मुर्दा-देह में हलचल, अच्छा लक्षण..

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-सुनील कुमार||
कल कुछ ऐसा हुआ कि अजगर के बदन में हलचल देखने मिली। यह हैरानी की बात भी थी क्योंकि इसकी इस वक्त उम्मीद नहीं थी, लेकिन खुशी की बात भी थी कि इससे अजगर के जिंदा रहने का सुबूत भी मिला था।

कांग्रेस पार्टी में कल कई नेताओं ने यूपीए सरकार के कामकाज को लेकर कुछ सवाल उठाए, और कुछ दूसरे लोगों ने उसका जवाब दिया। खबरों की मानें तो यह नौजवान नेताओं और बुजुर्ग तजुर्बेकार लोगों के बीच दो अलग-अलग तबके बन जाने जैसी बयानबाजी थी। कांग्रेस के उम्र के पैमाने पर जवानी के आंकड़े कुछ अलग रहते हैं। इसके मुताबिक जो अपेक्षाकृत जवान लोग हैं उन लोगों ने कुछ बुजुर्ग लोगों के बयान पर कहा कि मनमोहन सिंह की सरकार को किसी नाकामयाबी के लिए जिम्मेदार ठहराना एक बहुत ही गैरजिम्मेदारी का काम है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेस प्रवक्ता रहे मनीष तिवारी ने ट्विटर पर लिखा- भाजपा 2004 से 2014 तक दस साल सत्ता से बाहर रही लेकिन उसके लोगों ने उस समय की हालत के लिए कभी अटल बिहारी वाजपेयी या उनकी सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया।

एक और नौजवान नेता मिलिंद देवड़ा ने ट्वीट किया क्या कभी उन्होंने (मनमोहन सिंह ने) कल्पना भी की होगी कि उनकी ही पार्टी के कुछ लोग उनकी सालों की सेवा को खारिज कर देंगे, और उनकी विरासत को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे, वह भी उनकी मौजूदगी में। एक तीसरे अपेक्षाकृत नौजवान पूर्व केन्द्रीय मंत्री, और वर्तमान सांसद शशि थरूर ने मनीष तिवारी और मिलिंद देवड़ा की बात को सही करार देते हुए लिखा- यूपीए के क्रांतिकारी दस सालों को दुर्भावनापूर्ण बहस के साथ कलंकित कर दिया गया। हमारी हार से सीखने को बहुत सारी बातें हैं, और कांग्रेस के पुनरुद्धार के लिए बहुत मेहनत करनी होगी, लेकिन हमारे वैचारिक शत्रुओं के मनमाफिक चलकर ऐसा नहीं हो सकता।

दरअसल पार्टी के एक दूसरे युवा नेता ने कांग्रेस के राज्यसभा सदस्यों की हाल में हुई एक बैठक में यूपीए के कामकाज पर सवाल उठाया था, और उन्होंने कपिल सिब्बल और पी.चिदंबरम से इतनी पुरानी पार्टी के कमजोर होने पर आत्मचिंतन को कहा था।

अब सोई हुई कांग्रेस जो कि राजस्थान के तमाम ढोल-नगाड़ों के बाद भी करवट बदल-बदलकर सोई हुई है, वह मनमोहन सरकार के कामकाज पर उठाए गए सवाल को लेकर जाग गई है। हम कांगे्रस के इन अलग-अलग तबकों की कही बातों में फर्क को लेकर अधिक विश्लेषण करना नहीं चाहते क्योंकि मुद्दा यह है कि एक पार्टी के भीतर कोई बहस चल रही है। मुर्दे की देह में हलचल एक अच्छी बात है, और वह किसी दवा की वजह से हो रही है, किस बात का लक्षण है, यह कम महत्वपूर्ण बात है।

कांग्रेस पार्टी के पास खोने के लिए अब करीब-करीब कुछ भी नहीं बचा है। भारतीय संसदीय राजनीति और भारतीय चुनावी राजनीति में वह हाशिए पर आ चुकी है, और ऐसा लगता है कि देश की सत्ता के लायक किसी गठबंधन का मुखिया बनना भी उसके लिए अभी दूर की कौड़ी है। ऐसे में लोकसभा के पिछले चुनाव में खुद अपनी जुबान में उसने जिसे शिकस्त मान लिया, उस शिकस्त की वजहें तलाशने के लिए आज तक एक भी बैठक नहीं हुई। चुनाव के बाद की तकरीबन सारी ही बैठकें राहुल के अध्यक्ष पद से हटने, उनकी मां सोनिया के कामचलाऊ अध्यक्ष बनने, और फिर से राहुल से अध्यक्ष बनने की अपील करने में खत्म हो गई। यह पार्टी इतनी कम सीटों पर क्यों बनी रह गई इस पर भी चर्चा नहीं हुई, और न ही पार्टी में इतना हौसला बच गया कि वह कह सके कि वह पिछली बार के चुनाव के मुकाबले कुछ भी खोने वाली नहीं रही, एक-दो सीटें बढ़ाने वाली ही रही। पार्टी हौसला खो चुकी थी, पार्टी का अध्यक्ष अपनी खुद की नजरों में सब कुछ खो चुका था, लेकिन पार्टी के भीतर अध्यक्ष का परिवार कुछ भी नहीं खो रहा था। ऐसे में किसी ने तात्कालिक सन्यास की राह पर चले राहुल की अगुवाई में लड़े गए चुनाव के विश्लेषण की बात नहीं सोची, और चुनाव के 9 महीने बाद भी पार्टी अब तक यह नहीं सोच पाई है कि मोदी के मुकाबले उसका यह हश्र क्यों हुआ, जबकि इसके कुछ महीने पहले के विधानसभा चुनावों में उसने ठोस कामयाबी पाई थी।

अभी हम कांग्रेस की इन दो पीढिय़ों के बीच चल रही बहस के मुद्दों को अहमियत नहीं दे रहे, लेकिन बहस को अहमियत दे रहे हैं। मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए यह कहा था कि इतिहास जब उनके कामकाज का जिक्र करेगा तो वह उनके साथ कुछ उदार रहेगा। यह एक सज्जन आदमी की जुबान थी, जो कि भारत की आज की राजनीति की आम हो गई बदजुबानी से बिल्कुल अलग थी। फिर भी दस बरस सरकार चलाने वाले नेता को, उसके मंत्रियों को, उसके अध्यादेश को फाडक़र फेंकने वाले कांग्रेस के एक महज-सांसद को चुनावी नतीजों पर आत्ममंथन तो करना ही चाहिए। स्कूली बच्चे भी जब सालाना नतीजे लेकर बाहर निकलते हैं, तो हर पर्चे में हासिल नंबर देख-देखकर सोचते हैं कि किस पर्चे में क्या गलती रह गई होगी? घर लौटकर पर्चा निकालकर देखते हैं कि उसमें किस सवाल का क्या जवाब लिखा था, किस गणित का क्या हल किया था, और उसमें से कौन सा गलत हुआ होगा? इतने आत्ममंथन के बिना, इतने आत्मविश्लेषण के बिना तो आम स्कूली बच्चे भी नहीं रहते। इसलिए मनमोहन सिंह, उनकी मुखिया रहीं सोनिया गांधी, और पार्टी में अनोखी ताकत से लैस राहुल गांधी को यूपीए के दस बरसों का विश्लेषण क्यों नहीं करना चाहिए? और यह विश्लेषण पार्टी के लोग क्यों बुरा मान रहे हैं, क्यों इसे वैचारिक दुश्मनों के हाथों में खेलना मान रहे हैं?

हमारा तो यह मानना है कि हिन्दुस्तानी धार्मिक रीति-रिवाजों के मुताबिक अंतिम संस्कार के बाद के 13 दिनों के पूरे हो जाने पर जिस तरह एक पगड़ी रस्म होती है, और परिवार के अगले मुखिया के सिर पर वह पगड़ी समारोहपूर्वक धरी जाती है, वैसा ही राजनीतिक दल में क्यों नहीं होना चाहिए? मनमोहन सिंह को खुद को ही पार्टी के सामने यह प्रस्ताव रखना था कि हार का विश्लेषण किया जाए। जरूरी नहीं है कि कांग्रेस इस विश्लेषण के आखिर में यह पाती कि वह मनमोहन सरकार की गलतियों और गलत कामों की वजह से अधिक सीटें नहीं पा सकी। हो सकता है कि कांग्रेस का तर्कसंगत विश्लेषण यह भी सामने रखता कि उसके बेहतर नतीजे न आने के पीछे देश की हवा का बदतर कर दिया जाना रहा, और कांग्रेस पार्टी देश की जहरीली हवा में अधिक लंबी दौड़ नहीं लगा पाई, क्योंकि उसके फेंफड़े नफरत की हवा के आदी नहीं थे। एक आत्ममंथन और विश्लेषण से कतराना तो जरा भी ठीक नहीं है। क्या होगा, अधिक से अधिक कुछ लोग मनमोहन सिंह पर तोहमत ही डाल देंगे। लेकिन इतिहास लेखन कभी भी बहुत दरियादिल नहीं हो सकता। पार्टी के भीतर के बड़े लोगों को अगर लग रहा है कि मनमोहन सरकार के मंत्री कांग्रेस की एक बदहाली के लिए जिम्मेदार थे और हैं, तो इस सोच से इतना डरने की क्या जरूरत है? ऐसी बात तो देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा भी सोचता है, पार्टी के भीतर कम से कम जनता के एक हिस्से की सोच तो कोई सामने रख रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी मध्यप्रदेश और राजस्थान में साजिशों से हुई शिकस्त से मजबूत होकर उभर सकती है। कोई भी पार्टी ऐसी चुनौतियों के बीच अपनी ताकत को बढ़ाती है, और कांग्रेस के सामने यह एक मौका है। बजाय इसके कि कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे नेताओं को खोए, कांग्रेस को अपने घर के भीतर जमकर खुली बातचीत करने का हौसला दिखाना चाहिए। हम इस बात को एकदम ही मासूम नहीं मानते कि सार्वजनिक मंच पर कांग्रेस नेता एक-दूसरे पर टूट पड़े हैं। इसके पीछे कोई सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है, लेकिन उससे भी हमारी इस सोच पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि पार्टी को बनते कोशिश बंद कमरे में, और बंद कमरे में मुमकिन न हो सके तो सार्वजनिक रूप से आत्ममंथन के लिए तैयार रहना चाहिए। जो विचार-विमर्श और बहस की जरूरत के मौके पर चुप रह जाए, उसे मुर्दा ही मान लेना बेहतर होगा। इसलिए आज अगर कांग्रेस के भीतर कड़वी, कुछ लोगों को अवांछित और गैरजरूरी लगती, और तात्कालिक नुकसान की बातें खटक भी रही हों, तो यह याद रखना चाहिए कि पौराणिक कथाओं के समुद्र मंथन की तरह अगर इससे कुछ जहर भी निकलेगा, तो इससे कुछ अमृत भी निकलेगा। और जहर से आज की कांग्रेस का कुछ नुकसान नहीं हो सकता, आत्ममंथन के अमृत से उसका फायदा जरूर हो सकता है।

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