सैकड़ों बरस के रक्षाबंधन ने किस तरह की रक्षा दी, और यह किस पर बंधन?

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-सुनील कुमार।।
हिन्दुस्तान में आज राखी का त्यौहार मनाया जा रहा है जो कि एक ऐसा अनोखा त्यौहार है जिसकी जड़ें किसी धर्म में नहीं है, महज सामाजिक रिवाजों में है। दुनिया में शायद ही दूसरे देशों में ऐसा त्यौहार हो जिसमें बहन भाई की कलाई पर राखी या रेशमी डोरी बांधकर उससे अपनी सुरक्षा का वादा ले। रक्षाबंधन अपने शब्दों के मायने, और परंपरा दोनों हिसाब से यही कहता है कि बहन अपनी हिफाजत के लिए भाई को राखी बांधती है।

अब सवाल यह है कि यह रिवाज जब बना होगा तब बना होगा, और शायद कुछ सौ साल पहले से तो इसका इतिहास भी है। लेकिन यह समाज की उस वक्त की सोच को बताने वाला रिवाज भी है कि एक लडक़ी या महिला को हिफाजत के लिए भाई की जरूरत पड़ती है। फिर चाहे आज के माहौल में भाई बहन की मदद को जाते हों या न जाते हों, मां-बाप की जायदाद में बंटवारे के लिए बहन पर हमला करते हों, जो भी हो राखी की यह सामाजिक परंपरा चली आ रही है। आज के मुद्दे से हटकर एक दूसरी बात का जिक्र यहां करना जरूरी लग रहा है कि हाल के 20-25 बरसों में जब से हिन्दूवादी आक्रामक संगठनों को पश्चिमी प्रेम की संस्कृति से अपने देश को बचाना जरूरी लगा है, तब से फ्रेंडशिप डे पर, और वेलेंटाइन डे पर बाग-बगीचों में और सार्वजनिक जगहों पर बैठे हुए लडक़े-लड़कियों को ट्वीट कर उनमें राखी बंधवाई जाती है। यानी जो लडक़ा लडक़ी के साथ रहता है, और जो उसे हिफाजत से लेकर बैठा है, उसको राखी बंधवाई जा रही है कि वह उस लडक़ी की हिफाजत करेगा। तो उसका सीधा मतलब तो यही निकलता है कि अगर उस लडक़े में ताकत हो तो ऐसे धर्मान्ध और हिंसक राष्ट्रवादी गिरोह के लोगों को वह अकेले पीट-पीटकर भगाए, क्योंकि जिसे उसकी बहन बनाया गया है, उसे वह गिरोह ही तो परेशान कर रहा है, वही उसकी बेइज्जती कर रहा है।


भाई अपनी बहन की रक्षा करेगा इसकी पराकाष्ठा हर बरस जेल के बाहर देखने मिलती है जहां तकरीबन हर कैदी को राखी बांधने बहन और परिवार के और लोग पहुंचते हैं, उन उम्रकैदियों की बहनें भी पहुंचती हैं जो वहां भीतर रहते हुए उनकी क्या रक्षा कर लेंगे?

लेकिन आज राखी के दिन यह सोचने की जरूरत है कि रक्षाबंधन नाम का यह शब्द तो ऐसे लोगों के लिए है जो रक्षा करते हैं, शब्द के मायने तो कहीं नहीं बताते कि भाई ही बहन की रक्षा करे, बहुत से मामलों में तो बहन भाई की मदद करती है, उसकी रक्षा करती है। दूसरी बात यह भी है कि सैकड़ों बरस पुराने इस रिवाज के पीछे जो मर्दाना सोच रही होगी, क्या आज 21वीं सदी में भी उसका सम्मान करना जरूरी है? यह शब्द समाज की सोच में इतने गहरे पैठा हुआ है कि इसमें लोगों को कोई खामी भी नहीं दिख पाती। लोगों को यह एक सामाजिक रिवाज लगता है, और इसकी किसी भी किस्म की आलोचना लोगों को हिन्दुस्तानी संस्कृति या हिन्दू धर्म का विरोध लगने लगेगी, इस रिवाज का हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।

भारतीय समाज में ऐसे बहुत सारे भेदभाव से भरे हुए रिवाज चले आ रहे हैं। हिन्दुओं के बीच कुंवारी लडक़ी से 16 सोमवार के उपवास करवाए जाते हैं, ताकि उसे अच्छा पति मिले। हिन्दू धर्म में सैकड़ों बरस से चले आ रहे इस रिवाज को किसी ने बदलकर ऐसा बनाने की नहीं सोची कि लडक़े 16 सोमवार का उपवास करें ताकि वे बेहतर पति बन सकें। सुहागिन महिलाओं से करवाचौथ का व्रत करवाया जाता है, और पति की मंगलकामना करते हुए वे उपवास करती हैं, और रात में पति के चेहरे को देखकर चांद देखा मानकर फिर वे कुछ खाती हैं। आमतौर पर निर्जला व्रत का चलन है। पति चाहे साल में दो बार थाईलैंड जाकर आने वाला क्यों न हो, अपने ही देश और शहर में मौका मिलते ही इधर-उधर मुंह मारने वाला क्यों न हो, उसकी मंगलकामना के लिए, उसके लंबे जीवन के लिए, और खुद सुहागन मरने के लिए महिलाओं से करवाचौथ का व्रत करवाया जाता है।

महिलाओं को इस किस्म की सोच का कैदी बनाए रखने के रिवाज अंतहीन हैं। हिन्दू विवाह में लडक़ी के मां-बाप लडक़ी का कन्यादान करते हैं। अच्छे-भले प्रगतिशील सोच के लोग भी इस रिवाज से टकराने की नहीं सोचते कि रिवाज में फेरबदल करने से शादी करवा रहे पंडित पटरी से न उतर जाएं। जिस वक्त दूल्हे को यह समझ आता है कि उसे दुल्हन दान में मिल रही है, तो फिर वह उस दुल्हन के साथ दहेज में चारा भी चाहता है, दान में मिली उस बछिया को बांधने के लिए एक शेड भी चाहता है। ऐसी सोच के बाद ही दान से लेकर दहेज-प्रताडऩा और दहेज-हत्या तक की नौबत आती है।

हिन्दू और हिन्दुस्तानी समाज में महिला को नीचा दिखाने के तरीकों में कोई कमी नहीं रखी, और उसकी सोच को इस कदर कुचला कि वह बराबरी की कभी सोच भी न पाए। आबादी के एक बड़े हिस्से में बचपन से ही बच्चियों को घर का काम सीखने को कहा जाता है, और भईया, भईया तो पढऩे के लिए है, या कुर्सी पर बैठकर बहन से सामान मंगवाने के लिए है। बहुत से परिवारों में लडक़े और लड़कियों के खानपान में भी फर्क किया जाता है। छत्तीसगढ़ की एक तस्वीर को लेकर हमने कई बार इस बात को लिखा है कि गांवों की स्कूलों में लडक़े तो पालथी मारकर बैठकर दोपहर का खाना खाते हैं, लेकिन लड़कियां उकड़ू बैठकर खाती हैं। किसी ने इसके पीछे का तर्क बताया तो नहीं, लेकिन हमारा अंदाज है कि इस तरह बैठकर खाने पर लड़कियां कम खा पाती होंगी, और शायद किसी समय किसी इलाके में उनके इस तरह बैठने का रिवाज ऐसी ही सोच से शुरू हुआ होगा। क्योंकि आम हिन्दुस्तानी घरों में महिला खाने वाली आखिरी प्राणी होती है, ताकि जो बचा है उससे उसका काम चल सके बाकी तमाम लोगों को पहले पेटभर खाना मिल जाए। यह बात महिला से बढक़र परिवार की लड़कियों तक पहुंच जाती है, लेकिन पुरूष और लडक़े इससे अछूते रहते हैं। बहुत से परिवारों में लडक़े और लड़कियों के इलाज में भी फर्क किया जाता है। मुम्बई के सबसे बड़े कैंसर अस्पताल, टाटा मेमोरियल का एक सर्वे है कि वहां जिन बच्चों में कैंसर की शिनाख्त होती है, और जिन्हें आगे इलाज के लिए बुलाया जाता है, उनमें से लडक़े तो तकरीबन तमाम लाए जाते हैं, लेकिन बहुत सी लड़कियों को इलाज के लिए नहीं लाया जाता कि उनका इलाज कराने से क्या फायदा।

हिन्दुस्तानी समाज में महिलाओं से भेदभाव की मिसालें अंतहीन हैं, और उनमें से अधिकतर तो ऐसी हैं जो 15वीं सदी में शुरू हुई होंगी, या उसके भी हजार-पांच सौ बरस पहले, और आज 21वीं सदी तक चल ही रही हैं। एक वक्त पति को खोने के बाद महिला को सती बनाया जाता था, उसे चिता पर साथ ही जिंदा जला दिया जाता था। आज भी जब वृंदावन के विधवा आश्रमों को देखें, तो समझ पड़ता है कि विधवा महिलाओं के साथ समाज का क्या सुलूक है। जिन्हें विधवा आश्रम नहीं भेजा जाता, उनको भी घर में किस तरह पीछे के कमरों में, शुभ कार्यों से दूर, दावतों से दूर कैसे रखा जा सकता है, यह हिन्दुस्तान में देखने लायक है। एक लडक़ी अपने नाम के आगे कुमारी लिखकर कौमार्य का नोटिस लगाकर चलती है, शादी होते ही वह श्रीमती होकर अपने सुहाग की घोषणा करते चलती है। लेकिन पुरूष तो श्री का श्री ही रहता है। लडक़ी या महिला के नाम के साथ पहले पिता का नाम जुड़ा होता है, अगर शादीशुदा है तो पति का नाम जुड़ा होता है। बच्चों को नौ महीने पेट में रखकर पैदा मां करती है, लेकिन जब उनके नाम के साथ सरकारी कागजात में नाम लिखाना होता है, तो बाप का नाम पूछा जाता है, वल्दियत पूछी जाती है। हाल के बरसों में लंबी अदालती लड़ाई के बाद कुछ सरकारी और कानूनी कामकाज में कागजों पर मां का नाम लिखने का भी विकल्प दिया जाने लगा है, लेकिन हकीकत में उसके लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, और सरकारी मिजाज बाप के नाम के बिना आसानी से तसल्ली नहीं पाता।

अब सवाल यह है, और आज रक्षाबंधन के मौके पर यह सवाल अधिक जरूरी है कि सैकड़ों बरस से हिन्दुस्तानी लडक़ी और महिलाएं लडक़ों और आदमियों को राखियां बांधते आ रही हैं, और एवज में उन्हें कौन सी सुरक्षा मिली है? उनका रक्षाबंधन क्या इतनी सदियोंं में भी असरदार नहीं हो पाया? न पिता न भाई न पति, न अड़ोस-पड़ोस के दूसरे लडक़े, और न ही छेडख़ानी या बलात्कार के वक्त आसपास खड़े दूसरे लोग क्या किसी पर भी रक्षा के किसी बंधन का कोई असर नहीं हुआ? तो अगर यह रिवाज इस कदर बेअसर है, तो यह रिवाज क्यों है? क्या हिन्दुस्तानी समाज की मर्द-मानसिकता लडक़े-लड़कियों, आदमी-औरतों के बीच संबंधों को लेकर ऐसी दहशत में जीती थी कि उसने एक वर्जित-रिश्ता बनाने के लिए ऐसा रिवाज खड़ा किया जिसे आमतौर पर तमाम लोग वर्जित मानते ही हैं। यह हिन्दुस्तानी रीति-रिवाजों के और बहुत से पाखंडों की तरह एक और पाखंड बनकर रह गया है जिसके पीछे की नीयत कुछ और रहती है, और जिसे सामने कुछ और बनाकर पेश किया जाता है? रक्षाबंधन का यह सिलसिला हिन्दुस्तानी लडक़ी और महिला को कोई रक्षा तो नहीं दे पाता, उसे बंधन के लायक साबित करने का एक मजबूत रिवाज जरूर लागू करता है। भ्रूण हत्या से बचकर निकल गई कोई लडक़ी अगर जिंदा रह भी गई, तो उसे कभी भाई से रक्षा के बिना न रहने लायक साबित करो, कभी शादी की रस्म में दान के लायक मान लो, कभी उसे पति के गुजर जाने पर सती कर दो, सती करना मुमकिन नहीं रह गया है तो उसे सफेद कपड़ों में सिर मुंडाकर विधवा बनाकर मरने तक के लिए आश्रम भेज दो। इस समाज के मर्द सैकड़ों बरस से महिलाओं से राखी भी बंधवा रहे हैं, और उन्हें इसी दर्जे की रक्षा दे रहे हैं।
-सुनील कुमार

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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