो हमें याद भी है कि किस तरह उन्होंने सोशल मीडिया पर ही सोनू सूद को इस बात के लिए धन्यवाद लिखा था कि उन्होंने उनके राज्य के मजदूरों को भिजवाया। सोनू सूद ने तो अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से लाख गुना अधिक करते हुए ऐसे काम किए हैं, लेकिन क्या सरकारों का जिम्मा बस इतना ही बनता है कि थैंक्यू सोनू सूद टाईप करके पोस्ट कर दें?

लोकतंत्र अगर अपनी व्यापक जिम्मेदारियों को, अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को किसी एक करिश्माई व्यक्ति के भरोसे छोड़क़र खुद चादर तानकर सो जाए, तो यह करिश्माई की कामयाबी कम है, लोकतंत्र की नाकामयाबी और गैरजिम्मेदारी अधिक है। आज इस देश के तमाम सत्तारूढ़ लोगों को यह सोचना चाहिए कि सोनू सूद के किए हुए कौन-कौन से काम दरअसल उनकी (सत्तारूढ़ लोगों की) जिम्मेदारी थे, और उन्होंने जब जरूरतमंदों की मदद नहीं की, तो लोगों को यह एक आदमी देश का सबसे बड़ा मददगार, सबसे बड़ा भरोसेमंद, सुपरमैन, और ईश्वर सरीखा दिखने लगा।

हमको पक्का भरोसा है कि कम से कम ईश्वर को तो ऐसी तुलना नहीं सुहाएगी, क्योंकि वह अपने आपको तमाम इंसानों से ऊपर रखना चाहेगा, लेकिन क्या अदालतों, सरकारों, और सामाजिक संगठनों पर काबिज लोगों को ऐसी तुलना सुहा रही है कि कल का एक छोकरा, फिल्मों में खलनायक बनने वाला, मार खाने वाला, आज देश का सबसे बड़ा नायक बनकर उभर रहा है? जिन लोगों के हिस्से के काम सोनू सूद कर रहे हैं, उन लोगों को अपने बारे में सोचना चाहिए कि इतिहास उनके जिम्मे की नाकामयाबी को भी दर्ज करते चल रहा है। जब एक आम एक्टर देश का सबसे बड़ा नायक बन रहा है, देश का रहनुमा माना जा रहा है, तो फिर जनता के पैसों पर कुर्सियों पर बैठे हुए नायक तो खलनायक ही साबित हुए न? और इतिहास इस बात को भी दर्ज करते चल रहा है कि मजदूरों को लेकर जब लोग सुप्रीम कोर्ट तक दौड़े थे, तब सुप्रीम कोर्ट का क्या रूख था।

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