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खबरों के लॉकडाउन का वक्त..

खबरों के लॉकडाउन का वक्त..

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बुधवार को भारत की सबसे बड़ी खबर ये थी कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच करने का जिम्मा सीबीआई को सौंपने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने दिया है। वैसे खबर तो खबर ही होती है।  जैसे उत्तरप्रदेश में हर दूसरे दिन बच्चियों, महिलाओं के यौन शोषण की घटनाएं भी खबर हैं। कोरोना के मामले 27 लाख से अधिक हो चुके हैं और 51 हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं।

पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे पड़ोसियों के मुकाबले भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या की अधिक है। महामारी के बीच करोड़ों बच्चों का भविष्य अधर में लटका हुआ है, क्योंकि ऑनलाइन कक्षाओं या परीक्षा देने की सहूलियत उनके पास नहीं है। बिहार, उत्तरप्रदेश, ओडिशा, केरल, तेलंगाना समेत कम से कम 11 राज्यों में भारी बारिश और बाढ़ से जनजीवन अस्तव्यस्त हो चुका है, कई लोगों की मौत हो गई है, घर-फसलें बर्बाद हुए, सो अलग। इस बीच अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर जारी है और बेरोजगारी पर कोई लगाम नहीं लग रही।

बीते चार महीनों में दो करोड़ नौकरियां जा चुकी हैं, पिछले जुलाई महीने में ही कम से कम 50 लाख नौकरियां गई हैं। दो करोड़ नौकरियों का जाना मतलब दो करोड़ परिवारों का भविष्य दांव पर लगना है। उधर गलवान घाटी में अब क्या हालात हैं, इस पर कई दिनों से चुप्पी छाई हुई है। क्या चीन ने अपने सैनिकों को वापस बुला लिया। क्या भारत अपनी जमीन दोबारा हासिल करने में सफल रहा। वैसे इस ओर जितनी चुप्पी छाई रहेगी, सरकार को उतनी ही सुविधा होगी, क्योंकि उसे लद्दाख की हकीकत पर जवाब नहीं देना पड़ेगा। संसद पिछले मार्च से नहीं लग पाई है और इस वजह से सरकार लगभग मनमाने तरीके से काम कर रही है। यह स्थिति देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कितनी खतरनाक है, इसका अनुमान अभी जनता को नहीं लग रहा है। अब तक हमने संसदीय व्यवस्था का हर सुख बड़ी आसानी से प्राप्त कर लिया, इसलिए शायद उसके महत्व का अंदाज हमें नहीं लगा।

लेकिन जब देश में मनमाना शासन लागू हो जाएगा और संविधान में लिखी बातें हाशिए पर रख दी जाएंगी, तब शायद हम भारत के लोगों को अहसास होगा कि हमारे पास क्या था और हमने क्या खो दिया। देश की इस मौजूदा तस्वीर का हर रंग, हर रेखा एक खबर है, जिस पर चर्चा होनी चाहिए और अगर ऐसा होता, तो ये बड़ी खबर होती। लेकिन अभी मीडिया ने बता दिया कि सुशांत सिंह को इंसाफ दिलाने से बढ़कर कोई और खबर नहीं हो सकती और जनता बड़ी आसानी से मीडिया के इस झांसे में आ गई है।

वैसे तो 14 जून से सुशांत सिंह राजपूत की मौत सुर्खियों में है। लेकिन इसमें मीडिया को अपराध और ग्लैमर का कॉकटेल बनाने का बढ़िया मौका तब हाथ लग गया, जब उनकी कथित महिला मित्र रिया चक्रवर्ती से पुलिस ने पूछताछ शुरु की। उसके बाद रिया का रहस्य, लव, लिव-इन और धोखा जैसे सनसनीखेज शीषर्कों के साथ रोजाना रिया का मीडिया ट्रायल होने लगा। आरुषि हत्याकांड, रामरहीम की गिरफ्तारी जैसे मामलों में भी ऐसे ही मीडिया ट्रायल किए गए। न तब कुछ न्यूज चैनलों की इस करतूत पर कोई सेंसरशिप लागू हो सकी, न अब हो पा रही है। 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर खबरों को तोड़-मरोड़ के, शब्दों के अविचारित उपयोग और खबर के साथ रोमांच बढ़ाने वाले ग्राफिक्स और पार्श्व संगीत मिला कर दर्शकों के लिए जब पेश किया जाता है, तो चाहे-अनचाहे दर्शक उसके प्रभाव में आ ही जाते हैं। तब ऐसी खबरों को देखकर लगता है मानो हम सी ग्रेड की कोई फिल्म देख रहे हैं। सुशांत ने अगर किसी के दबाव में आकर आत्महत्या की, या फिर उनकी मौत की कोई और वजह है, इसकी जांच अवश्य होनी चाहिए और अगर कोई दोषी है, तो उसे सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन यह काम अदालत का है।

मीडिया जिस तरह अदालत की छद्म भूमिका में आ गई है, क्या इस पर रोक नहीं लगनी चाहिए। कब तक यह लचर तर्क दिया जाता रहेगा कि दर्शक जो चाहता है, हम वही दिखाते हैं। दर्शक को लोकतंत्र के लिए परिपक्व करना और जागरुक नागरिक बनाना क्या मीडिया की जिम्मेदारियों में शुमार नहीं है। जून से सुशांत सिंह का मामला चैनलों में चर्चा का स्थायी विषय बना हुआ है। बीच में कुछ समय के लिए चीन ने इसकी जगह ले ली थी, लेकिन स्टूडियो में छद्म लड़ाई के जरिए शायद अधिक टीआरपी बटोरना मुश्किल हो रहा था और ग्राउंड जीरो तक भी जाबांज पत्रकार नहीं पहुंच पाए, अन्यथा कुछ दिनों तक गलवान का नजारा ही देखने मिलता। पिछले तीन-चार दिन आमिर खान भी प्राइम टाइम बहस का हिस्सा बने, क्योंकि उन्होंने टर्की की प्रथम महिला से मुलाकात कर ली। चैनलों ने तब दर्शकों को समझाया कि कैसे एक मुलाकात से राष्ट्रवाद खतरे में पड़ गया है।

राम मंदिर के भूमिपूजन से जन्म-जन्मांतर तक धर्म की रक्षा करने वालों का राष्ट्रवाद कितना नाजुक है, यह आमिर खान प्रकरण से समझ में आ गया। बहरहाल अब सत्य, न्याय, धर्म, राष्ट्रवाद इन सबकी रक्षा चैनलों पर सुशांत सिंह के बहाने तब तक होती रहेगी, जब तक बिहार चुनाव संपन्न नहीं हो जाते। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सुशांत के परिजनों और मित्रों की खुशी तो समझ में आती है, उन फिल्मी कलाकारों की त्वरित टिप्पणियां भी समझ में आती हैं, जो किसी भी मामले पर विवादास्पद बयान देकर सुर्खियां बटोरने की फिराक में रहते हैं।

लेकिन नीतीश कुमार जब यह कहते हैं कि अब होगा न्याय या संबित पात्रा कहते हैं कि महाराष्ट्र सरकार जा रिया है, तब इसके राजनैतिक प्रयोजन समझना कठिन नहीं है। बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे ने कहा कि अब जो सच होगा वह बाहर आ जाएगा। वहीं उन्होंने ये भी कहा कि रिया चक्रवर्ती की इतनी औकात नहीं है कि वह बिहार के मुख्यमंत्री पर कमेंट करें। क्या इस टिप्पणी को अलोकतांत्रिक नहीं माना जाना चाहिए। एक निर्वाचित मुख्यमंत्री के बारे में कुछ कहने के लिए क्या आम जनता को अपनी हैसियत समझनी होगी।

कायदे से बड़ी खबर यही होनी चाहिए कि कैसे देश में लोकतंत्र खत्म करने और अधिनायकवाद को न्यू नार्मल बनाने का सिलसिला चल पड़ा है। जो लोग लोकतंत्र के अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं, उन पर कानून का जोर चलाया जा रहा है और जो लोग खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं, लोकतंत्र को खत्म कर रहे हैं, उन्हें और ताकतवर बनाया जा रहा है। लेकिन मीडिया की खबरों में ये खबर है ही नहीं। ये खबरों के लॉकडाउन का वक्त है।

(देशबंधु)

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