संसद में विमर्श की गुंजाइश..

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लगभग छह महीनों की खामोशी के बाद अब संसद का शोरगुल फिर सुनाई पड़ने के आसार नजर आने लगे हैं। खबर है कि संसद का मानसून सत्र 22 सितंबर या उससे पहले शुरु हो सकता है। दरअसल अंतिम बजट सत्र 23 मार्च को खत्म हो गया था, और भारत के संविधान के आदेशपत्र के अनुसार, दो सत्रों के बीच अधिकतम छह महीने का अंतर होना चाहिए, जो 22 सितंबर को खत्म हो रहा है। इसलिए अब संसद का लगना जरूरी है। वैसे केंद्र सरकार से अब तक कोई लिखित सूचना नहीं है, इसलिए दोनों संसदीय सचिवालय के अधिकारी अभी तक संसद के मानसून सत्र के शुरू होने की तारीख के बारे में निश्चित नहीं हैं, हालांकि वो सितंबर के दूसरे सप्ताह में सत्र शुरू होने की उम्मीद करते हैं।

बजट सत्र को बीच में ही खत्म करना पड़ा था, क्योंकि देश में कोरोना के मामले आने शुरु हो गए थे। लेकिन अब तो इकाई, दहाई में नहीं बल्कि हजारों की संख्या में रोजाना संक्रमण के मामले आ रहे हैं। हर दिन लगभग 60 से 70 हजार मामलों का आना काफी भयावह स्थिति है और इसके गंभीर परिणामों का ख्याल रखना होगा। इसलिए लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर आग्रह किया कि कोरोना वायरस की स्थिति को देखते हुए सदस्यों को संसद की कार्यवाही में वर्चुअल माध्यम से शामिल होने की अनुमति दी जाए।

अधीर रंजन ने अपनी चिठ्ठी में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जैसा किया जा रहा है, उसी तरह किसी ऐप का लिंक सांसदों को मुहैया कराया जाना चाहिए, जिससे जो सांसद सदन में मौजूद हैं वो अपनी बात फिजिकली रख पाएं और जो मौजूद नहीं हैं वो ऐप के जरिए अपनी राय दिए गए समय में रख सकें। उनका यह सुझाव बिल्कुल सामयिक है, क्योंकि सरकार ने ही लोगों को एहतियातन घर पर रहने की सलाह दी है, भीड़-भाड़ वाली जगहों पर एकत्र होने से बचने कहा है। जब-जब इस सुझाव का उल्लंघन हुआ, उसके दुष्परिणाम देखने मिले हैं।

धार्मिक, राजनैतिक और कई बार निजी प्रयोजनों से भीड़ जुटाई गई और देश में कोरोना का खतरा बढ़ा। यूं भी मोदीजी ने शुरु से डिजीटल इंडिया की बात कही है, और उस बात के अधिकतम उपयोग का शायद यह उपयुक्त समय है। खुद मोदीजी ने अयोध्या में भूमिपूजन को छोड़ अपनी बैठकें, सम्मेलन वर्चुअली संपन्न किए। देश के मुख्यमंत्रियों से बैठक हो या यूएन की बैठक, विद्यार्थियों को संबोधित करना हो या पार्टी कार्यकर्ताओं को या कोई उद्घाटन करना हो, उन्होंने सारे काम डिजीटल माध्यम से संपन्न किए।

देश में इस वक्त अदालतों का कामकाज, शिक्षा सब ऑनलाइन चल रहे हैं। कई कंपनियां अपने कर्मियों से घर से ही काम करा रही हैं और जहां बहुत जरूरी हो, वहीं लोगों को बुलाया जा रहा है। यही काम संसद और विधानसभाओं में भी किया जा सकता है। गुरुवार से शुरु हुए उत्तरप्रदेश विधानमंडल के मानसून सत्र के लिए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित से आग्रह किया है कि अस्वस्थ और 65 वर्ष से अधिक आयु वाले विधायक सदन की कार्यवाही में वर्चुअल शामिल हों और उनकी उपस्थिति को मान लिया जाए।

देश में कोरोना की गंभीर स्थिति को देखते हुए संसद सत्र के दौरान पूरी सतर्कता बरती जाएगी, यह तय है। खबरें हैं कि सांसदों को दूर-दूर बैठाने के लिए दोनों सदनों की वीथिकाओं और अन्य कक्षों का भी इस्तेमाल होगा। सदन में चर्चा सुचारू रूप से चले, इसके लिए आडियो-वीडियो कनेक्टिविटी की व्यवस्था की जा रही है। 

ये तमाम सावधानियां जो अब अपनाई जाएंगी, उन पर पहले भी अमल किया जा सकता था। लेकिन यह विडंबना ही है कि सदी के बड़े संकटों में से एक इस कोरोना काल में भारत में नीति निर्धारण की सर्वोच्च संस्था संसद महीनों मौन बैठी रही। संकट के वक्त देश को संभालने और स्थितियों को सामान्य करने के लिए नीतियां बनाने का दायित्व संसद का था, लेकिन यह काम पूरी तरह से कार्यपालिका के हवाले कर दिया गया, जो व्यावहारिक रूप से नौकरशाही के शासन में तब्दील हो चुका है।

बीते महीनों में अगर संसद सत्र आयोजित हुआ होता, कोरोना के नाम पर विशेष सत्र बुलाया गया होता तो लॉकडाउन से लेकर अनलॉक जैसे फैसले या कि राहत पैकेज और नई शिक्षा नीति जैसे फैसले पर्याप्त चर्चा के बाद लागू होते। तब शायद लाखों मजदूरों को रातों-रात सड़क पर आने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता, क्योंकि उनकी घरवापसी या रोजगार को लेकर बेहतर तरीके से फैसला लिया जा सकता था। तब शायद कोरोना भी इतनी तेजी से नहीं फैलता, क्योंकि ताली-थाली बजाने जैसे अविचारित फैसलों की जगह टेस्टिंग बढ़ाने या साफ-सफाई का ध्यान रखने जैसे जागरुकता भरे फैसले संसद में लिए जा सकते थे।

गर्त में जा चुकी जीडीपी को भी बचाया जा सकता था। यह सब हो सकता था, अगर मनमर्जी के शासन का मोह सत्ताधारियों ने छोड़ा होता और लोकतंत्र का ख्याल रखा होता। जब भारत में संसद मौन थी और संसदीय समितियां निष्क्रिय थीं, तब भी दुनिया के कम से कम सौ देशों में किसी न किसी तरह से संसद का कामकाज जारी था। इनमें विकसित देशों से लेकर हमसे भौतिक रूप से कहीं ज्यादा पिछड़े देश भी शामिल हैं। कहीं सांसदों की सीमित मौजूदगी वाले संक्षिप्त संसद सत्र हुए, कहीं वीडियो कान्फ्रेंसिंग वाली तकनीक का सहारा लेकर ‘वर्चुअल सेशन’ का आयोजन किया गया, कहीं सिर्फ संसदीय समिति की बैठकें हुईं। लेकिन भारत के संसदीय इतिहास में यह बात दर्ज हो चुकी है कि मानवीय आपदा के इस दौर में भारत की संसद खामोश थी। बहरहाल, अब एक बार फिर से संसद में विमर्श की गुंजाइश बनती दिख रही है, तो महज स्वास्थ्य आपदा की आड़ में इस मौके को जाने नहीं देना चाहिए।

(देशबंधु)

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