गरीबों का पैसा बड़े लोगों पर निजी अस्पतालों में क्यों खर्च हो.?

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-सुनील कुमार।।
अभी एक किसी केन्द्रीय मंत्री के एम्स में भर्ती होने को लेकर सोशल मीडिया पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है जो कि भाभीजी-पापड़ से कोरोना ठीक करने एक किसी दावे की वजह से पिछले कुछ हफ्तों से लगातार खबरों में थे। हाल के बरसों में किसी केन्द्रीय मंत्री का जितना मखौल इस बयान की वजह से उड़ाया गया था, वैसा शायद कम ही लोगों के साथ हुआ होगा। लेकिन अब जब यह केन्द्रीय मंत्री खुद कोरोनाग्रस्त हुए, तो ये जाकर एम्स में भर्ती हुए। दूसरी तरफ कुछ जगहों पर यह खबर भी आई है कि गृहमंत्री अमित शाह कोरोनाग्रस्त होकर दिल्ली के एक सबसे महंगे निजी अस्पताल में भर्ती हुए थे, और उन्हें देखने के लिए एम्स से डॉक्टर भेजे गए थे। शशि थरूर जैसे कांग्रेस सांसद ने सोशल मीडिया पर यह भी लिखा था कि अमित शाह को निजी अस्पताल के बजाय सरकारी एम्स में भर्ती होना था, लेकिन आनन-फानन शशि थरूर के जवाब में सोशल मीडिया पर यह खबर लोगों ने चिपकाई कि सोनिया गांधी दिल्ली के एक बड़े नामी निजी अस्पताल में उसी वक्त भर्ती हुई हैं, और वे एम्स क्यों नहीं गईं?

आज यहां पर इस मुद्दे पर लिखते हुए किसी एक नेता या किसी एक पार्टी को निशाना बनाना मकसद नहीं है। हिन्दुस्तान में जब जिस नेता को इलाज की जरूरत पड़ती है, वे देश के सबसे महंगे अस्पतालों में तो जाते ही हैं, विदेश भी जाते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी को अमरीका में इलाज की जरूरत थी, तो उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें संयुक्त राष्ट्र जा रहे भारतीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल का मुखिया बनाकर भेजा था ताकि उनका इलाज भी हो जाए। इस बात का जिक्र खुद वाजपेयी ने बड़ी उदारता के साथ सार्वजनिक रूप से एक से अधिक बार किया था। इसलिए अपने इलाज के लिए जिसे जहां जाना हो, वह उनकी अपनी मर्जी की बात है, और उनके परिवार के लोकतांत्रिक अधिकार की बात भी है।

लेकिन यहां कुछ बुनियादी सवाल खड़े होते हैं जिनको हम किसी एक नेता या पार्टी की मिसाल के बिना उठाना चाहते हैं। जब ऐसे नेता संसद या सरकार के खर्च पर इलाज करवाते हैं, तो वहां पर संसद और सरकार की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे वाले इस देश की जनता का पैसा किस हद तक इसके निर्वाचित नेताओं पर खर्च हो, अफसरों और जजों पर खर्च हो। इन सभी तबकों में निजी संपन्नता वाले लोग भी रहते हैं, और बहुत से लोग ऐसे भी रहते हैं जिनके परिवारों के पास अपनी कमाई भी रहती है। कई जज ऐसे रहते हैं जिन्होंने वकालत करते हुए करोड़ों रूपए कमाए हों, और अब जज की हैसियत से वे मुफ्त सरकारी इलाज के हकदार हों। ऐसा ही कई केन्द्रीय मंत्रियों के साथ हो सकता है, सांसदों और विधायकों के साथ हो सकता है।

लेकिन कुछ अरसा पहले उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले को इस सिलसिले में देखना जरूरी है जिसमें कहा गया था कि राज्य के अफसर और मंत्री अपने बच्चों को सिर्फ सरकारी स्कूल में पढ़ाएं। हम उस बात से सैद्धांतिक रूप से सहमत थे, लेकिन उस वक्त भी हमने लिखा था कि यह फैसला ऊपर की अदालत में जाकर टिक नहीं पाएगा क्योंकि किसी परिवार के बच्चों पर काबू करना अदालत के दायरे से बाहर है, फिर चाहे वह परिवार किसी मंत्री का हो, या किसी अफसर का हो। बच्चे अफसर की संपत्ति नहीं होते हैं कि उन पर सरकार का ऐसा नियंत्रण रहे कि वे कहां पढ़ाई करें, और कहां इलाज करवाएं।

लेकिन जब इलाज का खर्च सरकार देती है, तब सरकार यह तय कर सकती है कि वह निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च तब तक नहीं उठाएगी, जब तक सरकारी अस्पतालों में वह इलाज उपलब्ध ही न हो। देश की जनता का यह हक है कि वह अपने पैसों पर तनख्वाह, भत्ते, और इलाज पाने वाले अफसरों-नेताओं, जजों और सांसद-विधायकों के उस महंगे इलाज का खर्च उठाने से मना कर दे जो कि सरकारी अस्पतालों में हासिल है।

लेकिन सवाल यह है कि सत्ता में बैठे लोग, निर्वाचित जनप्रतिनिधि, और ऐसी किसी संभावित जनहित याचिका पर सुनवाई करने वाले जज ही तो ऐसी सहूलियतों के हकदार हैं, वे भला क्यों ऐसी बंदिश को बढ़ावा देंगे? जिस तरह आरक्षित तबकों के भीतर क्रीमीलेयर को आरक्षण के फायदों से बाहर करने के मुद्दे पर हिन्दुस्तान के सारे ताकतवर तबके एक साथ गिरोहबंदी कर लेते हैं, और कभी क्रीमीलेयर को लागू नहीं होने देते। ठीक उसी तरह निजी अस्पतालों में इलाज पर अगर रोक लगाई जाएगी, तो वह भी किसी ताकतवर को बर्दाश्त नहीं होगी। और हम ऐसी किसी रोक की बात नहीं कर रहे हैं कि ये लोग अपनी मोटी तनख्वाह से खर्च करके निजी इलाज न करवाएं, हम तो महज एक ऐसी रोक की बात कर रहे हैं कि सरकारी खर्च पर ऐसा इलाज न करवाया जाए जो सरकार के अच्छे अस्पतालों में हासिल है। अगर कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका, संवैधानिक दूसरे पदों पर बैठे हुए लोग अपने ओहदों की कानूनी सहूलियतों के मुताबिक निजी अस्पतालों से ही इलाज करवाएंगे, तो उससे तो सरकारी अस्पताल और पिछड़ते चले जाएंगे।

आज हिन्दुस्तान में पिछले चार-पांच महीनों में यह अच्छी तरह देख लिया है कि कोरोना से निपटने के लिए तमाम खतरे झेलते हुए भी देश के सरकारी अस्पताल ही सबसे पहले उपलब्ध थे। नेहरू को रात-दिन उन तमाम बातों के लिए कोसा जाता है जो उन्होंने नहीं की हैं, और जो उन्होंने किया है, उन एम्स के लिए नेहरू के नाम की चर्चा भी नहीं होती। आज हिन्दुस्तान में कोरोना से लड़ाई में देश के तमाम एम्स सबसे आगे रहे, और बात महज कोरोना की नहीं है, पिछली आधी सदी में, जबसे एम्स बने हैं तबसे वे अपने इलाकों में लोगों की इलाज के लिए पहली पसंद रहते हैं, और वे निजी अस्पतालों के मुकाबले बेहतर माने जाते हैं। कोरोना के महामारी बनने के वक्त को देश के सारे निजी अस्पताल कन्नी काटने लगे थे, वे कोरोना के मरीजों को देखना ही नहीं चाहते थे, देश में दर्जनों मौतें हो गई क्योंकि निजी अस्पतालों ने कोरोना का खतरा मानकर दूसरी बीमारियों की मरीजों को भी भर्ती करने से मना कर दिया था।

ऐसे में हिन्दुस्तान को अपने आक्रामक निजीकरण के बीच सरकार की अस्पतालों की अहमियत को अनदेखा नहीं करना चाहिए। सत्ता की ताकत वाले हिन्दुस्तान के तमाम लोग बड़े निजी अस्पतालों में इलाज कराकर उसका बोझ गरीब जनता की जेब पर डाल सकते हैं, लेकिन गरीब जनता के लिए बड़े इलाज की जगह आज भी एम्स या ऐसे दूसरे बड़े सरकारी अस्पताल हैं।

अमित शाह हों, सोनिया गांधी हों, या कोई दूसरे जज हों, इन सबके लिए निजी इलाज पर सरकारी खर्च खत्म कर दिया जाना चाहिए। न मंत्री, न अफसर, न जज, न राष्ट्रपति, न राज्यपाल या मुख्यमंत्री, न सांसद, न विधायक, और न ही दूसरे संवैधानिक ओहदों पर बैठे लोग, इनमें से किसी को भी निजी अस्पताल के खर्च का हक नहीं रहना चाहिए। इन सबकी तनख्वाह भी इतनी रहती है कि वे हेल्थ बीमा खरीदकर, या सीधा भुगतान करके देश की गरीब जनता पर बोझ बनने से बच सकते हैं। केन्द्र सरकार को अगर निजीकरण करना है, तो वह इन्हीं तमाम ताकतवर ओहदों पर बैठे लोगों के बंगलों को खत्म करके उन्हें किराए की पात्रता देकर कर सकती है। आज एक-एक ओहदे वाले पर सरकार का मकान का खर्च ही करोड़ों रूपए साल का होता है, और बड़े बंगले तो दिल्ली में सैकड़ों करोड़ के एक-एक हैं। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए, हर ओहदे के साथ एक भाड़े का पैमाना जुड़ा रहे, और फिर लोग उससे मकान खरीदें, या किराए से लेकर रहें, इसे वे जानें।

जिस बात से आज यहां लिखना शुरू किया गया, वह जाहिर तौर पर नाजायज और गैरजिम्मेदार बातों से उपजी है। कुछ लोग देश के लोगों को पापड़ से ठीक कर रहे हैं, कुछ लोग एक फर्जी आयुर्वेदिक कंपनी की दवाओं से ठीक कर रहे हैं, कुछ लोग दीया जलाकर, कुछ लोग थाली-चम्मच बजाकर कोरोना मरीजों को ठीक कर रहे हैं। गैरजिम्मेदारी का यह सिलसिला भी खत्म होना चाहिए क्योंकि अब यह साफ हो गया है कि जब रामदेव के दाएं हाथ बालकृष्ण को भी इलाज की जरूरत पड़ती है, तो ये भागे-भागे एलोपैथिक अस्पताल ही जाते हैं, किसी गौशाला जाकर गोमूत्र नहीं पीते। ये तमाम बातें सीधे-सीधे महामारी-कानून के तहत जुर्म भी हैं कि वे लोगों में अंधविश्वास पैदा कर रही हैं, और उनकी सेहत को खतरे में डाल रही हैं। केन्द्र सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि उसके ओहदों पर बैठे लोग अगर ऐसी पाखंडी बातों को फैला रहे हैं, तो इसे खुद होकर इसे रोकना था। लेकिन आज का हिन्दुस्तान वैसा रह नहीं गया है, इसी वजह से सोशल मीडिया पर पापड़ का मखौल बनाकर ही उस केन्द्रीय मंत्री के साथ हिसाब चुकता हो पाया है। हम उस बारे में यहां अधिक लिखना नहीं चाहते, इसलिए हम सीधे एम्स पर आए, और देश के विशेषाधिकार दर्जा प्राप्त लोगों के महंगे सरकारी खर्चों पर आए। हमें उम्मीद तो धेले भर की भी नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में कोई जनहित याचिका लेकर जाने पर कोई जज इसे गरीबों के नजरिए से देख भी पाएंगे, लेकिन लोगों को कोशिश छोडऩी नहीं चाहिए क्योंकि गरीबों का पैसा बड़े लोगों पर निजी अस्पतालों में क्यों खर्च हो?

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