Home देश गर पूरा परिवार बाहर के अध्यक्ष का हिमायती है, तो उसमें हर्ज क्या है?

गर पूरा परिवार बाहर के अध्यक्ष का हिमायती है, तो उसमें हर्ज क्या है?

-सुनील कुमार।।
अभी हफ्ते भर पहले प्रकाशित हुई एक किताब जिसमें अगली पीढ़ी के युवा नेताओं के इंटरव्यू हैं, उसमें ऐसा छपा है कि प्रियंका गांधी ने किताब के लेखकों को कहा है कि वे अपने भाई राहुल गांधी से पूरी तरह सहमत हैं कि किसी गैरकांग्रेसी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। किताब के मुताबिक प्रियंका ने कहा है कि हममें (परिवार) से किसी को पार्टी अध्यक्ष नहीं होना चाहिए, पार्टी के अपना रास्ता खुद तलाशना चाहिए।

अभी पिछले दो घंटों में देश के तमाम मीडिया में इस किताब से प्रियंका की बातचीत के हिस्से छा गए हैं, और यह किसी किताब की बिक्री के लिए एक शानदार तरीका भी रहता है। लेकिन इन कुछ घंटों में दिल्ली में प्रियंका, या कांग्रेस पार्टी की तरफ से इन खबरों के खिलाफ कुछ नहीं कहा गया है, तो हम भी पहली नजर में किताब के लेखकों से उनकी बातचीत से सही मान रहे हैं। प्रियंका का इंटरव्यू पढऩे लायक है, क्योंकि उसमें परिवार और पार्टी की बहुत सी बातों पर पहली बार उनका बयान आया है, लेकिन आज यहां उस पर लिखने का मकसद कांग्रेस अध्यक्ष के बारे में लिखना है।

अगर ये बातें सही हैं, तो कांग्रेस पार्टी के पास एक बार गांधी नाम की लाठी के बिना अपने पैरों पर खड़े होने का एक मौका आया हुआ दिख रहा है। और खुद गांधी परिवार के इन तीन लोगों को भी कुछ बरस चैन से गुजारना चाहिए, अगर वे सचमुच ही पार्टी की लीडरशिप से कुछ या अधिक वक्त के लिए अलग होना चाहते हैं, तो शायद यह सबसे सही मौका है, और अगर इस मौके को यह परिवार चूकता है, तो यही माना जाएगा कि वह मन-मन भावे, मूड़ हिलावे का काम कर रहा है।

आज जब हम इस परिवार के बाहर कांग्रेस अध्यक्ष की संभावना पर चर्चा कर रहे हैं, तो हो सकता है कि पहले हमारी लिखी हुई कुछ बातों से परे जाकर, या उसके खिलाफ भी जाकर हम यहां लिख रहे हों। शीशे पर लुढक़ते पारे की तरह अस्थिर राजनीति में जब हालात बदलते हैं, तो व्यक्तियों और पार्टियों के कुछ पहलुओं के बारे में हमारे जैसे लोगों के खयालात भी बदलते हैं। आज कांग्रेस पार्टी में गांधी परिवार सर्वमान्य और स्वाभाविक नेता है, तो यह यथास्थिति कांग्रेस के लिए पार्टी के भीतर विवादहीन और सुविधाजनक लगती है। लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस की संभावनाएं, और खुद इस परिवार की संभावनाएं यह स्थिति जारी रहने पर कमजोर लगती हैं। हो सकता है कि परिवार से परे की पार्टी लीडरशिप पार्टी का भी भला कर सके, और इस परिवार को भी सांस लेने का एक मौका दे सके। आज जब तक कांग्रेस में लीडरशिप के स्तर पर कोई शून्य नहीं है, तब तक यह सोचना कुछ मुश्किल है कि उसे कौन भर सकते हैं। लेकिन यह संभावना असंभव नहीं है। 18 बरस प्रधानमंत्री रहने के बाद जब नेहरू गुजरे थे, तो उनके रहते-रहते ही यह सवाल उठने लगा था कि नेहरू के बाद कौन? लेकिन नेहरू के बाद भी हिन्दुस्तान खत्म नहीं हुआ, जब भारतीय जनता पार्टी संसद में दो सीटों पर आ गई थी, तब भी उसकी संभावनाएं खत्म नहीं हुई थीं, और आज वह संसद में फर्श, दीवार, और छत तक पर काबिज हुई है। जब इमरजेंसी लगी थी, तो उसके बाद के चुनाव में इंदिरा का जो हाल हुआ था, उससे लगता था कि अब वे खत्म हो गई हैं, लेकिन वे तो ढाई बरस के भीतर ही खुद-गिरी जनता पार्टी सरकार के बाद सत्ता पर आ गई थीं। नरसिंहराव के प्रधानमंत्री रहते हुए सोनिया परिवार से कोई भी न पार्टी अध्यक्ष थे, और न ही किसी मंत्री पद पर भी थे, लेकिन फिर भी यह परिवार पार्टी की सत्ता पर फिर से आ गया, और लगातार दो कार्यकाल के लिए मनमोहन सिंह की सरकार बनाने में कामयाब हुआ। इसलिए इस परिवार को ऐसी किसी दहशत में रहने की कोई जरूरत भी नहीं है कि एक बार पार्टी की कमान किसी बाहरी के हाथ चली गई, तो वह घर में लौटेगी ही नहीं। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि काबिल मालिक वे नहीं होते हैं, जो कि अपने कारोबार को बर्बाद करने की हद तक खुद चलाते हैं, काबिल मालिक वे होते हैं जो काबिल मैनेजर रखकर उसके हाथों कारोबार को कामयाब बनाते हैं।

किसी पार्टी में इतनी जिंदगी बाकी भी रहना चाहिए कि वह सबसे आसानी से हासिल एक विकल्प से परे सोचने की मशक्कत भी कर सके। बिना ऐसी मशक्कत के, पार्टी के बाकी लोगों के सामने बिना किसी संभावना के पार्टी मुर्दा होने लगती है। आज देश में बहुत से ऐसे कांग्रेस नेता हो सकते हैं जो कि पार्टी को राहुल या सोनिया के मुकाबले बेहतर तरीके से चला सकें। पार्टी के नेताओं की क्षमता को कम नहीं आंकना चाहिए। कांग्रेस में प्रदेश स्तर पर भी कई ऐसे नेता हाल के बरसों में उभरकर सामने आए हैं जिन्होंने बड़ी उम्मीदें जगाई हैं। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए जिस दम-खम के साथ भाजपा की रमन सरकार का विरोध किया था, और जिस अभूतपूर्व-ऐतिहासिक बहुमत के साथ उन्होंने कांग्रेस की सरकार बनाई, कुछ वैसी ही मेहनत और लड़ाई की जरूरत कांग्रेस को देश भर में है।

राहुल, सोनिया, और प्रियंका से परे की कांग्रेस लीडरशिप, कांग्रेस विरोधी पार्टियों, खासकर भाजपा, के हाथों से एक बड़ा मुद्दा भी छीनकर ले जाएंगे। कुनबापरस्ती या व्यक्तिवादी पार्टी का भाजपा का आरोप हमेशा ही कांग्रेस के खिलाफ एक आसान और सदासुलभ हथियार रहा, फिर चाहे उसके अपने साथियों में से अधिकांश ठीक इसी तरह के व्यक्तिवादी और कुनबापरस्त क्यों न रहे हों। भाजपा ने समय-समय पर, और सबसे लंबे समय तक शिवसेना और अकाली दल इन दो पार्टियों पर सवारी की है, और दोनों ही परले दर्जे की व्यक्तिवादी और कुनबापरस्त पार्टियां रही हैं। ठीक ऐसी ही पार्टी बसपा के साथ भी भाजपा की भागीदारी रही है, और एनडीए की दूसरी पार्टियों में दर्जन भर पार्टियां ऐसी ही खूबी या खामी वाली रही हैं। फिर भी भाजपा का अकेला हमला कांग्रेस पर ही होते आया है, और वह भी किसी गैरगांधी पार्टी अध्यक्ष रहने से बेअसर हो जाएगा।

जो भी कारोबार, या राजनीतिक-सामाजिक काम अधिक चुनौतियों भरे होते हैं, उनमें नया खून हमेशा ही कुछ न कुछ बेहतर संभावनाएं ला सकता है। कांग्रेस को अपने इस राज परिवार की आम सहमति के बाद इनकी हसरत और इनकी जरूरत की इज्जत करनी चाहिए, और अपने आपको एक दीवालिया पार्टी न मानकर दूसरा नेता चुनना चाहिए। हो सकता है कि देश और प्रदेशों में कांग्रेस पार्टी नए लोगों के बारे में सोचे, तो इसके भीतर एक लोकतांत्रिक उत्साह भी आए। अगले आम चुनाव में अभी खासा वक्त है, और यही सही समय है कि पार्टी किसी और को अगर मुखिया चुनने जा रही है तो वह अभी चुना जाना चाहिए, छांटा जाना चाहिए।

Facebook Comments
(Visited 1 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.