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अपने को अतिरिक्त सम्मान का हकदार बना अदालतें लोकतंत्र के खिलाफ हैं..

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-सुनील कुमार।।

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े की एक परदेसी मोटरसाइकिल सवारी पर सुप्रीम कोर्ट के एक प्रमुख वकील और एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण की ट्वीट को सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की अवमानना माना है, और अभी दो दिन बाद अदालत उनकी सजा तय करेगी। प्रशांत भूषण ऐसी सजा से डरने वाले वकील नहीं हैं, उन्होंने अपने पिता, देश के एक वरिष्ठ वकील और भूतपूर्व कानून मंत्री के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट के बहुत से जजों के भ्रष्ट होने की बात कई बार औपचारिक रूप से कही थी, और शायद 10 बरस पहले से वह अवमानना केस भी चल रहा था, और अब शायद उसे भी खोला जा रहा है।

हम कुछ दिन पहले इस मुद्दे पर लिख चुके हैं कि हम प्रशांत भूषण के तर्क से सहमत हैं कि कोई जज सुप्रीम कोर्ट नहीं होता, और किसी जज के तौर-तरीकों की आलोचना अदालत की आलोचना नहीं हो सकती। हमारा खुद का यह मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अपने गृहनगर नागपुर में सुबह की सैर पर थे, और वहां खड़ी एक बहुत महंगी विदेशी मोटरसाइकिल को देखकर उनका पुराना शौक जाग गया, और वे मोटरसाइकिल पर बैठकर उसे महसूस करने लगे। इसे लेकर देश में सैकड़ों कार्टून बने, और लाखों ट्वीट की गईं। जाहिर है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को इस तरह सार्वजनिक रूप से देखना देश को बहुत बार तो नसीब होता भी नहीं है। सीजेआई की आलोचना करने वाले भी हजारों लोग थे कि एक भाजपा नेता के बेटे की मोटरसाइकिल पर इस तरह बैठना उन्हें शोभा नहीं देता। हम तो शोभा के ऐसे पैमानों पर भरोसा नहीं करते लेकिन फिर भी चूंकि देश का सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, और यहां तक कि छोटी अदालतें भी अपने मान-सम्मान को लेकर छुईमुई के पौधे की पत्तियों की तरह संवेदनशील रहती हैं, इसलिए उन्हें कम से कम यह सोचना चाहिए कि अपने सार्वजनिक बर्ताव से वे हॅंसी-मजाक या हिकारत का सामान न बनें।

अब जब यह मुद्दा बन ही गया, और प्रशांत भूषण जैसे दसियों हजार लोगों ने सोशल मीडिया पर अदालत की जमकर चर्चा की, जज की बाईक सवारी की आलोचना की, और अदालत ने सुनवाई करके इसे अपनी अवमानना मान ही लिया, तो देश को आज इस पर चर्चा करनी चाहिए। यह देश अंग्रेजों के उन रीति-रिवाजों से आजाद नहीं हुआ जिन पर इस देश का सुप्रीम कोर्ट और बाकी की न्यायपालिका अभी चलते हैं। अंग्रेजों को अपने ठंडे देश में माकूल बैठने वाली जो काली पोशाक हिन्दुस्तान की सत्ता पर ठीक लगती थी, वही काला बोझ हिन्दुस्तानी न्यायपालिका आज तक ढो रही है। जब धरती खौलती रहती है, तब भी अदालतें वकीलों से काले लबादे में वहां पहुंचने की उम्मीद करती हैं। लेकिन हिन्दुस्तान का लोकतंत्र अंग्रेजों के छोड़े हुए ऐसे लबादों को नहीं ढोता। यह लोकतंत्र एक जिंदा लोकतंत्र है, इसने इमरजेंसी भी देखी है, उससे भी उबरा है, कई और किस्म की तानाशाही भी देखी हैं, उनसे भी उबरा है। इस देश का इतिहास गांधी के आंदोलन का है जो कि उस वक्त की सत्ता से असहमति रखने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाते थे। इस देश को अपने ऐसे गौरवशाली लोकतांत्रिक इतिहास को याद रखना चाहिए, और देश के जो लोग सुप्रीम कोर्ट के रूख से सहमत नहीं हैं, उन्हें अदालत के रूख के खिलाफ एक सविनय अवज्ञा आंदोलन छेडऩा चाहिए।

आज प्रशांत भूषण की जिस ट्वीट को लेकर सुप्रीम कोर्ट इस कदर संवेदनशील हो गया है, वह आज भी सोशल मीडिया पर मौजूद है। जिन लोगों को लगता है कि प्रशांत भूषण सही हैं, उनके पास आज भी यह हक हासिल है कि वे उस ट्वीट को री-ट्वीट करके कहें कि वे प्रशांत भूषण की बात से सहमत हैं, और वे अपने आपको अदालत के सामने पेश कर रहे हैं कि जो सजा प्रशांत भूषण की, वही सजा उन्हें भी दी जाए।

सविनय अवज्ञा का आजाद हिन्दुस्तान में यह कोई पहला मौका नहीं रहेगा, और न ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से, उसके रूख से, उसके जजों के सार्वजनिक बर्ताव से असहमति का यह पहला मौका रहेगा। लेकिन लोकतंत्र अदालत से ऊपर है, अदालत लोकतंत्र का एक हिस्सा है, पूरा का पूरा लोकतंत्र नहीं। इसलिए अदालत के इस रूख और प्रशांत भूषण को गुनहगार ठहराने से असहमत लोगों के सामने आज भी यह मौका है कि वे अगले दो दिनों में अपनी असहमति को इतिहास में दर्ज कराएं, और सुप्रीम कोर्ट को यह अहसास कराएं कि उसे महज प्रशांत भूषण को सजा नहीं देनी होगी, हजारों, दसियों हजार, या शायद लाखों लोगों को सजा देनी होगी।

यह तो हिन्दुस्तान में अदालतों को लेकर एक निहायत ही गैरजरूरी लिहाज बरता जाता है। अमरीका में देखें तो वहां किसी को जज बनाने के पहले लंबी-चौड़ी खुली संसदीय सुनवाई चलती है, और संभावित जज से उसकी निजी जिंदगी, उसकी निजी सोच पर कई-कई दिन तक सवाल पूछे जाते हैं। वहां पर अदालतों में जब कोई नाजुक मामला फैसले तक पहुंचता है, तो सुनवाई के वक्त भी, और फैसले के दिन भी मामले के पहलुओं से जुड़े हुए लोग अदालत के बाहर सडक़ों पर प्रदर्शन करते हैं, बैनर-पोस्टर लेकर नारे लगाते हैं, और खुलकर अपनी बात रखते हैं। आज हिन्दुस्तान में अगर ऐसा हो तो उसे जजों को प्रभावित करने वाला काम मान लिया जाएगा, और उसे अदालत की अवमानना भी मान लिया जाएगा।

इस देश में संसद और उसकी तर्ज पर विधानसभाओं ने अपने आपको जनता की प्रतिक्रियाओं से महफूज रखने के लिए अलग कानून बना रखे हैं। कुछ बातों को अदालत अपनी अवमानना मानती है, और इस देश की संसदीय व्यवस्था कुछ बातों को अपने विशेषाधिकार का हनन मानती है। संसद और विधानसभाओं को अपार अधिकार दिए गए हैं कि उनका विशेषाधिकार भंग करने वाले लोगों को वे कितनी भी सजा दे सकती हैं। अदालतों की सुनाई गई सजा की तो सीमा है, लेकिन सदन किसी को कितनी भी सजा दे सकता है। यह पूरा सिलसिला अलोकतांत्रिक है। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। किसी एक जज के अधिकार, किसी एक सांसद या विधायक के अधिकार देश के आम नागरिकों के अधिकार से अधिक कैसे हो सकते हैं? अगर अस्पताल में लोग जाकर किसी डॉक्टर को पीटते हैं, तो उस डॉक्टर का क्या कोई विशेषाधिकार हनन होता है? क्या यह उस डॉक्टर की अवमानना गिनी जाती है? उस डॉक्टर के पास पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने, अदालत में केस करने की आजादी रहती है, और उतना ही हक भी रहता है। अदालत या संसद को इससे अधिक कोई हक क्यों होना चाहिए? किसी मामले की सुनवाई के दौरान अगर कोई वकील या गवाह जजों के साथ बदसलूकी करते हैं, तो भी उसके लिए आपराधिक मामला चलाने का एक प्रावधान रहना चाहिए, न कि जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाले लोग उसे अपनी अवमानना मानें। ऐसा मानना यही जाहिर करता है कि जजों और सांसद-विधायकों में लोकतंत्र के लिए संविधान में लिखे गए शब्दों भर की समझ है, और लोकतंत्र की भावना उन्हें छू नहीं गई है। जनता के बीच से आंदोलन खड़ा होना चाहिए ताकि यह सिलसिला खत्म हो सके। देश के किसी भी आम नागरिक, सरकार के किसी भी आम कर्मचारी के अधिकार, उनका सम्मान जजों और सांसद-विधायकों से कम कैसे हो सकता है? इसलिए चुनिंदा तबके अपने सम्मान के पुतले खड़े करें, और फिर उनकी हिफाजत के लिए बंदूकों का घेरा डलवा दें, यह लोकतंत्र नहीं है। संविधान की भावना के खिलाफ जाकर इस देश के ताकतवर तबके ऐसे नियम बनाते आए हैं जो अलोकतांत्रिक हैं। इस काम में संसद और विधानसभाओं के भी मुकाबले न्यायपालिका बहुत आगे है, और उसने अपने आपको लोकतंत्र में अपनी भूमिका के मुकाबले बहुत अधिक और अतिरिक्त सम्मान का केन्द्र बनाकर रखा हुआ है। हम ऐसे भेदभाव के खिलाफ हैं। अदालतों को या किसी भी और संवैधानिक संस्था को ऐसे विशेषाधिकार देना आम जनता के नागरिकता के बुनियादी अधिकारों के खिलाफ है।

आज इस देश में जो लोकतांत्रिक आंदोलनकारी हैं, उनके सामने यह एक मौका है कि वे अपने आपको प्रशांत भूषण के साथ खड़ा दिखाएं, और इसकी राह तो गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन से दिखाई ही थी। अंग्रेजों के कानूनों की परवाह करके अगर गांधी उस यथास्थिति को बने रहने देते, तो देश तो कभी आजाद होता ही नहीं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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