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तीन सदस्यीय कमेटी यानि गहलोत के गले में घंटी..

तीन सदस्यीय कमेटी यानि गहलोत के गले में घंटी..

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अपनी सरकार बचाने के साथ बढ़ती लोकप्रियता एवम् राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए उछलते नाम से मुख्यमत्री गहलोत की गांधी परिवार से बढ़ने लगी दूरियां.. सता और संगठन पर लगाम लगाने हेतु आलाकमान ने गठित की थी कमेटी तो गहलोत के गले में बंधी घंटी.. गहलोत कोई बड़ा निर्णय नहीं ले पायेंगे और न कर पाएंगे कोई मनमानी..

-ओम भाटिया||

दस जनपथ गांधी परिवार के वफादार माने जाने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की क्या गांधी परिवार से दूरियां बढ़ने लगी है। जिस तरह से गहलोत को बिना विश्वास में लिये सचिन पायलट की घर वापसी करवाई गई है तथा पायलट की मांग पर प्रदेश प्रभारी अविनाश पाण्डे को हटाने के साथ सत्ता व संगठन पर लगाम कसने के लिए तीन सदस्य कमेटी का गठन किया गया है उससे तो यही लगता है कि मुख्यमंत्री गहलोत व दस जनपथ के बीच रिश्तों में अब पहले जैसी बात नहीं रही। कांग्रेस व कांग्रेस समर्थित सरकारों को एक के बाद एक शिकार करने में सफल रहे भाजपा के सिद्धहस्त शिकारियों को मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा मात देने से उनकी बढ़ती लोकप्रियता व राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिये उछलते नाम ने भी दोनों के बीच दूरियां बढ़ाने का ही काम किया है।
बनते-बिगड़ते रिश्तों का नाम ही राजनीति है, जहां कब दुश्मन दोस्त बन जाता है और वर्षों पुराना वफादार दोस्त, दुश्मन की श्रेणी में खड़ा हो जाता है कहा नहीं जा सकता। ऐसे ही कुछ हालात प्रदेश की कांग्रेस राजनीति में देखने को मिलने लगे हैं। वर्षों से गांधी परिवार के नजदीकी व वफादार रहे मुख्यमंत्री गहलोत पर अब गांधी परिवार का भरोसा दरकने लगा है जैसी खबरे अब राजनैतिक गलियारों में चर्चा का मुख्य विषय बनती जा रही है।


गहलोत की बढ़ती लोकप्रियता रास नहीं आ रही गांधी परिवार को
कांग्रेस में नेहरू काल हो, या फिर इन्दिरा का युग रहा हो या फिर राजीव से लेकर सोनिया व राहुल का जमाना क्यों न रहा हो, इन सबमें कोई एक बात काॅमन रही है तो यही कि इनके साथ में चलने वाला कोई भी कांग्रेसी नेता लोकप्रियता के शिखर पर चढता नजर आये तो वह इस परिवार की आंख में खटकने लगता है, इन्हें उस नेता की आंखों में अपने लिये चुनौती नजर आने लगती है। आजादी से लेकर अब तक सैकड़ों ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि समय से पहले ही ऐसे नेताओं के पंख कतर कर उन्हें उड़ना तो दूर, चलने के भी लायक नहीं छोड़ते। मुख्यमंत्री गहलोत ने पिछले 40-50 दिनों से अपने अकेले दम पर सत्ता का शिकार करने के माहिर भाजपाई नेताओं से जो लोहा लिया। ई.डी. से लेकर इंकम टेक्स व सी.बी.आई. से लेकर राजभवन तक के वारों को झेला, खरीद-फरोख्त से अपने विधायकों को बचाये रखने के लिये बाड़ेबन्दी की, यह सब गहलोत ने अकेले अपने दमखम पर ही किया। परिणामस्वरूप शेर के मुंह में शिकार होने के लिये गई हुई अपनी सरकार को शेर के जबड़े में हाथ डालकर वापिस निकाल लिया। गहलोत की लोकप्रियता बढ़नी स्वाभाविक ही थी। लोकप्रियता के साथ-साथ गहलोत का बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिये उछलते नाम ने भी गांधी परिवार के बीच में दूरिया बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रख दी।

गहलोत को विश्वास तक में नहीं लिया सचिन की घर वापसी में

सरकार को बचाने में सफल रहे गहलोत को विश्वास था कि ‘सरदार खुश होगा, शाबासी देगा’ लेकिन हुआ इसका उल्टा ही। गांधी परिवार ने सचिन पायलट की बिना माफी मांग्रे घर वापसी करवाकर गहलोत की इतनी दिनों तक की गई सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। पायलट की बगावत से पहले जो हालात थे, उसी हालातों में लाकर वापिस छोड़ दिया। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री गहलोत को इस बात का बड़ा गहरा झटका लगा कि पायलट से गांधी परिवार की चलने वाली बातों में न तो गहलोत को सम्मिलित किया गया और न ही उनकी कोई राय सलाह ली गई। परिणाम यह रहा कि मारवाड़ी कहावत के अनुसार पायलट को पुनः उनकी छाती पर मूंग दडने के लिये लाकर बिठा दिया गया।

विधायकों की नाराजगी की खबर ने भी आलाकमान को किया नाराज

जब गांधी परिवार ने सचिन की घर वापसी की हरी झण्डी बता दी तो उसके बाद होटल सूर्यागढ़ में गहलोत समर्थक विधायकों की नाराजगी भरी बयानबाजी की खबरों ने कांग्रेस आलाकमान को नाराज कर दिया। आलाकमान का मानना था कि विधायकों की नाराजगी गहलोत के इशारे पर हुई थी तथा उनके लिए गए इस निर्णय को विधायकों के जरिये चुनौती दिये जाने का प्रयास भर था, यही कारण है कि आलाकमान द्वारा गहलोत की बढ़ती ताकत के पर कतरने की खातिर पायलट की पहली मांग पूरी करते हुए प्रभारी अविनाश पाण्डेय को तो हटाया ही, वहीं सत्ता व संगठन पर नकेल कसने के लिये तीन सदस्यों की कमेटी का गठन कर दिया, जिसके चलते अब गहलोत कोई बड़ा निर्णय स्वतंत्र रूप से नहीं कर पायेंगे।

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