जिन बातों की वजह से उन्हें मर्यादा-पुरूषोत्तम कहा गया, आज उन बातों को भी सोचें

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-सुनील कुमार।।
अयोध्या में आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रामजन्म भूमि पर मंदिर बनाने की औपचारिक शुरुआत की है, और देश के उन तमाम हिन्दुओं के लिए यह पिछले दशकों का सबसे बड़ा मौका है जो इस जगह को रामजन्म भूमि मानते थे, और वहां मौजूद बाबरी मस्जिद, या उसका ढांचा, जो भी कहें, गिराकर भी मंदिर बनाने के हिमायती थे। अदालतों में लंबे वक्त तक मुकदमेबाजी के बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने कमर कसी, और अब भाजपा के सांसद बने हुए जस्टिस रंजन गोगोई ने अपना कार्यकाल खत्म होने के पहले इस मामले को निपटाने का बीड़ा उठाया, तो फिर सब कुछ तेजी से चला। अदालत ने माना कि बाबरी मस्जिद को गिराना गलत था, लेकिन उसका फैसला यह रहा कि यह जमीन मंदिर ट्रस्ट को दी जाए, और मुस्लिमों को अयोध्या में कहीं मस्जिद बनाने जमीन दी जाए। इस फैसले को लेकर बहुत तरह की असहमति भी लिखी गई, इसकी कड़ी आलोचना भी की गई, और रंजन गोगोई के भाजपा की तरफ से राज्यसभा पहुंचने को भी उससे जोडक़र देखा गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट अड़े रहा, उसने किसी पुनर्विचार याचिका की कोई गुंजाइश नहीं मानी, और मंदिर अब हकीकत है। आज से मंदिर बनना शुरू भी हो गया है, और अगले आम चुनाव के पहले शायद वहां से प्रसाद मिलना शुरू हो जाएगा, और जाहिर है कि पहला लड्डू प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हासिल होगा।

6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद गिरा दी गई, तो वहां मौजूद लालकृष्ण अडवानी को बांहों में लेते हुए उनकी पत्नी कमला अडवानी। तस्वीर में दाईं तरफ दिख रहे नरेन्द्र मोदी ने आज वहां मंदिर का भूमिपूजन किया। यह तस्वीर उस वक्त एक पे्रस फोटोग्राफर प्रवीण जैन ने खींची थी जो दूसरी बहुत सी अप्रकाशित तस्वीरों के साथ आज द प्रिंट ने पोस्ट की हैं..

आज जब नरेन्द्र मोदी ने यहां भूमिपूजन किया, तो यह साफ नहीं है कि मंदिर के लिए देश में रथयात्रा निकालने वाले लालकृष्ण अडवानी टीवी पर भूमिपूजन देख रहे होंगे, या वकीलों के साथ बैठे बाबरी मस्जिद गिराने के केस में अदालत में पूछे गए सवालों के जवाब तैयार कर रहे होंगे। अडवानी के साथ-साथ मुरली मनोहर जोशी, और कई दूसरे भाजपा के, हिन्दू नेताओं पर बाबरी मस्जिद गिराने का मुकदमा अभी चल ही रहा है। यह अपने आपमें भारतीय न्यायपालिका के भीतर का एक दिलचस्प पहलू है कि बाबरी मस्जिद गिराने का मुकदमा तो अभी निचली अदालत में ही चल रहा है, और उस मस्जिद के गिराने के बाद जो रास्ता खुला था, उस पर चलकर सुप्रीम कोर्ट ने भव्य मंदिर बनाने का हुक्म दिया, जिस पर अमल भी शुरू हो गया। अडवानी, जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह जैसे कई नेता अभी कटघरे में हैं, और जिस मंदिर के लिए अडवानी ने यात्रा निकाली, जिस यात्रा की वजह से देश में दंगे भडक़े, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में मौतें हुईं, वह मामला अभी किसी किनारे नहीं है, उसमें कोई गुनहगार साबित भी हों, तो उनके सामने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक का इतना लंबा सफर बाकी रहेगा, कि उनकी बाकी की उम्र उसके लिए छोटी पड़ेगी।

यह सिलसिला भारतीय लोकतंत्र और न्यायपालिका में कई किस्म के विरोधाभास उजागर करता है। मस्जिद गिराने के 25-30 बरस बाद भी ट्रायल कोर्ट का काम जारी है, और जुर्म का फैसला होने के पहले मंदिर बनना शुरू हो गया। लोकतंत्र में अदालत में एक सीमा तक ही लड़ा जा सकता है, उसके बाद अदालत के फैसले को मान लेना सबके लिए जरूरी हो जाता है, चाहे वह इंसाफ हो, या महज फैसला। देश में आबादी का अधिकतर हिस्सा ऐसा है जो जटिल मुद्दों के महज अतिसरलीकरण को ही समझ पाता है, फिर चाहे ऐसी अतिसरल व्याख्या सही हो, या न हो। फिर जब किसी जटिल मुद्दे से बहुसंख्यक आबादी का धर्म जुड़ा रहता है, जब देश में आपातकाल के दौरान भी न्यायपालिका के सरकार से प्रतिबद्ध होने की उम्मीद की जा रही थी, तो आज अगर ऐसे जटिल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुसंख्यक आबादी के साथ दिखता है, तो भी क्या किया जा सकता है। बहुसंख्यक तबके की आस्था के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब केन्द्र सरकार पर सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया पार्टी के लिए भारी सहूलियत के वक्त पर मंदिर निर्माण शुरू हुआ है, और देश की प्रमुख विपक्षी पार्टियों के पास भी इस मौके पर सिवाय राम-नाम जपने के और कुछ रह नहीं गया है।

लोकतंत्र के हित में अब बस यही उम्मीद की जा सकती है कि धार्मिक उग्रवाद का नारा लगाने वाले लोगों के कहे हुए अब देश के दूसरे धर्मस्थलों के विवाद पर कोई समुदाय आक्रामक तरीके से काम न करे। यह बात हम भी जानते और समझते हैं कि धार्मिक उन्माद से ऐसी उम्मीद करना फिजूल की बात होती है, लेकिन फिर भी लोकतंत्र में कुछ अच्छा होने की उम्मीद पूरी तरह छोड़ देना ठीक नहीं होता, इसलिए हम उम्मीदें जारी रखते हैं। हिन्दू समाज के लिए आज का दिन बड़ा ही ऐतिहासिक दिन है, और ऐसे दिन इसके धर्मालु लोगों को मंदिर भूमिपूजन और शिलान्यास की खुशी मनाते हुए मर्यादा पुरूषोत्तम कहे जाने वाले भगवान राम के व्यक्तित्व की उन बातों पर जरूर विचार करना चाहिए जिनकी वजह से उन्हें मर्यादा-पुरूषोत्तम कहा गया है।
-सुनील कुमार

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