आत्महत्याओं की इतनी भयानक संख्याओं को आखिर कैसे घटाएं?

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-सुनील कुमार।।
राजस्थान से कल ही एक दिल दहलाने वाली खबर आई थी कि पाकिस्तान से आए हुए विस्थापित परिवार के 11 लोगों की लाशें एक साथ मिली थीं। और कुछ न भी हो तो इतनी बड़ी संख्या और कहीं सुनाई पड़ी हो ऐसा याद नहीं पड़ता। हादसे के वक्त बाहर गए हुए परिवार के एक जिंदा रह गए सदस्य से आज पता लगा कि पूरा परिवार भारी तनाव से गुजर रहा था, परिवार की एक बहू के साथ पूरे घर की मुकदमेबाजी चल रही थी, और दोनों तरफ से बहुत सारी रिपोर्ट की गई थीं, बहुत से मुकदमे चल रहे थे, और यह परिवार उससे त्रस्त था। ऐसे में इस परिवार की एक लडक़ी, जो कि पाकिस्तान में प्रशिक्षित नर्स थी, उसने बारी-बारी से 10 लोगों को जहर का इंजेक्शन लगाया, और आखिर में खुद भी अपने को इंजेक्शन लगाकर मर गई। यह बयान पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मेल खाता है जिसमें सभी 11 लोगों की मौत जहरीले इंजेक्शन से होना बताई गई है। यह परिवार खेत में एक मकान में रहता था, और शायद वहीं मजदूरी का काम करता था। ये दोनों परिवार कई तरह के जादू-टोने में भी फंसे हुए बताए गए हैं, और गरीबी के शिकार भी थे।

लोगों का अगर ध्यान न गया हो, तो यह सोचने और समझने का मौका है कि लॉकडाऊन और कोरोना के चलते आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। सीधे-सीधे इसका कोरोना से रिश्ता चाहे न हो, लेकिन बेकारी, बेरोजगारी, और बीमारी की दहशत जैसी कई बातें लोगों के पहले से चले आ रहे किसी और किस्म के तनाव से जुडक़र इतना बड़ा असर बन रही हैं कि लोग आत्महत्या कर रहे हैं।

हिन्दुस्तान वैसे भी निजी और सामाजिक वजहों से ऐसी आत्महत्याओं का शिकार है जो कि दुनिया के बहुत से सभ्य और विकसित देशों में बिल्कुल नहीं हैं। लडक़ा-लडक़ी एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, और समाज, परिवार उन्हें शादी की इजाजत नहीं देता, और वे जाकर खुदकुशी कर लेते हैं कि साथ जी न सके तो क्या हुआ, साथ मर तो सकते हैं। छत्तीसगढ़ में कल ही एक ऐसा दर्दनाक हादसा हुआ है जिसमें एक प्रेमीजोड़ा ट्रेन के सामने कूद गया, लडक़ी मर गई, और लडक़ा अस्पताल में है। आए दिन कहीं न कहीं प्रेमीजोड़े एक साथ किसी पेड़ से टंग जाते हैं, किसी और तरीके से एक साथ जान दे देते हैं। हिन्दुस्तान में किसानों की आत्महत्या कुछ समय पहले तक बहुत बड़ा मुद्दा थी, और फिर राजनीतिक असुविधा से बचने के लिए राज्यों की सत्तारूढ़ पार्टियों ने किसानों की आत्महत्या को किसानी से जोडक़र लिखना ही बंद कर दिया, और कई राज्यों में तो किसानों की आत्महत्या को अवैध संबंधों, या प्रेमसंबंधों की वजह से लिखा जाने लगा। तोहमत सरकार से हटकर किसान पर ही आ गई, और उसका चाल-चलन मरने के बाद भी खराब कर दिया गया।

हिन्दुस्तान की मनोचिकित्सा की, और परामर्श की क्षमता इतनी सीमित है कि शहरी और संपन्न तबके से परे आमतौर पर यह बाकी लोगों को नसीब नहीं होती। जब मानसिक परेशानियां हिंसक होने लगती हैं, तभी गांव के लोग और गरीब लोग किसी तरह किसी मनोचिकित्सक के पास पहुंचते हैं, और यह हमारा खुद का देखा हुआ है कि कामयाब और व्यस्त मनोचिकित्सक एक-एक दिन में सौ-पचास मरीजों को देखते हैं, उन्हें अंधाधुंध दवाईयों पर रखते हैं, और परामर्श से जो चिकित्सा होनी चाहिए उसे भी समय की कमी की वजह से दवाईयोंं की तरफ धकेल दिया जाता है। कुल मिलाकर हालत यह है कि आत्महत्या की कगार पर पहुंचने के पहले तक लोगों को परिवार, समाज, आसपास के बराबरी के लोग, इनसे किसी से परामर्श नहीं मिल पाते, और न ही निजी संबंधों को लेकर किसी परामर्श का कोई रिवाज है, इसलिए जब लोगों पर पारिवारिक और सामाजिक दबाव बढ़ता है, तनाव बढ़ता है तो वे बहुत रफ्तार से आत्महत्या की तरफ बढ़ जाते हैं।

भारतीय समाज के साथ एक दिक्कत यह है कि लोगों को अपनी मर्जी से शादी करने की छूट तो परिवार से मिलती नहीं है, जवान हो चले बच्चे किस रंग का फोन खरीदें, किस रंग का दुपहिया लें, इस पर भी उनकी नहीं चलती है। मां-बाप और बाकी परिवार मानो पूरी जिंदगी अपने जवान बच्चों को बच्चे ही बनाकर रखना चाहते हैं, और देश में शायद आत्महत्या की सबसे बड़ी वजहों में से एक यह भी है। नौजवान पीढ़ी को किसी तरह की आजादी न मिलना जानलेवा साबित हो रहा है।

लेकिन निजी दिक्कतों से परे यह समझने की जरूरत है कि देश में आज बहुत से ऐसे धर्म और जाति के लोग हैं जो लगातार तनाव और दहशत में जी रहे हैं। जिन पर उनके धर्म की वजह से लगातार हमले होते हैं, जिनको उनकी जाति की वजह से लगातार मारा जाता है, और इस देश का मुर्दा हो चला संविधान, और पहले से नेत्रहीन चली आ रही न्यायपालिका मिलकर भी इनके लिए कुछ नहीं कर पा रहे। ऐसे तनाव इन समाजों के लोग अगर अधिक संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं तो हम उसे कोई निजी वजह नहीं मानते, यह साफ-साफ देश के खराब माहौल की वजह से पैदा तनाव है, और सरकार-समाज इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं। फिर आज देश की अर्थव्यवस्था जिस तरह चौपट हुई है, करोड़ों लोग रोजगार खो रहे हैं, करोड़ों लोग पहले से रोजगार की तलाश में थे, लोगों के पास खाने-पीने की भी दिक्कत हो रही है, बाकी जरूरतें तो मानो सपने की बात हैं। ऐसे परिवारों के लोग भी आत्महत्या कर रहे हैं।

फिर हमारे सरीखे अखबारनवीस, और बाकी मीडिया के लोग हैं जो आत्महत्याओं की खबरों को इतने खुलासे से, टंगी हुई लाशों की तस्वीरों के साथ छापते हैं, कि जिन्हें पढक़र, देखकर, या सुनकर तनावग्रस्त लोगों को वह एक रास्ता दिखता है कि और लोग भी आत्महत्या कर रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में हमने लगातार जानकार विशेषज्ञ लोगों से राय लेकर इस अखबार में ऐसी खबरों को अधिक सावधानी के साथ बनाने, और छापने, या पोस्ट करने का काम किया है, जो कि इस जागरूकता के पहले तक नहीं किया था। देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले कुछ गैरसरकारी संगठन लगातार मीडिया के प्रशिक्षण का काम कर रहे हैं, ताकि उन्हें इस बारे में अधिक संवेदनशील बनाया जा सके। लेकिन इस मोर्चे पर और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है क्योंकि मीडिया में जो लोग ऐसी खबरों को बनाते हैं, उन्हें एक सनसनीखेज सुर्खी की गुंजाइश इसमें दिखती है, और संवेदनशीलता की कोई सीख-समझ उन्हें मिली नहीं रहती।

कुल मिलाकर हिन्दुस्तान में आज आत्महत्याओं की जो हालत है उसे देखते हुए हमें अपनी एक पुरानी नसीहत दुहराना जरूरी लग रहा है कि मनोचिकित्सकों के पहले परामर्शदाताओं की बहुत बड़ी संख्या की जरूरत है जिससे कि मनोचिकित्सा की नौबत कम आए। और ऐसे परामर्शदाताओं को तैयार करने के लिए विश्वविद्यालयों में मनोविज्ञान के तहत ऐसे कोर्स शुरू करने पड़ेंगे, उसमें बड़ी संख्या में लोगों को तैयार करना पड़ेगा, और ऐसे शिक्षित-प्रशिक्षित लोगों के लिए सरकार और समाज को रोजगार या स्वरोजगार के बारे में भी सोचना पड़ेगा। ऐसा जब तक नहीं होगा, तब तक समाज के लोगों को भी खुद होकर अपनी संवेदनशून्यता नहीं दिखेगी।

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