अपूर्वानंद के लिए दो शब्द: अजय तिवारी

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-अजय तिवारी।।

अपूर्वानंद मेरे सहकर्मी रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में वे रीडर (अब के अनुसार एसोशिएट प्रोफ़ेसर) होकर आये थे, जब हम वहाँ कुछ ही महीनों पहले प्रोफ़ेसर बने थे। विभाग में वे कम दिलचस्पी लेते थे। हमारे दो अन्य वरिष्ठ प्रोफ़ेसर सुधीश पचौरी और रमेश गौतम उनकी अनुपस्थिति में मज़ाक़ बनाते थे। मैंने अपूर्वा से बात की। उन्हें धीरे-धीरे विभाग के कामों से जुड़ने के लिए सहमत किया। मैं उनकी क्षमता से परिचित था। हालाँकि नागार्जुन के मूल्यांकन को लेकर मैंने उनकी तीव्र आलोचना की थी, जो ‘नागार्जुन की कविता’ पुस्तक में मौजूद है। पर साहित्यिक विवाद और विभागीय कामकाज दो अलग चीज़ें हैं। मेरी कोशिश व्यर्थ नहीं गयी। वे पढने-लिखने वाले व्यक्ति हैं इसलिए कक्षाओं में उनका योगदान औरों से निस्संदेह बेहतर था। उनके विद्यार्थी उन्हें जल्द ही प्यार करने लगे।

मैं स्वयं सामाजिक-राजनीतिक रूप से सक्रिय रहा हूँ। अपूर्वा की सक्रियता मुझे ठीक लगती थी। अंतर था इस बात में कि अपूर्वा स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़कर काम करते थे और मैं वामपंथी राजनीति से जुड़कर करता था। हमारी बहसें होती थीं लेकिन वे खुले दिमाग़ के व्यक्ति हैं और मनमुटाव की नौबत कभी नहीं आती थी। हम अपने विचारों में अंतर रखते हुए बेहतरीन ढंग से साथ काम करते थे।

विद्यार्थियों को अपूर्वा और अध्यापकों से बेहतर सामग्री देते थे। विद्यार्थियों में पढने-लिखने की आदत डालने में उनका सबसे अधिक सहयोग मिलता था। वे उन प्रोफ़ेसरों में रहे हैं जो कक्षा में बहस और असहमतियों को प्रोत्साहन देते हैं। कोई विद्यार्थी उनसे भी बहस करे तो वे उसका स्वागत और सम्मान करते थे। यह सब वे एक जनतांत्रिक बोध और चेतना के साथ करते थे। उनमें जनतंत्र और सामाजिक सुव्यवस्था के लिए गहन सरोकार रहा है।

अपूर्वा किसी भी प्रकार की सांप्रदायिकता के पक्ष में नहीं हो सकते, चाहे हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता हो या सरकार द्वारा प्रेरित-प्रोत्साहित घृणा अभियान हो। वे एनजीओ की विचारधारा के अनुरूप दक्षिण-वाम हर राजनीति के प्रति आलोचनात्मक हैं, इससे किसी की सहमति हो या न हो। वे मानवाधिकारवादियों के साथ हैं लेकिन मानवाधिकार का पक्ष लेना माओवाद या दंगों का षड्यंत्रकारी होना नहीं है। यह कहना हददर्ज़ा जहालत है कि वे सामाजिक सौहार्द के लिए ख़तरा हैं।

एक क़ानूनप्रिय नागरिक होने के नाते वे पुलिस जाँच में पूरे सहयोग का बार-बार आश्वासन दे रहे हैं और मैं जानता हूँ कि वे केवल क़ानूनप्रिय नहीं, न्यायप्रिय भी हैं। पर इस के सभी सभ्य नागरिक जानते हैं कि उनपर क़ानूनी शिकंजा किसी अपराध के कारण नहीं, नागरिकता क़ानून के विरोध के कारण कसा जा रहा है। यह हम नये तरह का जनतंत्र बना रहे हैं जिसमें असहमति के स्वर को राजद्रोह घोषित किया जाता है।

मेरे लिए व्यक्ति के रूप में अपूर्वा से अधिक महत्वपूर्ण है जनतंत्र की हत्या का यह प्रयास। इस प्रयास का नतीजा यह होना तय है कि समाज अंधकार युग में चला जायेगा। ऐसा अंधकार युग पहले भारत ने नहीं देखा है। शायद सभ्यताओं के इतिहास में सबको इस दौर से गुजरना पड़ता है। हम उसी तरफ़ बढ़ रहे हैं—या शायद दौड़ रहे हैं। इस अंधकार युग की आशंका अधिक इसलिए है कि संगठित और व्यापक प्रतिरोध वातावरण में कहीं दिखायी नहीं देता। एनजीओ के सहारे ऐसा प्रतिरोध नहीं हो सकता और न एनजीओ देश के जनतांत्रिक भविष्य की रक्षा ही करते हैं। अपूर्वानंद इस अनुभव के बाद यह बात पहले से बेहतर समझेंगे, इसकी आशा की जाती है।

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